नाकामी पर तैरती लाशें

नाकामी पर तैरती लाशें

गांवों को तत्काल इलाज-आर्थिक पैकेज मिले

जीवनदायिनी कही जाने वाली गंगा व यमुना में तैरती लाशों ने पूरे देश को विचलित किया है। बक्सर और गाजीपुर के दृश्य हमारी तरक्की को झुठलाते हैं। ये हमें उस कालखंड में ले जाते हैं जब भारत में औपनिवेशिक साम्राज्य में भारतीय महामारी व अकाल के समय लाचार होकर अपनों को खोते थे। तब वे अंतिम संस्कार न कर पाने की स्थिति में अपनों को पास की नदी में प्रवाहित कर देते थे। बिहार के बक्सर में तैरती लाशें हमारे विकास के थोथे दावों को बेमानी बनाती हैं। हम चांद व मंगल पर जाने की बात तो करते हैं लेकिन गांवों को यह सुविधा नहीं दे पाते कि वे जांच कर सकें कि उन्हें कोविड-19 की महामारी ने डसा है या मामूली खांसी-जुकाम हुआ है। बक्सर के चौसा गांव के निकट गंगा में मिले शवों की गिनती को लेकर अलग-अलग दावे हैं। लेकिन मीडिया का दबाव बढ़ने के बाद चौसा गांव के निकट मिली 71 लाशों का पोस्टमार्टम हुआ है। शायद यह कभी न पता लग पाये कि इन लोगों की मौत की वजह क्या थी। दरअसल, शव क्षत-विक्षत थे। शवों का डीएनए संग्रहण जरूर किया गया है। इसको लेकर भी अलग-अलग दावे हैं। बिहार के अधिकारी इन शवों के उत्तर प्रदेश से बह कर आने की बात कर रहे हैं, कुछ लोग कहते हैं कि कोरोना काल में उपजे आर्थिक संकट के बीच काफी संख्या ऐसे लोगों की है जो अपने परिजनों के अंतिम संस्कार का खर्चा नहीं उठा पा रहे हैं। कुछ जगहों पर ग्रामीण कोरोना से मरे लोगों का अंतिम संस्कार श्मशान घाट में नहीं करने दे रहे हैं। बहरहाल, हाल ही में लखनऊ के श्मशान घाट पर सामूहिक चिताओं के लाइव प्रसारण के बाद टीन की चादरें लगाकर उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी मंशा जतायी थी। अब लाशों की फोटो खींचने वालों को भी गिरफ्तार करने की धमकी दी गई है। अधिकारी नदी के दोनों तरफ शवों को हटाने की कोशिश में लगे हैं। दरअसल, यूं तो वर्ष पर्यंत नदियों में शवों का प्रवाह रहता है जो ऐसी जगह में ठहर जाती हैं जहां नदी का किनारा चौड़ा होता है और पानी का वेग कम हो जाता है।

बहरहाल, ये हालात कोरोना संकट के भयावह होने की ओर इशारा करते हैं। शहरों में ऑक्सीजन संकट, बेडों के अभाव तथा दवाओं की कालाबाजारी के बावजूद कोविड के मरीजों को कुछ तो उपचार मिल जाता है, लेकिन ग्रामीण इलाकों के हालात डराने वाले हैं। इसी उत्तर प्रदेश में आम आदमी की तो बात छोड़िये, सत्तारूढ दल भाजपा के चार विधायकों को कोरोना लील गया है। ऐसे ही हालात में केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को नाराजगी भरा पत्र लिखकर महासंकट में चिकित्सा अधिकारियों की उदासीनता, संसाधनों के अभाव तथा दवा व ऑक्सीजन सिलेंडरों की कालाबाजारी की शिकायत की थी। अन्य विधायक व सांसद भी पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं न होने की शिकायत करते रहे हैं। हालात बेकाबू हो रहे हैं और सरकार कह रही है कि हालात सुधर रहे हैं। जो बताते हैं कि सत्ताधीशों ने स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राथमिकता बनाने के बजाय राजनीतिक-धार्मिक एजेंडे को प्राथमिकता दी है। वैसे भी तमाम ज्ञात बीमारियों के लिये ही पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं मौजूद नहीं थीं, इस अज्ञात बीमारी के सामने तंत्र ने लाचार होना ही था। माना इस महामारी का पर्याप्त उपचार मौजूद नहीं है, लेकिन कम से कम मृतकों की अंतिम विदाई तो गरिमामय होनी ही चाहिए। महामारी से उपजी बदहाली में बेबसी दर्शाती स्थितियों से उबरने के लिये जरूरी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आपात चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जायें। साथ ही केंद्र व राज्य सरकारें आर्थिक पैकेज उपलब्ध करायें, जिससे कोरोना प्रोटोकाल का सख्ती से पालन हो सके। अन्यथा ग्रामीण क्षेत्रों में महामारी को काबू करना आसान नहीं होगा, जिसकी चेतावनी देश के चिकित्सा विशेषज्ञ और प्रधानमंत्री पहले ही दे चुके हैं। दरअसल गांवों में न तो पर्याप्त कोविड जांच की ही व्यवस्था है और न ही इलाज की, जिसका फायदा नीम-हकीम उठा रहे हैं।

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