भारत में लंबे समय से अभिभावक, शोध निष्कर्ष और मीडिया बता रहा था कि बच्चों पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का घातक प्रभाव पड़ रहा है। लेकिन हमारे नीति-नियंता इस तरह के मामलों में तब ध्यान देते हैं जब इस बाबत निष्कर्ष पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका से आएं। फेसबुक और इंस्टाग्राम से बच्चों को हुए नुकसान को लेकर पिछले दिनों अमेरिका की अदालतों में वाद दायर किए गए। इस बाबत किए गए दावों के बाद मेटा को 18 अरब डॉलर तक भुगतान करने का फैसला अदालतों ने दिया। इस जुर्माने से इस बात को भी मान्यता मिली है कि नुकसान सिर्फ सोशल मीडिया के इस्तेमाल के तरीके से ही नहीं होता, बल्कि उसके डिजाइन से भी हो सकता है। आरोप लगे थे कि इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि बच्चों को इसकी लत लग जाती है। दरअसल, यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है कि किस तरह बच्चों को उपभोक्ता में तब्दील किया जा रहा है। चिंता की बात यह है कि माता-पिता स्क्रीन टाइम को तो सीमित कर सकते हैं, लेकिन वे उन एल्गोरिदम को नहीं देख सकते हैं, जो यह तय करते हैं कि उन घंटों के दौरान बच्चा क्या देखता है। दरअसल, इन प्लेटफॉर्म द्वारा बड़ी ही चालकी से इनफिनेट स्क्रॉलिंग, पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन, नोटिफिकेशन, लाइक्स और दूसरे एंगेजमेंट टूल इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे बच्चों का बार-बार ध्यान खींचें और उन्हें छोटी स्क्रीन पर वापस लाएं।
दरअसल, अभिभावकों ने अमेरिकी अदालत में कहा कि प्रश्न यह नहीं है कि बच्चे अधिक समय तक ऑनलाइन रहते हैं, बल्कि यह है कि प्लेटफॉर्म को बच्चों को लत लगाने के लिये डिजाइन किया गया है। मेटा ने कुछ सुरक्षा उपायों को लेकर प्रस्ताव रखे हैं, जिसमें रोजाना की सीमाएं, रात के समय की पाबंदियां तथा लगातार बढ़ावा देने वाले फीचर्स में बदलाव शामिल है। लेकिन इसके बावजूद कंपनी का विज्ञापन आधारित बिजनेस मॉडल काफी हद तक वैसा ही बना रहेगा। इससे अभिभावकों की चिंता बढ़ी है कि जब तक कंपनी का व्यावसायिक मॉडल नहीं बदलेगा, सकारात्मक नतीजों की उम्मीद बेमानी होगी। अमेरिका में अभिभावकों की जीत के बाद भारत को सबक लेते हुए जल्दबाजी में इस पर पूरी तरह बैन लगाने से बचना चाहिए। सारी जिम्मेदारी अभिभावकों की भी न हो। इसके लिये जो डिजिटल नियम बनें, उनमें प्लेटफॉर्म्स को प्रोडक्ट डिजाइन से होने वाले संभावित नुकसान हेतु जवाबदेह बनाना चाहिए। साथ ही बच्चों को लक्षित करने वाले व्यवहार संबंधी विज्ञापनों पर सख्त रोक लगानी चाहिए। बच्चों द्वारा प्रयुक्त किए जाने वाले रिकमेंडेशन सिस्टम का स्वतंत्र ऑडिट हो। वहीं उम्र की पुष्टि करने वाले सिस्टम को बच्चों की निजी जानकारी का ऐसा डेटाबेस नहीं बनाना चाहिए, जो उनकी निजता में हस्तक्षेप कर सके। फोन में सेप्टी सेटिंग्स हमेशा विद्यमान रहनी चाहिए, ताकि मां-बाप को माथापच्ची करके उसे ढूंढ कर चालू न करना पड़े। निस्संदेह, जिन प्लेटफॉर्म्स के पास बच्चों को लत लगाने की तकनीक है, उनके पास ही नुकसान को कम करने की तकनीक भी है। अत: जिम्मेदारी प्लेटफॉर्म की हो।

