पिछले दिनों आईआईटी खड़गपुर के डायरेक्टर प्रो. सुमन चक्रवर्ती के उस बयान ने चौंकाया कि कोचिंग के कारोबार ने छात्रों की सोचने की क्षमता को घटाया है। वे प्रतिभा विस्तार व मौलिक सोच में विकास के बजाय कोचिंग उद्योग के चतुराई के खेल में शामिल हो रहे हैं। वे दिमाग के इस्तेमाल के बजाय जेईई प्रवेश परीक्षा के लिए ट्रिक्स से गलत ऑप्शन हटाना सीख रहे हैं। फलतः वे आईआईटी जैसे उच्च संस्थानों में प्रवेश तो पा जाते हैं, लेकिन गुणवत्ता की शिक्षा से साम्य बैठाने में असफल साबित होते हैं, जिससे उनकी आईआईटी में बैक लगने यानी कुछ विषयों अनुतीर्ण होने से बैक लगने की स्थिति पैदा हो रही है। जिससे वे अक्सर तनाव में आ जाते हैं। हो सकता आने वाले समय में किसी अध्ययन व शोध से यह बात सामने आए कि उच्च तकनीक संस्थानों में बढ़ती आत्मघात की प्रवत्ति के पीछे कोचिंग संस्थानों की भेड़चाल से उपजी विसंगतियां हों। निश्चय ही यह स्थिति भारतीय उच्च व तकनीकी संस्थानों में विकसित हो रही इस नकारात्मक प्रवृत्ति को बढ़ाने वाली है। एक समय था कि भारतीय प्रतियोगिता परीक्षाओं की प्रणाली में स्वस्थ स्पर्धा हुआ करती थी। प्रतिभावान विद्यार्थी ही उच्च तकनीकी संस्थानों में प्रवेश पा सकते थे। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में बाजार के लगातार बढ़ते दखल ने सारी स्थिति ही उलट कर रख दी। वहीं दूसरी ओर सीबीएसई और अन्य शिक्षा बोर्डों द्वारा सौ फीसदी तक अंक दिए जाने ने राज्यों के बोर्डों से परीक्षा उतीर्ण करने वाले छात्रों को हीन भावना से भर दिया। निस्संदेदह, वह शिक्षा प्रणाली सवालों के दायरे में आनी चाहिए, जिसमें असंभव से लगने वाले सौ फीसदी अंक छात्रों को दिए जाते हैं। सौ फीसदी अंक एक नहीं कई-कई छात्रों को दिए जाते हैं। वहीं राज्यों के विभिन्न बोर्डों में परीक्षक कंजूसी से नंबर देकर पहले ही छात्रों को राष्ट्रीय स्पर्धा से बाहर कर देते हैं। निश्चय ही यह स्थिति देश के लाखों छात्रों के साथ अन्याय जैसी है।
दरअसल, देश में पहले भी कोचिंग व्यवस्था मौजूद रही है। लेकिन एक सहायक की भूमिका में। आज कोचिंग कारोबारियों द्वारा उसे छात्रों के भविष्य का निर्धारण करने वाले एकमात्र विकल्प के रूप में बताया जा रहा है। यह व्यवस्था देश में व्याप्त आर्थिक विभेद को भी और बढ़ाती है। तय है कि संपन्न घरों से आने वाले बच्चे महंगी कोचिंग पाकर गुदड़ी के लालों के जीवन पर सदैव भारी पड़ेंगे। फलतः कुछ मध्यमवर्गीय परिवारों के अभिभावक बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए कर्ज लेकर कोचिंग का जुगाड़ करते हैं। अपना पेट काटकर वे बच्चों को महंगे कोचिंग संस्थानों में भेजते हैं। कई अभिभावक अक्सर कर्ज में डूब जाते हैं। वहीं शैक्षिक गुणवत्ता के नजरिये से देखें तो पहले जब कोचिंग एक सहायक की भूमिका में थी तो छात्र विस्तृत पढ़ाई से विषय को समझने का प्रयास करते थे। अब पूरी व्यवस्था कोचिंग केंद्रित होने से शिक्षा की व्यापकता खत्म हो रही है। इसका नकारात्मक प्रभाव यह है कि छात्र परीक्षा के तीन घंटों में सवाल समझकर हल करने की बजाय गलत विकल्पों को हटाने की कोचिंग्स द्वारा सिखायी ट्रिक्स इस्तेमाल करते हैं। दरअसल, कोचिंग संस्थानों के तौर-तरीकों से छात्रों को ‘स्पून फीडिंग’ की लत लग जाती है। वहां हिंदी में पढ़ाई होती है और तैयार नोट्स को बार-बार रटाया जाता है। वहीं विडंबना यह है कि आईआईटी आदि उच्च तकनीकी संस्थानों में पढ़ाई अंग्रेजी में होती है। वहां समेस्टर सिस्टम में पढ़ाई सेल्फ-स्टडी पर आधारित होती है। यही वजह है कि महज ट्रिक्स द्वारा आईआईटी में प्रवेश करने वाले छात्र आगे की पढ़ाई के साथ साम्य नहीं बैठा पाते। उनको कई विषयों में पूरक परीक्षा देनी पड़ती है, जिससे सुनहरे सपने लेकर आए छात्र गहरे तनाव में आ जाते हैं। कई जगह होने वाले आत्मघात के पीछे यह कारण भी हो सकता है। वहीं टॉपर छात्रों को मीडिया तथा सोशल मीडिया में कोचिंग संस्थानों व अभिभावकों द्वारा सेलिब्रिटी की तरह पेश किया जाता है, जिससे वे इस ग्लैमर से ओवर कॉन्फिडेंट हो जाते हैं। वहीं परिवार का दबाब भी तनाव बढ़ाता है। इस गंभीर स्थिति का समाधान नीति-नियंताओं का करना चाहिए।

