पंजाब में विधानसभा चुनाव से सिर्फ दस महीने पहले, राज्यसभा के सात सांसदों द्वारा आम आदमी पार्टी का साथ छोड़ने से पार्टी का संकट गहराता नजर आ रहा है। बगावती तेवरों वाले तीन राज्यसभा सदस्यों राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने पार्टी में विभाजन की घोषणा करते हुए कहा है कि उच्च सदन में आप के दो-तिहाई सांसद यानी दस में सात सदस्यों ने एक गुट के रूप में भारतीय जनता पार्टी में विलय करने का निर्णय कर लिया है। हाल के महीनों में खासे मुखर रहने वाले राघव चड्ढा को राज्यसभा में आप के उपनेता पद से हटाये जाने के बाद उनके द्वारा शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोलने के बाद तो विभाजन के संकेत मिलने शुरू हो गए थे। विडंबना यह है कि राज्यसभा में राघव चड्ढा के स्थान पर आप के उप नेता की जगह लेने वाले अशोक मित्तल ने भी उनका ही साथ दिया है। इसमें दो राय नहीं कि बीते साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों मिली करारी हार के बाद आम आदमी पार्टी के लिये यह सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। एक समय था कि राघव चड्ढा को आम आदमी पार्टी में नई पीढ़ी का ऊर्जावान प्रतीक चेहरा माना जाता रहा है। अब वे ही आप नेतृत्व पर पार्टी के मूलभूत आदर्शों से पीछे हटने का आरोप लगा रहे हैं। राघव व पार्टी के अन्य बागी सांसदों ने आरोप लगाया है कि आम आदमी पार्टी जनसरोकारों को प्राथमिकता देने के बजाय निजी लाभ को तरजीह दे रही है। उनके निशाने पर आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ही हैं। जिन्हें पंजाब में मान सरकार की बागडोर दिल्ली से संचालित करने वाला माना जाता रहा है। जैसा कि आपेक्षित था, आबकारी नीति मामले में मुश्किल में फंसे और अदालती लड़ाई लड़ रहे केजरीवाल ने इन सांसदों पर विश्वास तोड़ने और पंजाब की जनता से छल करने का आरोप लगाया है।
केजरीवाल ने आप से अलग होने वाले सांसदों पर पंजाब के लोगों के साथ विश्वासघात करने वाला बताया है। वहीं दूसरी ओर भाजपा भी केजरीवाल के निशाने पर है, जिस पर उन्होंने सुनियोजित साजिश करके आम आदमी पार्टी को कमजोर करने का आरोप लगाया है। वास्तव में भाजपा सीमावर्ती राज्य पंजाब में विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी जड़ें मजबूत करने की कवायद में जुटी है। इसी कड़ी में भगवा पार्टी ने हाल के वर्षों में पंजाब के कई कांग्रेसी नेताओं को अपने पाले में करने में कामयाबी पायी है। निश्चित रूप से राज्य सभा में आप के दो तिहाई सांसदों का टूटकर भाजपा में मिलना आम आदमी पार्टी के लिये बड़ी चुनौती है। जिसके चलते पंजाब में अपनी खोई जमीन पाने के लिये पार्टी को एकजुट करके आगे बढ़ने की बड़ी चुनौती सामने खड़ी है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि आप के कुछ और नेता आगामी दिनों में भाजपा का दामन थाम लें। लेकिन यहां सवाल आप सुप्रीमो पर उठ रहे हैं कि क्या उन्होंने इन नेताओं को राज्यसभा का टिकट देते वक्त पार्टी की रीति-नीतियों की कसौटी पर परखा था या फिर पार्टी की आर्थिक प्राथमिकताओं को ही उनकी योग्यता मान लिया गया था। जाहिर है ये लोग सार्वजनिक जीवन में बहुत चर्चित चेहरे होने के बजाय आर्थिक रूप से समृद्ध लोग रहे हैं। जब चयन में आर्थिक प्राथमिकताएं होती हैं तो चयनित सदस्यों के निर्णय में भी लाभ-हानि का गणित ही प्रभावी रहता है। यहां सवाल कुछ सासंदों के कारोबारी छिद्रों पर सरकारी एजेंसियों का दबाव का भी है, जिन पर पिछले दिनों कार्रवाई भी हुई थी। अनुमान लगाये जा रहे हैं कि शायद इस कार्रवाई के बाद विभिन्न कारोबार से जुड़े अन्य सांसद भी दबाव में आ गए। उन्होंने केंद्र में सत्तारूढ़ राजग की धुलाई मशीन से गुजरना ज्यादा सुरक्षित महसूस किया। बहरहाल, इस घटनाक्रम ने अन्य राज्यों में विपक्षी दलों के लिये भी खतरे की घंटी बजा दी है। निश्चय ही इंडी गठबंधन के लिये अपने दलों को एकजुट रखना आने वाले दिनों चुनौती साबित हो सकता है।

