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उम्मीदों का गलियारा

हरित दृष्टिकोण का दिल्ली-देहरादून राजमार्ग

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निस्संदेह, दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का उद्घाटन भारत के संरचनात्मक विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। जो राष्ट्रीय राजधानी और उत्तराखंड के प्रवेश द्वार के बीच यात्रा के समय को छह घंटे से घटाकर ढाई घंटे करने का वायदा करता है। मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र को समर्पित यह एक्सप्रेसवे उत्तराखंड ही नहीं, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उद्योग व पर्यटन को बढ़ावा देगा। इंजीनियरिंग की विशिष्ट उपलब्धि से बढ़कर, परियोजना राजमार्गों की कल्पना में एक बड़े बदलाव का संकेत भी है। जो महज एक सड़क ही नहीं है, बल्कि कई क्षेत्रों, बाजारों और अवसरों को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण आर्थिक गलियारा भी है। इस राजमार्ग के बनने से जहां परंपरागत मार्गों पर ट्रैफिक का दबाव कम होगा, वहीं बेहतर कनेक्टिविटी से देहरादून और मसूरी आदि अन्य हिल स्टेशनों में पर्यटन बढ़ेगा। निस्संदेह, इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलेगा। पश्चिमी उ.प्र. के सहारनपुर व शामली जैसे जनपदों, जिन्हें विकास की दौड़ में पर्याप्त अवसर नहीं मिले, उनके लिये भी वरदान साबित हो सकता है। माना जा रहा है कि खाद्यान्न, भंडारण और रियल एस्टेट में भी इस परियोजना के लाभ नजर आएंगे। कह सकते हैं कि यह एक्सप्रेसवे भारतमाला जैसी परियोजनाओं के तहत एकीकृत, उच्च गति वाले गलियारों के लिये केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के लक्ष्यों को पूरा करता है। वहीं दूसरी ओर इस परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें विकास और पारिस्थितिक संवेदनशीलता के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का सार्थक प्रयास किया गया है। प्रतिष्ठित राजाजी पार्क क्षेत्र से गुजरने वाला यह ऊंचा वन्यजीव गलियारा, जिसमें वन्य जीवों के लिये अंडरपास बनाये गए हैं ताकि उनके प्राकृतिक आवागमन मार्गों में किसी तरह का व्यवधान पैदा न हो। जो इस मान्यता की कसौटी पर खरा उतरता है कि विकास के बुनियादी ढांचे को प्रकृति के अनुरूप तैयार किया जाना चाहिए।

हाल के वर्षों में देश की विभिन्न बड़ी विकास योजनाओं वाले क्षेत्रों में वन्य जीवों और मनुष्य के बीच जो संघर्ष बढ़ा है, वो विकास को पर्यावरण व वन्यजीवों के अधिवास के अनुकूल ढालने की जरूरत बताता है। कर्नाटक के हाथी गलियारे- जो बांदीपुर,नागरहोल और आसपास के जंगलों को जोड़ते हैं, दर्शाते हैं कि कि कैसे संपर्क मार्गों से वन्य जीवों के प्रवास-मार्ग की सुरक्षा होती है। जिससे मानव व वन्य जीवों का संघर्ष कम होता है। ऐसे में यदि दिल्ली-देहरादून राजमार्ग में अभिनव प्रयास प्रभावी साबित होते हैं, तो यह नया एक्सप्रेसवे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में भविष्य की परियोजना के लिए एक आदर्श साबित हो सकता है। हालांकि, इस राजमार्ग को लेकर कुछ चिंताएं अभी बाकी हैं। राजमार्ग को पूरा करने के दौरान अंतिम समय में निर्माण कार्यों में किए गए सुधार और इसमें पहले हुई कुछ देरी की रिपोर्टों से कार्य निष्पादन की गुणवत्ता व समय सीमा के दबाव को लेकर सवाल भी उठे हैं। निस्संदेह, किसी संरचना के बुनियादी ढांचे का मूल्यांकन उद्घाटन की समय सीमा से नहीं बल्कि उसकी मजबूती, सुरक्षा उपायों और दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों के आधार पर ही होना चाहिए। अंतत: यह एक्सप्रेसवे आशा और सावधानी दोनों का ही पर्याय है। निर्विवाद रूप से यह भारत की तेज और स्मार्ट निर्माण की महत्वाकांक्षा को भी दर्शाता है। इसके साथ ही उच्च मानकों की कसौटी पर खरा उतरने और जवाबदेही की जरूरत को भी रेखांकित करता है। निर्विवाद रूप से इस महत्वाकांक्षी परियोजना की वास्तविक सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि यह पारिस्थितिक और संरचनात्मक गुणवत्ता से समझौता किए बिना दक्षता को बनाये रखे। इसके अलावा पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक अस्मिता और पर्यटन के दबाव से भूगर्भीय संवेदनशीलता की भी रक्षा हो। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से भूस्खलन व पर्यटकों का दबाव झेल रहे हिमालयी राज्यों में पर्यटन प्रकृति व स्थानीय संस्कृति के अनुरूप होना चाहिए। आने वाले दिनों में दिल्ली-देहरादून राजमार्ग उत्तराखंड की चारधाम यात्रा को भी गति देगा, जिससे श्रद्धालुओं की संख्या में तेजी से विस्तार होना निश्चित है। वहीं चीन से मिलने वाली किसी चुनौती से निपटने में सेना की गतिशीलता, रसद व सैन्य आपूर्ति में भी यह राजमार्ग महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है।

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