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अति आशावाद से बचें

आर्थिक सर्वेक्षण ने लचीलापन पर दिया जोर

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देश में आम बजट से पहले सामने आने वाले आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को लचीला व गतिशील बनाने पर बल दिया गया है। यह सर्वेक्षण उन चुनौतियों की ओर भी इशारा करता है, जिनके लिए सावधानीपूर्वक नीतिगत निर्णय लेने की आवश्यकता है। दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में चालू वित्तीय वर्ष में भारत के सकल घरेलू उत्पाद दर यानी जीडीपी के 7.4 रहने का भरोसा जताया गया है। वहीं आर्थिक सर्वेक्षण वित्तीय वर्ष 2026-27 में विकास वृद्धि दर के 6.8 से 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। इस अनुमान में सीमापरक तनाव, व्यापार में व्यवधान और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता को भी ध्यान में रखा गया है। निश्चित रूप से यह सावधानीपूर्वक दर्शाया गया आशावादी दृष्टिकोण घरेलू मांग, उपभोग और निवेश की मजबूती को ही दर्शाता है। इसके बावजूद कि तमाम बाहरी जोखिम विद्यमान हैं, मसलन टैरिफ को लेकर आपूर्ति शृंखला में तनाव व देश की अपेक्षाओं का संतुलन बनाना शामिल है। यह सार्थक है कि सर्वेक्षण यथार्थवाद को नजरअंदाज नहीं करता है, जो यह भी दर्शाता है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पूंजी प्रवाह व मुद्रा की ताकत से ही सफलता सुनिश्चित नहीं होती। यह भी हकीकत है कि एआई जैसी नई तकनीकों से होने वाले लाभ असमानता को ही बढ़ावा देते हैं। लेकिन इसके लिये भी सहायक मानव संसाधन और विनियामक ढांचे की जरूरत होती है। खासकर भारत जैसे देश में जहां श्रम शक्ति का बाहुल्य है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हम दुनिया में सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश होने का लाभ उठाएं। इसके लिये कौशल विकास को प्राथमिकता देने की सख्त जरूरत है, जिससे हम गुणवत्तापूर्ण स्वदेशी उत्पादों के जरिये विश्व में आर्थिक स्पर्धा का मुकाबला कर सकें। ये कदम हमारे निर्यात बढ़ाने में भी सहायक हो सकते हैं। कालांतर में ये हमारे व्यापार घाटे को कम करने में भी मददगार साबित हो सकता है।

इसमें दो राय नहीं है कि हालिया आर्थिक सर्वेक्षण के जरिये एक महत्वाकांक्षी रोड मैप बनाने का प्रयास किया गया है, जिसके अंतर्गत स्वदेशी अभियान को तरजीह देने से लेकर रणनीतिक लचीलेपन और रणनीतिक अनिवार्यता भारत की आर्थिक क्षमता की परीक्षा लेने वाला साबित हो सकता है। लेकिन इसके लिये जरूरी है कि भारत में उत्पादित वस्तुओं की साख को अंतर्राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप बनाया जाए। निस्संदेह, विश्व में भारतीय उत्पाद ‘खरीदने के बारे में सोचने’ से स्थिति को ‘बिना सोचे भारतीय उत्पाद खरीदने’ वाली सोच विकसित करना एक बड़ी चुनौती होगी। इस स्थिति के लिये हमें विनिर्माण क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिए प्रतिबद्धता की सख्त जरूरत होगी। निस्संदेह, हाल ही में यूरोपीय संघ के साथ संपन्न हुए ऐतिहासिक समझौते को लेकर अर्थव्यवस्था में खासा उत्साह देखा जा रहा है, जिसके अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभाव की उम्मीद की जा रही है। वहीं दूसरी ओर लंबे समय से लटके हुए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता लगातार बनी हुई है। सर्वेक्षण में इस बाबत कहा गया है कि इस वित्तीय वर्ष में इस एफटीए के सिरे चढ़ने की उम्मीद है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था का लाभ आम आदमी को कितना मिलता है। सवाल यह भी है कि दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था का लाभ आम आदमी के जीवन को बदलने में कितना मददगार होगा। एआई और तकनीक क्रांति के दौर में भारतीय विपुल श्रम शक्ति का बेहतर उपयोग कैसे हो सकता है। भारत दुनिया में सबसे युवा श्रम शक्ति वाला देश है तो क्या हम उनकी योग्यता व क्षमता के अनुरूप रोजगार देने में सक्षम होंगे, ताकि वे विकसित भारत के संकल्प में अपना योगदान दे सकें। जरूरत इस बात की है कि देश में बेरोजगारी की दर कम हो और युवाओं के विदेश पलायन की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिये पहल की जाए। वहीं दूसरी ओर फिसलन वाली जमीन पर चलते हुए सर्वेक्षण में दो दशक पुराने सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों में बदलाव की मंशा जतायी गई है। निस्संदेह, ऐसे किसी बदलाव का आधार तार्किक होना चाहिए।

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