नकली नकदी

सरकारी सतर्कता व जागरूकता से ही रोक

नकली नकदी

ये सरकार ही कहती है कि नोटबंदी के बाद वर्ष 2016 से 2020 के बीच दो हजार के जाली नोटों में 107 फीसदी की वृद्धि हुई है। सोमवार को संसद में वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि वर्ष 2019 व 2020 के बीच दो हजार रुपये मूल्य वर्ग के नोटों में 170 फीसदी की वृद्धि हुई है। हालांकि अर्थशास्त्री मानते हैं कि पकड़े गये जाली नोट ‘टिप ऑफ दि आइसबर्ग’ हैं यानी समुद्र में डूबे हिमखंड जितने, जिसका एक छोटा अंश बाहर दिखायी देता और बड़ा हिस्सा पानी के भीतर रहता है। बहरहाल, ये आंकड़े एक निष्कर्ष तो स्पष्ट देते हैं कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 में नोटबंदी के दौरान जो यह तर्क दिया था कि इससे नकली नोटों पर लगाम लगेगी, वह निष्फल हुआ है। नोटबंदी के बाद भी बेलगाम नकली नोटों का प्रचलन इस निष्कर्ष की पुष्टि करता है। आरबीआई ने अपनी वर्षिक रिपोर्ट में कहा था कि वर्ष 2020-21 की तुलना में 2021-22 के वित्तीय वर्ष में पांच सौ के नोटों में 101 फीसदी की वृद्धि हुई है। दरअसल, नकली नोटों के छापने में जहां देशी जालसाजों द्वारा मुनाफे को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं विदेशी शक्तियां देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने तथा आतंकवादी मिशनों के लिये नकली करेंसी छापती हैं। दरअसल, जाली नोट छापने में मोटा मुनाफा इसके प्रचलन की वजह है। बताते हैं करीब दस रुपये की लागत में पांच सौ का नोट खरा हो जाता है। दरअसल, जैसे-जैसे नई तकनीकें उपलब्ध होती जा रही हैं नकली नोट छापने का खेल तेज होता जा रहा है। वहीं दूसरी ओर भारत विरोधी देशों के पास नोट छापने की उन्नत तकनीक उपलब्ध है जिसकी वजह से असली-नकली नोट की पहचान मुश्किल हो जाती है। केंद्रीय बैंक जो भी सुरक्षा मानक नकली नोट रोकने के लिये लागू करता है, उसकी भी तुरंत नकल हो जाती है। जिसे आम आदमी जल्दी से भांप नहीं पाता कि नोट असली है या नकली।

विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि पकड़े जाने वाले नकली नोटों का प्रतिशत महज तीन या चार प्रतिशत होता है। तभी सरकारी आंकड़े हकीकत से दूर होते हैं और नकली नोटों की वास्तविक तस्वीर नहीं बताते। ऐसे में पकड़े गये नोटों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि वास्तव में प्रचलन में कितने नकली नोट हैं। आम आदमी तय नहीं कर पाता कि जो नोट वह इस्तेमाल कर रहा है वह असली है या नकली। वहीं सरकार भी नकली नोटों की वास्तविक स्थिति को कम ही स्पष्ट करती है, क्योंकि इससे लोगों का राष्ट्रीय मुद्रा पर भरोसा घटता है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार व सुरक्षा एजेंसियां मुस्तैदी से काम नहीं करतीं, लेकिन यह खेल बहुत ही सुनियोजित तरीके व आधुनिक तकनीक की मदद से किया जाता है। गाहे-बगाहे जाली नोट छापने वाली प्रिंटिंग प्रेसों पर कार्रवाई होती है, गिरफ्तारियां भी होती हैं, लेकिन रोग कम नहीं होता। देश का केंद्रीय बैंक भी जाली नोटों के सुरक्षा मानकों में समय-समय पर सुधार करता रहता है ताकि नकली नोट छापने की लागत बढ़े। लेकिन जालसाज भी ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ की तर्ज पर इसके तोड़ खोज निकाल देते हैं। केंद्रीय बैंक नोटों के सिक्योरिटी थ्रेड, वॉटर मार्क, पहचान व छिपे संकेतों आदि से सुरक्षा मानकों को बढ़ाता भी है, लेकिन चतुर जालसाज खेल के तौर-तरीके बदल देते हैं। दरअसल, सरकारी मशीनरी तब तक कामयाब नहीं हो सकती जब तक कि देश के आम लोगों को नकली करेंसी रोकने हेतु जागरूक नहीं किया जाता। दरअसल, कंप्यूटर क्रांति, सूचना क्रांति तथा नई टेक्नालॉजी के प्रसार से नकलचियों पर नकेल डालनी मुश्किल हुई है। निस्संदेह, जाली नोटों को रोक पाना बेहद मुश्किल है, लेकिन चौकसी इसे कम कर सकती है। इसमें बैंकों की सतर्क भूमिका हो सकती है। वित्त मंत्रालय से जुड़ी एजेंसियों, खुफिया व सुरक्षा एजेंसियों की साझा पहल प्रभावी हो सकती है। साथ ही विदेशों से आने वाली नकली करेंसी रोकने के लिये सीमाओं पर मुस्तैदी जरूरी है। निगरानी की आधुनिक तकनीकों के साथ ही नियंत्रण के लिये कानून भी सख्त बनाने की जरूरत है।

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