निस्संदेह, देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस को फिलहाल बेहद मुश्किल दौर से गुजरना पड़ रहा है। चुनाव दर चुनाव उसका दायरा लगातार सिमटता ही जा रहा है। वहीं दूसरी ओर चुनावी मोर्चे पर भी कांग्रेस के लिए बीत रहा साल निराशाजनक ही रहा है। कांग्रेस पार्टी को दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त का सामना भी करना पड़ा है। हालांकि, पार्टी ने ‘वोट चोरी’ मुहिम को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने का पुरजोर प्रयास किया, लेकिन इसके बावजूद उसके परंपरागत वोट फिर लौटकर नहीं आए। बल्कि इस मुद्दे पर इंडिया गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों काे भी सकारात्मक प्रतिसाद नहीं मिल सका। पार्टी के लिए आने वाला साल एक नई चुनौती लेकर आ रहा है। आने वाले साल में असम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस पार्टी के 140वें स्थापना दिवस पर शीर्ष नेतृत्व का आत्मविश्वास से भरा रवैया दिखाना स्वाभाविक ही कहा जाएगा। इस आयोजन के दौरान लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि ‘कांग्रेस सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी ही नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज है, जो सदैव हर कमजोर, वंचित और मेहनतकश व्यक्ति के हितों के लिए खड़ी रही है।’ वहीं इस दौरान कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने घोषणा की कि ‘कांग्रेस एक विचारधारा का नाम है और विचारधाराएं कभी नहीं मरतीं।’ लेकिन वास्तव में एक कड़वी सच्चाई यह है कि पार्टी के अस्तित्व पर संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है। पार्टी संगठन में असंतोष की आहटें साफ तौर पर सुनाई दे रही हैं। यह असंतोष किस हद जा पहुंचा है, हालिया घटनाक्रम इसकी पुष्टि करता है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने शनिवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की कुशल संगठनात्मक रणनीति की प्रशंसा और ट्विटर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक पुरानी तस्वीर साझा करते हुए राजनीतिक परिदृश्य में हलचल मचा दी थी। निश्चय ही आम कार्यकर्ता पर इसका सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा होगा।
दरअसल, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने जमीनी स्तर पर कांग्रेस संगठन को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। देखा जाए तो गाहे-बगाहे कांग्रेस संगठन से शीर्ष स्तर पर गहरे तक जुड़े रहे दिग्गज कांग्रेस नेताओं के पार्टी लाइन से हटकर दिए गये बयान पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा करते रहे हैं। जब कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह का भाजपा व आरएसएस की संगठनात्मक शक्ति को लेकर चौंकाने वाला बयान सार्वजनिक विमर्श में आया, तो उनके विचारों के प्रति शशि थरूर का संयमित समर्थन करता दृष्टिकोण भी सामने आया, जो यह भी दर्शाता है कि मौजूदा चुनौतियों के बीच कांग्रेस पार्टी संगठनात्मक शक्ति के पुनर्निर्माण के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं कर सकती। अक्सर कांग्रेस यह दावा भी करती रही है कि इतिहास, मूल्य और विचारधारा उसकी मूल पूंजी हैं। इस पूंजी को चुनावी लाभ में परिवर्तित किया जा सकता है या नहीं, यह बयानबाजी से कम और पार्टी में सुधार, संगठन के पुनर्गठन और जनता से प्रभावी ढंग से पुन: जुड़ने की क्षमता पर अधिक निर्भर करता है। ऐसे समय में, जब राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा का एकछत्र वर्चस्व बना हुआ है और यह कह सकते हैं कि सभी क्षेत्रों में इसका दबदबा कायम है, भाजपा ने तो यहां तक कह दिया है कि कांग्रेस ‘चापलूसों की सेना’ है। साथ ही उसे भारतीय लोकतंत्र की ‘सबसे कमजोर कड़ी’ तक करार दे दिया है। निस्संदेह, यह आलोचना, जो काफी हद तक सच के करीब है, कांग्रेस को आत्ममंथन करने और मौजूदा स्थिति में बदलाव लाने के लिए भी प्रेरित करेगी। इस बात में दो राय नहीं हो सकती है कि अपने एक सौ चालीस साल के इतिहास में कांग्रेस एक चुनौतीपूर्ण मोड़ पर खड़ी हुई है। ऐसे में इस पार्टी का पुनरुत्थान भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने के लिए विपक्ष की संभावनाओं की कुंजी भी साबित हो सकता है। विश्वास किया जाना चाहिए कि अतीत की विफलताओं से सबक लेकर कांग्रेस पार्टी नये साल में नये तेवरों के साथ जनता के दरबार में जाएगी।

