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एकता के सूत्र में पिरोने का माध्यम बने

एकता के सूत्र में पिरोने का माध्यम बने

हिंदी की समृद्धि की यात्रा अनवरत जारी है। सूचना क्रांति और आधुनिक तकनीक ने उसे विस्तार ही दिया है। कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि राजाश्रय में हिंदी की हनक बढ़ी है। लालकिले से लेकर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन तक में जब प्रधानमंत्री देश-दुनिया को हिंदी में संबोधित करते हैं तो उन्हें ध्यान से सुना जाता है। केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं और नीतियों का नामकरण हिंदी वाले शब्दों में नजर आता है। बीच में राज्यों से संवाद को लेकर भी एक पहल हुई थी, जिसे राजनीतिक विरोध के चलते वापस लेना पड़ा था। बहरहाल, हिंदी में देश की आत्मा बसती है। देश के दक्षिण और पूर्वोत्तर में लोग भले ही हिंदी में पारंगत न हों, मगर वे फिर भी संवाद करने की कोशिश जरूर करते हैं। इस दिशा में फिल्मों व टीवी ने बड़ी भूमिका निभायी है। यह अतिशयोक्ति होगी कि कोई कहे कि वह हिंदी नहीं जानता। धाराप्रवाह न बोल सके, लेकिन टूटी-फूटी ही बोले, मगर संवाद कायम जरूर कर सकता है। कई बार ऐसे रोचक प्रसंग सामने आते हैं कि रूस, अफ्रीका और यूरोपीय देशों के लोग हिंदी न जानते हुए भी हिंदी गानों को निर्दोष उच्चारण में दोहराते हैं। कमोबेश दक्षिण भारत, कश्मीर व पूर्वोत्तर से आने वाले प्रतिभागी टीवी के गीत-संगीत के कार्यक्रमों में स्पष्टता से हिंदी शब्दों का उच्चारण करते हैं। सही मायनो में देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाली भाषा की दरकार आजादी के बाद से ही रही है। यह लक्ष्य पूरा हो भी जाता, यदि इसको लेकर राजनीति न होती।

बहरहाल, हिंदी का कुनबा लगातार विस्तार पा रहा है। इंटरनेट और मोबाइल फोन में हिंदी वर्णमाला की सुविधा ने हिंदी में संवाद की सुविधा को विस्तार दिया है। लेकिन चिंता इस बात की भी है कि हिंदी के व्याकरण और शुद्धता की लगातार अनदेखी की जा रही है। नयी पीढ़ी की संक्षिप्तीकरण की पहल के चलते हिंदी की दशा की चिंता होती है। वहीं पत्र-पत्रिकाओं का अंग्रेजी मिश्रित हिंदी का मोह यदाकदा परेशान करता है जब खबरों व लेखों के शीर्षकों को पढ़ते वक्त अवरोध पैदा होता है। बहरहाल, हिंदी को पांडित्यपूर्ण भाषा बनाने से परहेज भी होना चाहिए। देश में अनुवाद के नाम पर हिंदी को जो जटिल बनाने की कोशिश हुई, उसने अन्य भाषाओं के लोगों को हिंदी से दूर ही किया है। आज अगर हम चाहते हैं कि हिंदी का विस्तार हो तो जरूरत हिंदी के स्वरूप को विराट बनाने की है, जिसमें तमाम भारतीय भाषाओं के उन शब्दों को शामिल किया जाये जो देश में समझे-बोले जा सकते हैं। इसी सोच के साथ अंग्रेजी ने विस्तार पाया है और तमाम अन्य भाषाओं के शब्दों काे अंगीकार किया है। जरूरत इस बात की है कि देश में विज्ञान व गणित पाठ्यक्रम हिंदी में उपलब्ध हो। तकनीकी पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता वाली हिंदी की किताबें तैयार की जायें, जिससे देश में वैज्ञानिक सोच का विकास मातृभाषा के जरिये हो सके। आज का दिन इस पर मंथन करने का है।

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