यह विडंबना ही है कि हमारे नागरिक प्रशासन का नियामक तंत्र आग लगने पर कुआं खोदने की मानसिकता से मुक्त नहीं होता। यदि समय रहते संवेदनशील या फिर घातक साबित होने वाली स्थिति व परिस्थिति पर नजर रखी जाए तो जनधन की हानि टाली भी जा सकती है। हाल ही में दूषित पेयजल से इंदौर में हुई जन हानि के बाद रोहतक और झज्जर की उन चेतावनियों की अनदेखी नहीं की जा सकती,जिसमें नागरिक घरों में आने वाले गंदे व बदबूदार पानी की शिकायत करते रहे हैं। निश्चय ही इस स्थिति को जन स्वास्थ्य से जुड़े आपातकाल के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके साथ ही नागरिकों की शिकायत की जांच-पड़ताल कर अविलंब कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन इसके बावजूद जवाबदेही न निभाने और एक-दूसरे विभाग पर दोष मढ़ने का पुराना सिलसिला ही अकसर सामने आता है। उल्लेखनीय है कि इंदौर की हालिया दूषित पेयजल की त्रासदी में नगरपालिका द्वारा सप्लाई किए जा रहे पानी के सेवन से कई लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। विडंबना यह है कि वहां भी नागरिकों की शुरुआती चेतावनियों को सामान्य शिकायतों के रूप में देखकर खारिज कर दिया गया था। लेकिन एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत के बाद अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इंदौर में पेयजल पाइपलाइनों में सीवेज का रिसाव हुआ था। यह स्वीकारोक्ति भी तब सामने आई जब बड़ा नुकसान हो चुका था। लगता है कि रोहतक व झज्जर भी इसी तरह के आसन्न खतरे के मुहाने पर खड़े हैं। वैसे देखा जाए तो देश के विभिन्न हिस्सों में सामने आने वाले ऐसे मामले न तो रहस्यमय हैं और न ही ये कोई नई बात ही है। बुनियादी ढांचागत व्यवस्था का जर्जर होना, सीवर लाइनों में रिसाव, अनियोजित शहरी विस्तार और नागरिक एजेंसियों के बीच आवश्यक समन्वय का अभाव, अकसर ऐसी स्थिति पैदा कर देता है, जहां सीवेज और पीने का पानी खतरनाक रूप से एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं।
गाहे-बगाहे देश के विभिन्न भागों में स्थानीय नागरिक जब-तब आरोप लगाते हैं कि पीने के पानी में सीवर का पानी मिलने की आशंका है। ऐसे में शासन-प्रशासन की पहली प्रतिक्रिया, इसके सत्यापन, पाइप लाइन की मरम्मत और वैकल्पिक पेयजल उपलब्ध कराने की होनी चाहिए। ऐसे में स्वास्थ्य संकट को दूर करने और अपनी बात मनवाने के लिये यदि नागरिकों को सड़कों पर उतरना पड़ता है तो यह शासन-प्रशासन की विफलता को ही दर्शाता है। विडंबना यह है कि जल प्रदूषण का सबसे बुरा असर समाज के कमजोर वर्ग पर ही पड़ता है। ऐसे में बच्चे, बुजुर्ग और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोग इसकी चपेट में आते हैं। निर्विवाद रूप से दूषित जल से डायरिया, हेपेटाइटिस और अन्य दूषित जल जनित बीमारियों का प्रभाव तेजी से फैलता है। जिसके चलते अफरा-तफरी के बीच अक्सर स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा जाती है। ऐसे में तंत्र की निष्क्रियता की कीमत आम लोगों को न केवल अस्पताल के भारी-भरकम बिलों के रूप में, बल्कि जानमाल के नुकसान और प्रशासन के प्रति जनता के विश्वास में आई कमी के रूप में भी चुकानी पड़ती है। निश्चित रूप से दूषित पाइपलाइनों को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। व्यापक स्तर पर प्रभावित क्षेत्र में जल स्रोतों का परीक्षण होना चाहिए। साथ ही यह भी जरूरी है कि प्रभावित क्षेत्र में व्यापक स्तर पर लिए गए पानी के नमूनों की जांच के परिणाम भी सार्वजनिक किए जाएं। इसके अलावा आवश्यक है कि दूषित सिस्टम के सुरक्षित प्रमाणित होने तक सुरक्षित वैकल्पिक जल आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिम्मेदारी तय की जाए, न कि बांटी जानी चाहिए। सही मायनों में शहरी प्रशासन की कुशलता को स्वच्छ जल, स्वच्छता और जन-सुरक्षा जैसी बुनियादी बातों के मूल्यांकन के आधार पर मापा जाना चाहिए। ऐसे में इंदौर के घटनाक्रम को एक चेतावनी मानते हुए रोहतक और झज्जर के मामले में तत्काल कार्रवाई करने की जरूरत है।

