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फर्जी की मर्जी पर अंकुश

सोशल मीडिया नियमन की जटिलताएं

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डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से झूठ को सच बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर केंद्र सरकार ने शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है। इस तरह के भ्रमित करने वाली सामग्री प्रसारित करने वाले सोशल मीडिया को नियंत्रित करने वाले नियमों को सख्त बनाया जा रहा है। जिससे डिजिटल कंपनियों और प्लेटफॉर्मों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, खासकर डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई से निर्मित सामग्री के संबंध में। दरअसल, ये नवीनतम बदलाव उन शिकायतों के बाद किए गए हैं जिसमें एआई बॉट द्वारा पथभ्रष्ट करने वाली उत्तेजक छवियों के निर्माण करने के आरोप लगे हैं। जिसके खिलाफ दुनिया के कई देशों ने भी सख्त कदम उठाए हैं। उल्लेखनीय है कि आईटी के नये नियम बीस फरवरी से लागू होंगे। इसके बाद एआई के जरिये निर्मित सामग्री पर इस बात का लेबल लगाना जरूरी होगा कि उसे कृत्रिम रूप से गढ़ा गया है। साथ ही प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को उपयोगकर्ताओं को भरोसा दिलाना होगा कि साझा की जा रही सामग्री एआई द्वारा निर्मित है या नहीं। ऐसे वक्त में जब लोगों की संवेदनाओं और भरोसे से खिलवाड़ का खेल द्रुत गति से जारी है, केंद्र सरकार की ओर से उठाया गया यह जरूरी कदम कहा जा सकता है। सरकार ने नये प्रावधानों में निर्देश दिया है कि किसी भी अवैध या भ्रामक एआई जनित सामग्री को तीन घंटे के भीतर हटाना होगा या फिर ब्लॉक करना होगा। उल्लेखनीय है कि इससे पहले यह हटाने की समय सीमा 36 घंटे थी। हालांकि, इस तरह सख्त नियमों के जरिये सोशल मीडिया का नियमन खासा जटिल कार्य है। इस आदेश की जटिल कार्यप्रणाली के अतिरिक्त,यह सवाल भी विवाद का विषय बना हुआ कि ऑनलाइन आपत्तिजनक सामग्री किसे माना जाए। साथ ही यह भी कि क्या स्वीकार्य है? यदि हां तो किस आधार पर? वहीं दूसरी ओर इसके बहाने सरकारों द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की चिंताएं भी बरकरार हैं। सही मायनों में, लोकतंत्र की अपरिहार्य शर्त स्वतंत्र अभिव्यक्ति से जुड़ी इन चिंताओं का निराकरण भी जरूरी है।

निस्संदेह दुनिया में जैसे-जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता डिजिटल क्षेत्र में अपना दायरा बढ़ाती जा रही है, वैसे-वैसे ही प्रभावी नियामक नियंत्रण स्थापित करना एक कठिन चुनौती बनता जा रहा है। वहीं दूसरी ओर एआई उद्योग के लिये भी, अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार में अपनी तकनीकों के विस्तार के साथ-साथ नैतिक ढांचों को बनाये रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य बनता जा रहा है। उल्लेखनीय है कि एक प्रमुख कंपनी के सुरक्षा शोधकर्ता का विवादास्पद परियोजनाओं की अनियंत्रित गति से असहमति जताते हुए त्यागपत्र देना तकनीकी प्रगति की छलांग लगाती गति के दुष्परिणामों को ही उजागर करता है। निर्विवाद रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता जनित स्पर्धा के दौर में नैतिक दुविधा स्पष्ट है। साथ ही इसका कोई कारगर समाधान शीघ्र नजर भी नहीं आता। इस संकट से विकासशील देश ही नहीं, विकसित देश भी गहरे तक जूझ रहे हैं। आस्ट्रेलिया व फ्रांस आदि देशों में बच्चों कोे सोशल मीडिया से दूर रखने की न्यूनतम उम्र निर्धारित की गई है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका में इंस्टाग्राम और यूट्यूब के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की जांच के लिये एक ऐतिहासिक मुकदमा शुरू हो गया है। सोशल मीडिया कारोबार में दोनों हाथों से मुनाफा बटोरने वाली कंपनियों के देश अमेरिका में दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों पर लोगों को लत लगाने वाली मशीनें बनाने के आरोप लग रहे हैं। इस बाबत एक अंतर्राष्ट्रीय प्रमुख विशेषज्ञ की टिप्पणी है- हम देख रहे हैं कि अधिकाधिक युवा न केवल मनोवैज्ञानिक बल्कि शारीरिक पीड़ा का भी अनुभव करते हैं, जब उनसे फोन आदि उपकरण ले लिए जाते हैं। कमोबेश यही स्थिति भारत समेत तमाम विकासशील देशों में भी बनी हुई है। इस संकट का कोई स्थायी समाधान विश्व भर के लिये प्रासंगिक हो सकता है। निस्संदेह, इस बेहद घातक तकनीक आक्रमण से निबटना लगातार बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। निर्विवाद रूप से असली-नकली के भ्रम से जूझते उपयोगकर्ताओं की संवेदनाओं से खिलवाड़ का सिलसिला नियंत्रित होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर डीपफेक से धोखाधड़ी-गलत सूचनाओं के बढ़ते खतरों को नियंत्रित करने के लिये सख्त नियम के साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के संचालकों को जवाबदेह बनाना भी जरूरी है।

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