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चेतना रंगते रंग

तन-मन भिगोकर उल्लास रचता पर्व

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पर्व-त्योहारों की धरा भारत में, ऋतुचक्र में बदलाव के साथ सामूहिक उल्लास का पर्व होली, ऐसे वक्त पर आता है जब प्रकृति भी मुस्करा रही होती है। शीत ऋतु की विदाई से जीवन की जड़ता दूर हो रही होती है। खेतों में खिली सरसों और आम्र मंजरियों की महक मन को आह्लादित कर रही होती है। कोयल की कूक हमें ऋतु परिवर्तन का संदेश दे रही होती है। पूरे वातावरण का उल्लास हमारी चेतना को कुदरती रंगों से सराबोर कर रहा होता है। ऐसे परिवेश में होली से उपजा समरसता का रंग हमारी चेतना को रंगता है। होलिका दहन का संदेश यही है कि कलुष की अग्नि में हमारे मन की नकारात्मकता भस्म हो जाती है। नकारात्मकता की राख के बाद ही फाग के रंग रंगत दिखाते हैं। सही मायने में हिरण्यकश्यप प्रतीक है अन्याय,अहंकार और दंभ का। जिसका अंत निश्चित है। वहीं प्रह्लाद पर्याय है सत्य, समानता और समरसता का। जो अग्नि की कसौटी में नई आभा के साथ बाहर आते हैं। वास्तव में हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद हर हृदय में विद्यमान हैं। ये हमारी सोच, संस्कार और दृष्टि से ही पुष्पित-पल्लवित होते हैं। होली का पर्व हमें रंगों में रंगकर समता का समाज रचता है। जहां कोई ऊंचा-नीचा, बड़ा-छोटा, अमीर-गरीब और गोरा-काला नहीं होता। ये रंग हमारी चेतना से विभेद के सभी कारक हटाकर, मैं से हम की ओर उन्मुख करते हैं। फिर हम सहजता व सरलता के भाव से परिपूर्ण होते हैं। हम तमाम कृत्रिमताओं से मुक्त हो, एक दिन स्वच्छंद मन से जीना चाहते हैं। हम तमाम वर्जनाओं को त्यागकर एक बच्चे की मानिंद मौलिक रूप में मनुष्य हो जाना चाहते हैं। कहीं न कहीं हमारी चेतना मानवता के उच्च स्तर को छूती है। जो प्रकृति के उल्लास और मौसम की उमंग से आह्लादित होती है। हमारा मन स्क्रीन के आभासी टच से निकलकर जीवन के वास्तविक स्पर्श का सुख को हासिल करने को उद्वेलित होता है।

सही मायनों में रंगमय होना भी हमें हल्का करता है। ये हल्कापन होली बीत जाने के बाद भी महसूस होता है। दरअसल, आपाधापी के जीवन में हमने इतनी कृत्रिमताएं ओढ़ ली हैं कि जीवन सुख वास्तव में क्या है, हम उसे भोगने से वंचित हो गए हैं। हमारे आस-पड़ोस में संवाद न के बराबर हो गए हैं। हम समाज में विविधता व समावेशी भाव से दूर चले गए हैं। लेकिन जब होली का त्योहार हमें सारी वर्जनाओं से परे वास्तविक जीवन का अहसास कराता है तो हम हल्का महसूस करने लगते हैं। हकीकत यह है कि हमारे समाज में तेजी से बढ़ते मनोकायिक रोगों के मूल में हमारा सहज-सरल जीवन का न जीना है। पर्व-त्योहारों पर जब हम सामूहिक उत्सवों का हिस्सा बनते हैं, तो समरसता का समाज रचा जाता है। एक ताजगी का अहसास करते हैं हम। दरअसल, हमारे जीवन में पैदा होने वाले तनाव की मूल वजह हमारा समाज से अलगाव ही है। संयुक्त परिवारों के बारे में कहा जाता रहा है कि माता-पिता एक ढाल के रूप में हमारे जीवन के उतार-चढ़ावों को झेल लेते थे। संयुक्त परिवार में सुख-दुख का बांट कर रहना हमें कई तरह के तनावों से मुक्त रखता था। यही स्थिति हमारे सामाजिक जुड़ाव के रूप में परिलक्षित होती है। होली की सामूहिकता में समावेशिता का भाव पर्व को चेतना के उत्सव में बदल देता है। दरअसल, होली के रंग केवल हमारे शरीर को ही नहीं छूते, बल्कि हमारे सुकोमल अहसासों को भी छूते हैं। ऋतुराज वसंत इन आत्मीय अहसासों को और समृद्ध करता है। प्रकृति का सौंदर्य इस सुकून को और गहरा करता है। एक तरफ कुदरत की चित्रकारी तो दूसरी तरफ होली के रंग वातावरण को सम्मोहक बना देते हैं। यही इस पर्व का मर्म भी है। यही कारण है कि सामूहिकता व समरसता के इस पर्व को समाज का सेफ्टीवॉल भी कहा जाता है। जो हमारे तनाव, घुटन व कुंठाओं को दूर करके हमें हल्का-फुल्का होने का अहसास कराता है। प्रकृति में परिवर्तन के दौर में आने वाले इस त्योहार की यही खासियत है कि रंग हमें बाहर से ही नहीं बल्कि हमारे अंतर्मन को भी रंगते हैं।

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