संवादहीनता का संकट

संवादहीनता का संकट

किसानों को मनाने में केंद्र गंभीर नहीं

इसमें दो राय नहीं कि कृषि सुधारों को लागू करने से पहले किसानों को भरोसे में लेने तथा देशव्यापी विमर्श के लिये जो पहल केंद्र सरकार की तरफ से की जानी थी, वह नजर नहीं आयी। इसके बावजूद पंजाब के किसान संगठनों को दिल्ली आमंत्रित करना और उनसे वार्ता के दौरान किसी मंत्री का उपस्थित न होना, सरकार की संवेदनशीलता पर प्रश्नवाचक चिन्ह ही लगाता है। इसे अपनी उपेक्षा मानकर किसान प्रतिनिधियों का आक्रोशित होना स्वाभाविक ही था। उन्होंने वार्ता से बाहर आकर विरोध भी जताया और सुधार प्रारूप की प्रतियां स्वाह भी की। यही वजह है कि केंद्रीय कृषि सचिव और पंजाब के किसान संगठनों के प्रतिनिधियों की बातचीत अनुत्पादक ही रही। इस प्रकरण ने किसानों से संवाद की संभावनाओं को ही खत्म किया है। किसान प्रतिनिधि उम्मीद कर रहे थे कि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर उनके गिले-शिकवे सुनेंगे और उनकी आशंकाओं को दूर करने का प्रयास करेंगे लेकिन विडंबना यही है कि इस बातचीत में केंद्र सरकार गंभीर नजर नहीं आई। केंद्र सरकार का यही रूखापन किसानों को आक्रोशित कर गया और उन्होंने हाल ही में लागू किये गये तीन कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ आंदोलन को तेज करने की चेतावनी दे डाली। किसान प्रतिनिधियों ने यह महसूस किया कि केंद्र सरकार उनकी चिंताओं के प्रति संवदेनहीनता दर्शा रही है। जाहिर-सी बात है कि जब कृषि मंत्रालय ने किसानों को बातचीत के लिये दिल्ली बुलाया था तो वहां कृषि मंत्री की मौजूदगी बनती थी। लेकिन विडंबना ही कही जायेगी कि ऐसा नहीं किया गया, जिससे किसानों का रोष बढ़ना स्वाभाविक ही है। इसके विपरीत पंजाब के किसान संगठनों के जरिये किसानों तक पहुंच बनाने के लिये केंद्र सरकार ने जो आठ आभासी रैलियां की थीं, उसकी जिम्मेदारी आठ केंद्रीय मंत्रियों को सौंपी गई थी, जिसमें केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी भी शामिल थे, जिन्होंने उस दिन संगरूर और बरनाला के किसानों के लिये ऑनलाइन बातचीत का आयोजन किया। उस दिन असंतुष्ट किसान संगठनों के प्रतिनिधि कृषि भवन में सचिव के साथ बैठक में शामिल नहीं हुए।

निस्संदेह सरकार के कृषि सुधार कानूनों में सुधारों के खिलाफ पंजाब में आक्रोश पूरे देश के मुकाबले ज्यादा है। वजह यह भी कि पंजाब व हरियाणा में मंडी व्यवस्था सुचारु रूप से स्थापित है और यहीं सबसे ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ किसानों को मिलता है। इसके बावजूद यह निर्विवाद सत्य है कि केंद्र सरकार नये कृषि सुधार कानूनों के संभावित लाभों के बारे में किसानों को समझाने में विफल रही है। हंगामेदार राजनीतिक विरोध के बीच जल्दबाजी में पारित बिलों को लेकर किसानों में सुधार की मंशा को लेकर तमाम तरह की आशंकाएं पैदा हुई हैं। यह नाराजगी देशव्यापी है, लेकिन जागरूकता और कृषि संस्कृति के सशक्त होने के कारण पंजाब में विरोध के सुर ज्यादा मुखर हैं। किसान संगठन सवाल उठा रहे हैं कि देशव्यापी लॉकडाउन के बीच कृषि सुधार अध्यादेशों का लाने का क्या उद्देश्य था। सरकार ऐसी हड़बड़ी में क्यों है। विभिन्न मंचों पर इसको लेकर व्यापक विचार-विमर्श की संभावनाओं को सिरे से क्यों खारिज किया गया है, जिसने किसानों में विपक्षी राजनीतिक दलों के विमर्श के अनुरूप शंकाओं को जन्म दिया। इसके बावजूद केंद्र सरकार की ओर से हितधारकों का विश्वास अर्जित करने के लिये गंभीर पहल होती नजर नहीं आ रही है। धीरे-धीरे किसान आंदोलन की दिशा में भटकाव भी आ सकता है। किसान संगठनों के लोग भाजपा नेताओं की घेराबंदी की बात कह रहे हैं। ऐसे में उनके समर्थन में खड़े सतारूढ़ दल के लिये पैदा होने वाली विषम परिस्थितियों से जूझना आसान नहीं होगा। कहने को तो सरकार कृषि को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बताती है, लेकिन समस्या के समाधान में रचनात्मक भूमिका नहीं निभाती। वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों की सक्रियता यह निष्कर्ष न दे कि विरोध के राजनीतिक निहितार्थ हैं। इससे किसान के वास्तविक लक्ष्यों को हासिल करने के मार्ग में दिक्कतें आ सकती हैं। यह वक्त किसान संगठनों को एक मंच पर आकर लक्ष्य के लिये एकजुट होने का है। अन्यथा कृषि सुधारों के लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा।

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