यह जरूरी है कि देश में जन्म व मृत्यु से जुड़े आंकड़े प्रामाणिक हों और समय रहते दर्ज कर लिए जाएं। इससे जनसंख्या गणना, मतदाता की विश्वसनीयता और अंतत: विकास योजनाओं के लिये विश्वसनीय आंकड़े जुटा पाना संभव होता है। वहीं दूसरी ओर अवैध घुसपैठियों और विदेशी नागरिकों की पहचान भी संभव हो पाती है। जो कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी है। इसी आलोक में संसद द्वारा हाल ही में ‘जन्म और मृत्यु पंजीकरण( संशोधन) विधेयक’ को पारित करना, देश की नागरिक पंजीकरण प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। दरअसल, यह संशोधन सुनिश्चित करता है कि जन्म व मृत्यु का पंजीकरण समय रहते कर लिया जाए। यह कानून देर से होने वाले पंजीकरण के लिए सख्त नियम लागू करता है। नये संशोधन के तहत, जन्म व मृत्यु के दो साल बाद रिपोर्ट किए गए मामलों में मौजूदा कार्यकारी मंजूरी की जगह अब प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होगी। निस्संदेह, फर्जी पंजीकरण को रोकने की दिशा में सरकार का उद्देश्य सराहनीय है, लेकिन यह संशोधन लोगों की पहुंच और समावेशिता के बाबत कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है। निस्संदेह, आज देश ने सिविल रजिस्ट्रेशन यानी जन्म-मृत्यु पंजीकरण के मामलों में बहुत अच्छी प्रगति की है। आज देश में 99 फीसदी से अधिक जन्म और मृत्यु का रिकॉर्ड रखा जाता है। दरअसल, देश में बड़ी चुनौती सिर्फ रजिस्ट्रेशन की ही नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि जन्म व मृत्यु होने पर 21 दिन के भीतर सूचना दर्ज कर ली जाए। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि प्रक्रियागत बाधाएं बढ़ाने की बजाय, समय पर रिपोर्टिंग करने को सहज व सरल बनाया जाए। लोगों को इस बाबत जागरूक करने की भी जरूरत है। साथ ही मौजूदा नियमों को सख्ती से लागू करने से अधिक नीतिगत मामलों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। सरकार का दावा है कि न्यायिक जांच से पंजीकरण में होने वाली गड़बड़ियों पर रोक लगायी जा सकेगी।
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि वर्ष 2023 संशोधनों के तहत कई सरकारी सेवाओं के लिये जन्म प्रमाण पत्र पहचान का मुख्य दस्तावेज बन गया है। हालांकि, इस बाबत दो साल की समय-सीमा चुनने के पीछे की वजह को तार्किक आधार पर नहीं बताया गया है। वहीं कई ऐसे वाजिब कारण हैं जिसके चलते पंजीकरण देर से होता है। उदाहरण के लिये लें तो दूरदराज के इलाकों में जन्म, पलायन और जागरूकता की कमी के कारण भी जन्म-मृत्यु के पंजीकरण में विलंब होता है। लेकिन अब नये कानून से प्रभावित परिवारों के लिये खर्च और देरी, दोनों ही बढ़ सकते हैं। यह विडंबना ही है कि यह बिल संसद के दोनों सदनों में जारी लगातार हंगामे के बीच पास हुआ। जिसकी वजह से इस महत्वपूर्ण बिल पर कोई सार्थक बहस नहीं हो सकी। वास्तव में होना तो यह चाहिए था कि हर नागरिक की कानूनी पहचान को प्रभावित करने वाले कानून की गहनता से पड़ताल की जाती। जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष को बराबर की जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी। निस्संदेह, कुशल प्रशासन में कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंचने और चुनावी ईमानदारी के लिये एक मजबूत व पारदर्शी नागरिक पंजीकरण प्रणाली अपरिहार्य ही है। वास्तव में इस संशोधन की प्रभावशीलता को सिर्फ धोखाधड़ी रोकने की क्षमता से नहीं देखा जाना चाहिए। सावधानी इस बात को लेकर भी की जानी चाहिए कि कोई भी वास्तविक नागरिक कानूनी पहचान से वंचित न रह जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो सुरक्षा उपाय नागरिकों की पहुंच में बाधा नहीं बनने चाहिए। सही मायने में अच्छी गवर्नेंस, प्रशासनिक ईमानदारी और लोगों के अधिकारों, दोनों को ही सुरक्षित रखने में है। यह जरूरी है कि लोग समय पर जन्म व मृत्यु की सूचना का पंजीकरण कराएं, लेकिन इसे दर्ज करने की प्रक्रिया सहज-सरल होनी चाहिए। जिसके लिए लोगों को जागरूक करने की भी जरूरत है। साथ ही अपरिहार्य कारणों से हुए विलंब पर सख्ती करने के बजाय सुधारात्मक प्रयासों को तरजीह दी जानी चाहिए।

