निस्संदेह, नशे का निरंतर फैलता काला कारोबार एक राष्ट्रीय संकट है। देश के विभिन्न भागों में करोड़ों-अरबों रुपये मूल्य के विदेशों से आने वाले नशीले पदार्थों की बरामदगी भयावह संकट की तसवीर उकेरती है। संगठित विदेशी अपराधियों की साजिशों और देश में फैले नशा तस्करों का गठजोड़, इस नशीले जहर के कारोबार को चला रहा है। आज जरूरत इस बात की है कि देश की तमाम खुफिया एजेंसियां व राज्य के विशेष पुलिस बल योजनाबद्ध ढंग से नशा कारोबारियों की कमर तोड़ें। लेकिन फिर भी कई राज्यों द्वारा चलाये जा रहे नशा विरोधी अभियान बिगड़ते हालात सुधारने में किसी हद तक मददगार साबित हो सकते हैं। पिछले दिनों पंजाब में भी ऐसा अभियान चलाया गया। अब सीमावर्ती जम्मू-कश्मीर में वर्षों से गहराते नशे के संकट के खिलाफ अभियान शुरू किया जा रहा है। सवाल यह है कि राज्य में नशे के कारोबार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई शुरू करने में इतना वक्त क्यों लगा? अब भले ही देर से ही सही, यह पहल शुरू करना वक्त की जरूरत है। नशे के नश्तर से हमारी युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है और कई घरों के चिराग असमय बुझ रहे हैं। केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, बीस जिलों का दौरा करके सौ दिवसीय नशा मुक्त जम्मू-कश्मीर मार्च का नेतृत्व कर रहे हैं। वहीं इस अभियान का सुखद पहलू यह है कि दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले में, इस कोशिश को प्रतिबंधित संगठन जमाते-ए-इस्लामी के एक गुट का भी समर्थन मिला है। कहना कठिन है कि इस समर्थन का हकीकत में असर कितना होगा। लेकिन इस घोषणा ने सकारात्मक संदेश जरूर दिया है कि समाज के विभिन्न वर्गों के सामूहिक प्रयासों से ही इस भयावह होते संकट का मुकाबला किया जा सकता है। सही मायने में समाज में व्याप्त तमाम वैचारिक मतभेदों को दरकिनार करते हुए, सामूहिक व निरंतर प्रयासों से ही नशा मुक्ति की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है।
वास्तव में नशा विरोधी अभियान के मार्ग में बाधा पैदा करने वाली जटिलताओं के मुकाबले के लिये कुछ दिन, कुछ माह के अभियान के बजाय साल में 365 दिन चलने वाली रणनीति अपनाने की जरूरत है। कभी-कभार चलाए जाने वाले अभियान इसके लक्ष्य को पाने में ज्यादा मददगार साबित नहीं हो सकते। इस संकट के समाधान के लिये नशे की लत के सामाजिक पहलुओं की भी व्यापक पड़ताल जरूरी है। कारगर समाधान हेतु सामाजिक स्तर पर रणनीति बनाने की जरूरत होती है। निस्संदेह, नशे की लत के तमाम कारण हमारे समाज में विद्यमान हैं। जिनके निराकरण की दिशा में भी कदम उठाने की जरूरत है। मसलन इस व्यसन के मूल में समाज में व्याप्त बेरोजगारी, निराशा, सामाजिक व आर्थिक असमानताएं, बुरी संगत का असर तथा मादक पदार्थों की समाज में आसान उपलब्धता आदि कारक निहित हैं। चिंताजनक है कि नशा अब स्कूल-कालेजों तक को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। कई राज्यों में नशे की आपूर्ति में बच्चों को इस्तेमाल करने के चिंताजनक उदाहरण सामने आए हैं। वहीं यदि नशा मुक्ति के लिये चलाये जा रहे पुनर्वास कार्यक्रमों में शिथिलता अपनायी जाती है तो सख्ती से हासिल होने वाली उपलब्धियां व्यर्थ हो जाती हैं। यह सत्य है कि नशा एक ऐसा रोग है, जिसका कोई आसान इलाज उपलब्ध नहीं है। जहां एक ओर नशीले पदार्थों की आपूर्ति पर अंकुश लगाना जरूरी है, तो दूसरी ओर इसकी तलब को काबू करने के लिये भी प्रयास जरूरी हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि नशे की डोज जुटाने के लिये कुछ छात्र व युवा अपराध की राहों में फिसल जाते हैं। इसलिये जरूरी हो जाता है कि नियमित रूप से नशा तस्करों और ड्रग पेडलरों की गिरफ्तारी करके तुरंत सजा दी जाए। वहीं दूसरी ओर नशे की खरीद-फरोख्त में संलिप्तता पर ड्राइविंग लाइसेंस रद्द करने, पासपोर्ट निरस्त करने से भी जहरीले कारोबार पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है। साथ ही सीमावर्ती संवेदनशील राज्यों में, जहां सीमा पार से नशे की तस्करी आतंकवाद को जिंदा रखने के लिये की जा रही है, वहां अतिरिक्त सावधानी की भी जरूरत है। नशा तस्करों की गिरफ्तारी के तुरंत बाद सजा देना, इस अभियान में मददगार साबित होगा।

