अरावली की फिक्र

वन भूमि के कब्जे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

अरावली की फिक्र

अरावली के संवेदनशील वन क्षेत्र में अवैध आवासीय निर्माण को हटाने की बाबत सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के गहरे निहितार्थों को समझा जा सकता है। इसमें दो राय नहीं कि अवैध खनन व जंगलों के कटान से दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को हुई क्षति को व्यापक अर्थों में देखे जाने की जरूरत है। अरावली पर्वत शृंखला प्रकृति की तल्खी से इस इलाके की रक्षा ही नहीं करती बल्कि लगातार गहराते प्रदूषण से भी वन शृंखला जीवनदान देती है। यही वजह है कि फरीदाबाद जनपद के वन क्षेत्र में लक्कड़पुर-खोरी गांव में तकरीबन दस हजार अवैध आवासीय निर्माणों को हटाने का आदेश देकर सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की पहाड़ियों को बचाने की पहल की है। इस दौरान अदालत की सख्त टिप्पणी से समस्या की गंभीरता को समझा जा सकता है। अदालत ने सख्त लहजे में कहा है कि जमीन हथियाने वाले अदालत में आकर ईमानदार बन जाते हैं लेकिन बाहर कोई कार्य कानून के मुताबिक नहीं करते। यानी दो टूक शब्दों में कहा कि भूमि पर कब्जा करने वाले कानून की शरण लेने के हकदार नहीं हैं। यह संदेश न केवल जमीन पर अवैध भूमि कब्जाने वालों के लिये ही था बल्कि उन अधिकारियों के लिये भी था, जो पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेशों का पालन करने में विफल रहे। अदालत ने पर्यावरण व पारिस्थितिकी को राष्ट्रीय संपत्ति माना है। इसमें दो राय नहीं कि इस तरह के अवैध कब्जे प्रशासन, वन विभाग, स्थानीय निकाय की अनदेखी के बिना संभव नहीं हैं, जिसके लिये बिल्डरों, दलालों तथा स्थानीय नेताओं का समूह भूमिका निभाता है। निगरानी करने वाले विभागों के आंख मूंदने से अतिक्रमण को गति मिलती है। इसमें दो राय नहीं कि कोर्ट के आदेशों से हजारों लोगों पर गाज गिरेगी। इनमें तमाम ऐसे व्यक्ति भी होंगे, जिन्होंने अपनी छत का सपना पूरा करने के लिये पूरी उम्र की कमाई लगाई होगी। कई लोगों ने बैंक व वित्तीय संस्थानों से ऋण भी लिये होंगे। लेकिन उन्हें भी लंबे समय से जारी अदालती चेतावनी व आदेशों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए था।

यहां विचारणीय पहलू यह है कि अतिक्रमण और निर्माण की यह स्थिति कैसे पैदा हुई। क्यों कार्यपालिका पर्यावरण संरक्षण और अरावली को अतिक्रमण से बचाने के प्रति संवेदनहीन बनी रही। अदालत की ग्रीन बेंच गाहे-बगाहे वन भूमि के गैर वन उपयोग को वन कानून का उल्लंघन बताती रही है। अदालत ने मई, 2009 में हरियाणा के अरावली इलाके में खनन गतिविधियों पर रोक लगा दी थी, जिसमें गुरुग्राम व मेवात का हिस्सा भी शामिल था। अदालत का मानना है कि स्वच्छ वातावरण संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है। जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिये संरक्षित करना हमारा दायित्व भी है। इससे अलावा सितंबर, 2018 में भी अदालत ने हरियाणा सरकार को फरीदाबाद के एक एन्क्लेव में अवैध निर्माण को ध्वस्त करने का आदेश दिया था। साथ ही एन्क्लेव का निर्माण करने वाली कंपनी पर अरावली पुनर्वास कोष में पांच करोड़ रुपये जमा कराने का आदेश भी दिया था। ताजे मामले में शीर्ष अदालत ने छह सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट मांगी है। दरअसल, जैसे-जैसे देश की राजधानी व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में जनसंख्या का घनत्व बढ़ा है, बिल्डरों व दलालों का खेल बढ़ा है और आशियाने का सपना सजाये लोग इनके शिकंजे में फंस जाते हैं। जबकि प्रशासन व स्थानीय निकाय की जवाबदेही थी कि वे वन क्षेत्र को चिन्हित करते हुए लोगों को समय रहते इस इलाके में आवासीय निर्माण करने से रोकते। सवाल यह भी है कि जमीन के कागजात पूरा करने तथा निर्माण के नक्शा पास करने वाले अधिकारियों को क्यों नहीं ऐसे मामलों में जवाबदेह बनाया जाता। यही वजह है कि अदालत ने कहा भी कि जिन लोगों के पास दूसरे विकल्प नहीं हैं, उनके पुनर्वास के लिये अलग से विचार किया जा सकता है। बहरहाल, अदालत के हालिया आदेश को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक अर्थों में देखा जाना चाहिए क्योंकि देश में पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील इलाकों में हजारों किलोमीटर वन क्षेत्र पर अवैध कब्जा बना हुआ है। 

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