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शांति थोपने की कोशिश

गाजा पर ट्रम्प प्रस्ताव यूएन को करेगा कमजोर

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नोबेल शांति पुरस्कार की उत्कट अभिलाषा के मोह में अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया के तमाम हिस्सों में जारी अशांति पर शांति थोपने की असफल कोशिश करते रहे हैं। कई देशों में टकराव के बाद शांति की स्थापना की असफल कोशिशों के पश्चात अब ट्रंप गाजा में शांति थोपने का उपक्रम कर रहे हैं। गाजा में शांति स्थापना के लिये अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रस्तावित योजना विश्व की नियामक संस्थाओं के ढांचे से बाहर उनकी प्राथमिकताओं के अनुरूप एक महत्वाकांक्षी कदम है। गाजा में शांति बनाये रखने के लिये मुनाफे व व्यापार जैसी प्रक्रिया के रूप में यह प्रयास अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता को एक प्रत्यक्ष चुनौती है। जो लंबे समय से दुनिया के सबसे जटिल संघर्षों में से एक गाजा संकट को दूर करने के प्रयासों में लगी हुई हैं। सही मायनों में ट्रंप का यह शांति प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ को दरकिनार करने जैसा है, जिसको लेकर उन्होंने बार-बार नकारात्मक प्रतिक्रिया दी हैं। उनकी दलील है कि संयुक्त राष्ट्र संघ मौजूदा वैश्विक चुनौतियों से निपटने में अक्षम और पक्षपाती है। वह इसमें अत्यधिक नौकरशाही हावी होने के भी आरोप लगाते रहे हैं। निश्चित तौर पर दुनिया की महाशक्तियां संयुक्त राष्ट्र को हांकने का प्रयास करती रही हैं। वे अपने मनमाफिक न होने पर इसे अक्षम बताने लगते हैं। दरअसल, ट्रंप की कोशिश है कि उसकी मनमाफिक क्षेत्रीय शक्तियां और अमेरिका-संगठित पक्षों द्वारा शांति योजना को सिरे चढ़ाया जाए। निश्चित रूप से यह प्रयास सार्वभौमिक बहुपक्षवाद को नकार कर शासन व्यवस्था बदलने का प्रयास ही है। निर्विवाद रूप से जो शांति, बिना वैधता,सहमति और जवाबदेही के थोपी जाती है, वह कभी स्थायी समाधान का वाहक नहीं बन सकती है। ऐसे में किसी भी विश्वसनीय शांति प्रयास के जरिये उन वास्तविकताओं से निपटना होगा, जिन्हें ट्रंप मनमानी व जल्दबाजी में अकसर नजरअंदाज करते रहे हैं। अन्यथा यह कोशिश भी ट्रंप की अन्य कोशिशों की तरह विफल ही साबित होगी।

आज गाजा संकट जिस मुश्किल दौर में पहुंच चुका है, उसके लिये जरूरी है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के क्रियान्वयन, नागरिकों की सुरक्षा और समावेशी शासन का मार्ग प्रभावी समझौते से सुनिश्चित किया जाए। ऐसे हालात में यदि अमेरिका अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को अधिक महत्व देता है या राजनीतिक अधिकारों के बजाय आर्थिक वादों को प्राथमिकता देता है, तो इस प्रयास में उस जोखिम की आशंका बनी रह सकती है, जो जमीनी वास्तविकताओं के बोझ से ढह सकता है। गाजा में शांति के लिये नये प्रयास कसौटी पर तभी खरे उतर सकते हैं जब इसमें गाजा की वास्तविक आवाज को सुना जाता हो। निश्चित रूप से हिंसा पर काबू पाना प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन नागरिकों के जीवन की गरिमा बनाये रखना और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है। शांति समझौते में यदि स्थानीय लोगों के हितों की अनदेखी होती है तो यह शांति प्रस्ताव एक उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि दशकों से हिंसा व विस्थापन का दंश झेल रहे गाजावासियों के कष्टों को और बढ़ाएगा ही। भारत को इस शांति प्रयासों में शामिल करने का प्रस्ताव अमेरिका की ओर से दिया गया है। भारत वहां सदा से ही द्विराष्ट्र के सिद्धांत का समर्थन करता आया है। निर्विवाद रूप से भारत के जहां इस्राइल से बेहतर संबंध हैं, वहीं विश्वसनीयता अरब देशों में भी बरकरार रही है। गाजा में शांति प्रयासों में लगे अरब देशों के साथ भारत के मधुर संबंध रहे हैं। लेकिन यदि शांति प्रयासों में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को नजरअंदाज किया जाता है तो यह भारत की कूटनीतिक पहल के अनुकूल नहीं होगा। निस्संदेह, भारत हमेशा से ही प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बजाय स्थिरता को बढ़ावा देने के लिये बहुपक्षीय मंचों पर ही भरोसा करता रहा है। ऐसे में गाजा में शांति के लिये पहल वैश्विक राजनीति में ट्रंप-प्रेरित उथल-पुथल को ही दर्शाती है। यदि गाजा में सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रयास संयुक्त राष्ट्र को नजरअंदाज करते हैं, तो यह उस अंतर्राष्ट्रीय ढांचे को कमजोर करने का जोखिम बढ़ाएगा, जिसकी जरूरत समझौते के पूरा होने के बाद शांति बनाये रखने के लिये है।

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