सही मायनों में पंजाब तथा हिमाचल प्रदेश में सीमा प्रवेश शुल्क को लेकर जारी विवाद ने देश के संघीय ढांचे में व्याप्त एक गहरी खामी को ही उजागर किया है। जो बताता है कि देश के राज्यों की राजस्व जरूरतों तथा अंतर्राज्यीय आवागमन के सिद्धांतों के बीच टकराव के कारण मौजूद हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि हिमाचल प्रदेश फिलहाल वित्तीय संकट की चुनौती से रूबरू है। उसने अपने वित्तीय संसाधन बढ़ाने के लिये दूसरे राज्यों से आने वाले वाहनों पर राज्य में प्रवेश करने का शुल्क लगभग दोगुना करने का निर्णय लिया है। हालांकि, हिमाचल प्रदेश ने यह फैसला अपने आय के स्रोतों को बढ़ाने के लिए लिया था। लेकिन यह वित्तीय फैसला बाद में हिमाचल प्रदेश व पंजाब में राजनीतिक व आर्थिक विवाद का रूप ले चुका है। यही वजह है इस फैसले से ज्यादा प्रभावित राज्य पंजाब ने भी हिमाचल प्रदेश के वाहनों पर ऐसे ही कर बढ़ाने की धमकी दे दी है। वास्तव में हिमाचल सरकार का यह फैसला दूरगामी दृष्टिकोण को नहीं दर्शाता है। यह सर्वविदित है कि हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था बहुत अधिक हद तक पर्यटन उद्योग पर ही निर्भर है। ऐसे में इस कदम का राज्य के पर्यटन उद्योग पर नकारात्मक असर भी पड़ सकता है। यह बढ़ाया गया प्रवेश शुल्क पर्यटकों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है। खासकर पड़ोसी राज्य पंजाब से आने वाले कम बजट के साथ यात्रा पर निकले पर्यटकों के लिये, जो कि सप्ताहांत में आने वाले पर्यटकों का एक बड़ा हिस्सा है। निस्संदेह, इस फैसले से ऐसे पर्यटक हतोत्साहित हो सकते हैं। इस समस्या का एक पहलू यह भी है कि मौजूदा प्रतिस्पर्धी पर्यटन के परिदृश्य में टैक्स बढ़ाए जाने पर पर्यटक वैकल्पिक पहाड़ी पर्यटक स्थलों की ओर रुख कर सकते हैं। राज्य द्वारा बाद में इस कर-वृद्धि के फैसले की समीक्षा करने का निर्णय लेना, निश्चित रूप से इस मुद्दे की आर्थिक संवेदनशीलता को ही दर्शाता है।
यह भी एक हकीकत है कि दो राज्यों के बीच लिए गए कर बढ़ाने के ऐसे फैसलों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत होनी चाहिए। यह जानते हुए कि हिमाचल प्रदेश गंभीर आर्थिक चुनौती का सामना कर रहा है, पंजाब की प्रतिक्रिया संवेदनशील ढंग से सामने आनी चाहिए थी। ऐसे में पंजाब की हिमाचल की तर्ज पर कर बढ़ाने की चेतावनी प्रतिशोधात्मक नीति पर चलने के अप्रिय फैसले को ही उजागर करती है। इस तरह की बदले में कर लगाने की नीति राजनीतिक दृष्टि से भले ही सुविधाजनक लगती हो, लेकिन आम लोगों को इसका खमियाजा भुगतना पड़ता है। ऐसे निर्णय से दैनिक यात्रियों, परिवहन उद्योग से जुड़े लोगों और छोटे व्यवसायियों की आवाजाही बाधित हो सकती है। इनकी यात्रा की सुगमता सीमा पार सुचारू आवागमन पर निर्भर करती है। निर्विवाद रूप से दोनों राज्यों के बीच अंतर्राज्यीय गलियारे व्यापार, श्रम गतिशीलता और क्षेत्रीय एकीकरण की जीवन रेखा के पर्याय होते हैं। यदि हम व्यापक स्तर पर इस समस्या को देखें तो यह घटनाक्रम देश के संघवाद की भावना पर भी प्रश्न उठाता है। यह एक हकीकत है कि वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी ढांचे द्वारा समर्थित हमारी आर्थिकी की संरचना का लक्ष्य आंतरिक व्यापार बाधाओं को कम करना है। दूसरे अर्थों में देखें कि बाहरी राज्यों से आने वाले वाहनों पर असमान रूप से लक्षित करके अतिरिक्त प्रवेश-कर लगाना, इस उद्देश्य को कमजोर कर सकता है। जो अतीत की उस दोषपूर्ण ‘चेक पोस्ट’ अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर सकती है, जो तमाम विसंगतियों को लिए हुए थी। निर्विवाद रूप से ऐसे मामलों में अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होगी। यदि राज्य का राजस्व वृद्धि ही लक्ष्य है तो इसके लिये तर्कसंगत टोल प्रणाली को अपनाना होगा। वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढांचे के रखरखाव से जुड़े लक्षित उपयोगकर्ता शुल्क जैसे विकल्पों पर भी विचार करना होगा। साथ ही अंतर्राज्यीय संबंधों को टकराव की बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाने की जरूरत है। वह भी तब जब हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र और पंजाब के मैदानी इलाके आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं। पड़ोसी को साझेदार की बजाय राजस्व स्रोत के रूप में देखने की प्रवृत्ति दोनों के लिये नुकसान दायक साबित होगी।

