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कॉलेज का कलेजा

विरासत से दयाल सिंह की बेदखली अनुचित

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दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह इवनिंग कॉलेज का नाम बदलने की कोशिशें उन्नीसवीं सदी के एक दूरदर्शी और परोपकारी सरदार दयाल सिंह मजीठिया जी की स्मृति और विरासत की घोर अवहेलना को ही दर्शाती हैं। यह कॉलेज उन्हीं के नाम पर दिल्ली में स्थापित और प्रतिष्ठित है। ‘द ट्रिब्यून’ और ‘पंजाब नेशनल बैंक’ के संस्थापक रहे सरदार दयाल सिंह मजीठिया ने एक ऐसे धर्मनिरपेक्ष व समावेशी कॉलेज की स्थापना का स्वप्न साकार करना चाहा, जहां जनहित में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा सके। उल्लेखनीय है कि दिल्ली स्थित इस संस्थान का समृद्ध इतिहास 1910 से तब शुरू होता है, जब मजीठिया जी के निधन के बारह वर्ष बाद लाहौर में इसकी स्थापना हुई थी। लेकिन आज कॉलेज प्रबंधन की ओर से दलील दी जा रही है कि एक ही नाम से डे कॉलेज और इवनिंग कॉलेज संचालित नहीं किए जा सकते हैं। यह कहना तार्किक नहीं लगता कि नाम बदलने से प्रशासनिक कार्यों में किसी भी तरह की सुविधाजनक स्थिति भी बन सकती है। वहीं दूसरी ओर, यह कॉलेज के कलेजे रूपी गरिमामय विरासत और जनभावनाओं को नजरअंदाज करने जैसा है। यहां यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि इस बदलाव की कोशिशों के कानून पहलू भी ऐसा करने की इजाजत नहीं देते। दरअसल, वर्ष 1978 में हस्तांतरण डीड की धारा 12, जिसके तहत ही दिल्ली विश्वविद्यालय यानी डीयू ने कॉलेज का अधिग्रहण किया था, में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि ‘संस्थान दयाल सिंह कालेज के नाम से ही जाना जाता रहेगा।’ इस धारा का उल्लंघन करने की स्थिति में भूमि अधिकार छीनने और जबरन विस्थापन जैसी गंभीर कार्रवाई भी की जा सकती है। निश्चित रूप से इस तरह का जोखिम कोई भी जिम्मेदार प्रशासन हल्के में नहीं लेना चाहेगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि संकाय सदस्यों को सिख योद्धा बंदा सिंह बहादुर के नाम पर कॉलेज का नाम बदलने के प्रस्ताव की जानकारी तब मिली जब पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने वीर बाल दिवस के मौके पर इसकी सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी।

यहां उल्लेखनीय है कि दयाल सिंह इवनिंग कॉलेज एक कालखंड की गरिमामय स्मृतियों को सहेजे हुए है। भारत मां के महान सपूत सरदार दयाल सिंह मजीठिया ने अपने सारी संपत्ति समाज के लिये समर्पित कर दी थी। उन्होंने अपना जीवन एक स्वतंत्र प्रेस, उत्तर भारत में शिक्षा के प्रसार के लिये एक उच्चस्तरीय कॉलेज तथा जागरूकता के लिये पुस्तकालय की स्थापना के लिये लगाया। जिसका मकसद समाज में प्रगतिशील सोच विकसित करना और अज्ञानता को समाप्त करना ही था। ऐसे में एक पुनीत उद्देश्य के लिये स्थापित कॉलेज का नाम बदलने का प्रबंधनतंत्र द्वारा इस तरह का एकतरफा निर्णय विश्वविद्यालय के मूल सिद्धांत को ही कमजोर करता है। जिसका मूल उद्देश्य परामर्श और आम सहमति से कार्य करना होता है। इन कोशिशों के बीच कॉलेज के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों ने ऐसे किसी प्रयास का विरोध करने का फैसला किया है। कर्मचारी संघ द्वारा पारित प्रस्ताव में कॉलेज की पहचान और भविष्य को प्रभावित करने वाले इस कदम को लेकर असंतोष जताया गया है। छात्रों में भी इस बात को लेकर रोष देखा गया है। इसमें दो राय नहीं कि कोई भी शैक्षणिक संस्थान केवल ज्ञान का केंद्र ही नहीं होता, बल्कि सामूहिक स्मृति का संरक्षक भी होता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017 में भी महाविद्यालय का नाम बदलकर ‘वंदे मातरम‍् महाविद्यालय ’ रखने का प्रयास किया गया था। लेकिन यह प्रयास हितधारकों के विरोध के चलते सिरे नहीं चढ़ सका था। अब बदलाव की कोशिश करने वालों को पिछले असफल प्रयास को एक सबक के रूप में देखना चाहिए था। दिल्ली विश्वविद्यालय को ऐसे किसी प्रयास से पहले विचार विमर्श करने तथा चिंतन करने की आवश्यकता है। खासकर, ऐसे वक्त में जब एक महान व्यक्तित्व का नाम और साथ ही एक सदी से अधिक की शैक्षणिक और नैतिक विरासत दांव पर लगी हो।

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