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संघीय ढांचे पर आंच

राज्यपाल और सरकारें टकराव को टालें

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भारतीय लोकतंत्र के केंद्र में सत्ता किसी भी राजनीतिक दल की रही हो, राज्यों में विरोधी दलों की सरकारों व राज्यपालों में टकराव की खबरें दशकों से अखबारों की सुर्खियां बनती रही हैं। जनसरोकारों की रक्षा व राज्य सरकारों की बेलगाम नीतियों पर संतुलन के लिये सृजित यह संवैधानिक पद गाहे-बगाहे विवादों की चपेट में आता रहा है। बहुमत की सरकारों को गिराने के खेल पिछली सदी में भी सुर्खियों में रहे हैं। इस कड़ी में कर्नाटक विधानसभा में घटा ताजा अप्रिय घटनाक्रम भी जुड़ गया। ऐसे में राजभवनों को लोकभवन बनाने को यथार्थ में बदलने की जरूरत भी महसूस की जा रही है। निस्संदेह, कर्नाटक विधानसभा में जो भी कुछ घटा वह राजभवन व निर्वाचित सरकारों के बीच जारी टकराव का एक निचला स्तर ही कहा जा सकता है। खासकर उन राज्यों में जहां राजग की सरकारें नहीं हैं। दरअसल, विधानसभा में मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार किए गए पाठ को छोड़कर पारंपरिक संबोधन को केवल कुछ पंक्तियों में सीमित करने के निर्णय के बाद कर्नाटक में एक नया विवाद खड़ा हो गया। जिसका प्रभाव कांग्रेस शासित दक्षिणी राज्य के अलावा भी बहुत दूर तक महसूस किया गया। निर्विवाद रूप से नये साल के पहले सदन की शुरुआत में राज्यपाल का संबोधन एक संवैधानिक परंपरा रही है। यह राज्यपाल के व्यक्तिगत बयान के बजाय राज्य सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं का औपचारिक विवरण होता है। लेकिन सत्र की शुरुआत में राज्यपाल थावरचंद गहलोत अपने द्वारा तैयार किया गया संक्षिप्त भाषण देकर सदन से बाहर चले गए। राज्य की कांग्रेस सरकार ने उन पर केंद्र सरकार की मंशा के अनुरूप कार्य करने का आरोप लगाया। उल्लेखनीय है यहां यह तल्ख टकराव हाल में तमिलनाडु और केरल विधानसभा में हुए अप्रिय घटनाओं के बाद सामने आया है। विडंबना है कि ऐसी ही असहमतियां, हाल के वर्षों में आम हो चली हैं। जिसे भारत जैसे संघीय लोकतंत्र के लिये शुभ संकेत कदापि नहीं कहा जा सकता है।

दरअसल, विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों वाली सरकारों के मुखिया आरोप लगाते रहे हैं कि अधिकतर राज्यों में राज्यपाल का उपयोग केंद्र सरकार के राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने वाले साधन के रूप में ही किया जा रहा है। निस्संदेह, राज्यों में राज्यपालों से उम्मीद की जाती है कि वे केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच एक निष्पक्ष पुल का दायित्व निभाएं। इसमें दो राय नहीं कि किसी भी राज्यपाल को मसविदा संबोधन पर आपत्ति उठाने का अधिकार तो होता है, लेकिन इसके प्रत्युत्तर में संवैधानिक नैतिकता भी अपरिहार्य है। निश्चित रूप से ऐसी किसी भी असहमति को संवाद के माध्यम से हल करने की जरूरत होती है। राज्यपाल और राज्य सरकारों को सदन के भीतर आमने -सामने की भिड़ंत से हर हाल में बचने का प्रयास करना चाहिए। निर्विवाद रूप से किसी भी राज्यपाल और राज्य सरकार का अंतिम लक्ष्य जनता के हितों की रक्षा करना ही होता है। लेकिन किसी भी स्थिति में जब राज्यपाल और राज्य सरकारें विपरीत उद्देश्यों के लिये काम करने लगते हैं, तो शासन की गुणवत्ता का प्रभावित होना स्वाभाविक ही है। निर्विवाद रूप से यह केवल अहम का टकराव मात्र नहीं है। यह सरोकारों के संघवाद की भी एक परीक्षा है। उल्लेखनीय है कि आजकल केंद्र सरकार राजभवनों का नाम बदलकर लोकभवन बनाने की मुहिम चला रही है। केंद्र सरकार का कहना है कि राजभवन का संबोधन औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है। निस्संदेह लोकतंत्र में राजभवन राजतंत्र का पर्याय होने का आभास देता है। लोकतंत्र में लोकभवन सही मायनों में लोक का ही प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन यह लोकभवन शब्द तब ही सार्थक हो सकता है जब जनता के हितों को राजनीतिक टकराव से ऊपर रखा जाएगा। निश्चित रूप से सत्ता के दोनों ही केंद्रों को जनादेश का सम्मान ईमानदारी से करना ही चाहिए। यह भारत जैसे संघीय लोकतंत्र के लिये अपरिहार्य शर्त भी है जिसका पालन राज्यपाल व राज्य सरकारों को पूरा करना ही चाहिए।

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