जैसे कि पहले से कायस लगाए जा रहे थे, शुक्रवार को लोकसभा में संविधान में प्रस्तावित 131वां संशोधन बिल मतदान के बाद गिर गया। दरअसल, यह बिल देश में महिला आरक्षण कानून में संशोधन के लिए लाया गया था। राजनीतिक पंडित पहले ही कह रहे थे कि संविधान संशोधन के लिये जरूरी दो तिहाई बहुमत सरकार के पास नहीं है, जिससे बिल के पारित होने पर संशय था। वैसा ही हुआ और राजग सरकार दो तिहाई वोट हासिल करने में विफल रही। बिल के समर्थन में 298 और इसके विरोध में 230 वोट पड़े। आखिरकार सरकार की ओर से कहा गया कि अब दोनों बाकी प्रस्तावित संशोधन बिलों को आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया है। उल्लेखनीय है कि महिलाओं को 33 आरक्षण देने वाले कानून में संशोधन को लेकर बुलाए गए विशेष सत्र में पिछले कुछ दिनों से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गरमागरम बहस जारी थी। विपक्ष इस संशोधन में शामिल परिसीमन को लेकर सरकार की घेराबंदी कर रहा था। दरअसल, दक्षिण भारत के उन राज्यों में इसको लेकर खासा विरोध था जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण करके आर्थिक विकास को प्राथमिकता बनाया था। उनकी आशंका थी कि परिसीमन विधेयक के अस्तित्व में आने से संसद में इन राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। विपक्ष में का आरोप है कि संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण संशोधन बिल को पारित करने का उपक्रम महज कुछ राज्यों में हो रहे चुनाव में बढ़त हासिल करने के लिये था। ताकि महिला वोटरों को लुभाया जा सके। विपक्ष ने संसद में जारी बहस के बीच कानून मंत्रालय द्वारा महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को लागू करने के लिये अधिसूचना जारी करने पर भी सवाल उठाये। उल्लेखनीय है कि महिला आरक्षण कानून का उद्देश्य संसद और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिये 33 फीसदी आरक्षण लागू करने का प्रावधान था। मगर राजग सरकार ने प्रस्तावित 131वें संविधान बिल 2026 में सीटों में आरक्षण को परिसीमन के आधार पर लागू करने की बात कही थी।
दरअसल, विपक्ष इस संशोधन बिल की टाइमिंग और आरक्षण को परिसीमन के आधार पर लागू करने की शर्त पर सवाल उठाता रहा है। कांग्रेस पार्टी की ओर से कहा गया कि 33 फीसदी आरक्षण को लोकसभा की मौजूदा सीटों के आधार पर ही लागू करना चाहिए। विपक्ष परिसीमन से उपजी विसंगतियों और दक्षिण के राज्यों की चिंताओं को तरजीह देने की बात करता रहा है। वहीं सत्ता पक्ष की दलील रही कि विपक्ष महिला आरक्षण का विरोध कर रहा है। बिल का मकसद महिला सशक्तीकरण ही है। जिसके लिये इसके लागू करने के तरीके का विरोध किया जा रहा है। सत्ता पक्ष की दलील थी कि परिसीमन संविधान सम्मत है और बढ़ती आबादी के बाद सीटों को तार्किक बनाये जाने की जरूरत है। इस बीच दोनों पक्षों की ओर से एससी-एसटी के हितों के पैरोकार होने की दलीलें भी दी गई। सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर उत्तर-दक्षिण का नैरेटिव गढ़ने का आरोप भी लगाया। साथ ही विपक्ष को महिलाओं के आक्रोश की कीमत चुकाने की भी चेतावनी दी। वहीं विपक्ष ने केंद्र पर देश का चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश का आरोप लगाया। साथ ही कहा कि ये संशोधन दलित व पिछड़े वर्गों के हित में नहीं है। सवाल इस बात को लेकर भी उठाये गए कि 2011 की जनगणना को आधार बनाकर परिसीमन करना कितना न्यायसंगत है। इसके लिये नये जनगणना के आंकड़े आने का इंतजार क्यों नहीं किया जा रहा है। वहीं कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने परिसीमन को संघीय ढांचे को प्रभावित करने वाला बताया। उन्होंने महिला आरक्षण लागू करने को परिसीमन से जोड़ने की तार्किकता को लेकर भी सवाल उठाया। वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात को खारिज किया कि निर्णय प्रक्रिया किसी भी तरह किसी के साथ भेदभाव करेगी। उन्होंने कहा कि परिसीमन पहले के अनुपात के अनुसार ही किया जाएगा। उन्होंने कहा कि 33 फीसदी महिलाओं को यहां आने दें और उन्हें निर्णय करने दें।

