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हास्य पर बंदिश

कॉमेडियनों को धमकाना निंदनीय कृत्य

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आज सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के दौर में पूरी दुनिया में गहरे तंज करती डिजिटल सामग्री का उफान है। जो दुनिया की भौगोलिक सीमाओं और सत्ता के शिकंजे से मुक्त होकर स्वतंत्र प्रवाह लिए हुए है। लेकिन इसके बावजूद देश में स्टैंडिंग कॉमेडियनों और व्यंग्यकारों के लिए राजनेताओं पर व्यंग्य करना तलवार की धार पर चलने जैसा बना हुआ है। ‘नाक पर मक्खी न बैठने देने’ वाले सत्तारूढ़ राजनेता कॉमेडियनों पर शिकंजा कसने को तैयार बैठे होते हैं। इसी कड़ी में हैदराबाद के कॉमेडियन शरत उदय के बेंगलुरु स्थित स्टैंड-अप शो में शनिवार को तेलुगु देशम पार्टी यानी टीडीपी के समर्थकों के एक समूह ने मंच पर आकर जो उत्पात मचाया, निस्संदेह वह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। टीडीपी के समर्थकों ने मंच पर आकर उन्हें तेलुगु देशम पार्टी के नारे लगाने को बाध्य किया। इस हुड़दंग से यह कार्यक्रम बाधित हो गया। इसके चलते न केवल उदय को अपना कार्यक्रम रोकना पड़ा, बल्कि एक बार फिर माफी मांगनी पड़ी। दरअसल, दो साल पहले उदय के व्यंग्यात्मक चुटकुलों के जरिये आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू और उनके बेटे राज्य मंत्री नारा लोकेश को लक्षित किया गया था। निस्संदेह,यह अभिव्यक्ति व रचनात्मकता पर अंकुश लगाने का कुत्सित प्रयास ही कहा जाएगा। सही मायनों में यह घटनाक्रम हास्य-व्यंग्यपूर्ण असहमति के प्रति बढ़ती असहनशीलता का एक और उदाहरण है। गाहे-बगाहे विभिन्न राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक दलों द्वारा ऐसी अलोकतांत्रिक प्रतिक्रियाएं सामने आती ही रहती हैं। जबकि हकीकत यह है कि हास्य का संसार बड़े लोगों की सहिष्णुता व उदारता से ही फलता -फूलता है। खासकर उस भारतीय समाज में जहां अकसर कबीरदास की यह उक्ति दोहरायी जाती है – ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।’ उनका कहना था कि आलोचक हमारी कमियां बताकर हमारे स्वभाव को शुद्ध और निर्मल बना देते हैं। सही मायनों में व्यंग्य व हास्य इंसान की सहज अभिव्यक्ति के तौर पर लिया जाना चाहिए।

निश्चित रूप से यदि हमारे राजनेता व बड़े लोग व्यंग्य या आलोचना को सहजता से लेते हैं तो इससे समाज में हास्य-विनोद भरपूर फलता-फूलता है। विशेष रूप से राजनीतिक व्यंग्य भारत में लंबे समय तक सत्ता को आईना दिखाता रहा है। पंडित नेहरु जैसे नेता कार्टूनिस्टों की तल्ख अभिव्यक्ति को सहजता से लेते थे और व्यंग्यकारों का सम्मान करते थे। धीर-गंभीर राजनेता आलोचना को जनता की नसीहत मानते रहे हैं। कालांतर राजनेताओं की इस सोच में पराभव देखा गया है। विडंबना ही है कि वर्ष 2024 में नायडू व लोकेश पर किए गए व्यंग्य के लिये उदय को फिर से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को मजबूर किया गया। यह अशोभनीय प्रयास यही दर्शाता है कि वर्ग विशेष में असहमति को राजनीतिक उद्देश्यों के लिये हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। उदय प्रकरण भी इसी दुखद स्थिति के सिलसिले का हिस्सा है। हाल ही में कॉमे़डियन अनुदीप कटिकाला और रफीक मोहम्मद को आंध्र प्रदेश पुलिस ने उन वीडियो के सिलसिले में गिरफ्तार किया था, जिसमें उन्होंने उप मुख्यमंत्री पवन कल्याण पर व्यंग्य किया था। बीते साल मार्च में, शिवसेना कार्यकर्ताओं ने मुंबई के एक होटल में तब तोड़फोड़ की थी, जब महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को पक्षद्रोही कहा था। निर्विवाद रूप से यदि व्यंग्य-विनोद पर पाबंदी लगायी जाती है और कलाकारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बाधित किया जाता है तो इसका प्रभाव सिर्फ एक शो को ही बाधित नहीं करता। बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल सिद्धांत पर ही चोट करता है। सही मायनों में यह दिक्कत कॉमेडी करने वालों से नहीं है, बल्कि राजनेताओं के असुरक्षाबोध में है, जो उन पर लोगों का हंसना बर्दाश्त नहीं कर पाते। ऐसे में राजनेताओं का नैतिक दायित्व है कि वे लोकतंत्र में स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मर्म को समझें। इसके लिये वे अपने अति-उत्साही समर्थकों पर लगाम लगाएं। लेकिन विडंबना यह भी है कि पुलिस भी सत्ता की राजनीति के आगे नतमस्तक नजर आती है। कायदे से उसे भारतीय संविधान में वर्णित अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करनी चाहिए। यदि पुलिस दायित्वों का ईमानदारी से पालन करती तो उदय जैसे कलाकारों को माफी न मांगनी पड़ती।

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