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वेनेज़ुएला पर हमला

अमेरिकी निरंकुशता वैश्विक कानूनों का अतिक्रमण

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पिछले लंबे समय से डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर रहे वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी हमले के बाद गिरफ्तार करना निस्संदेह, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का घोर उल्लंघन है। एक संप्रभु राष्ट्र पर आक्रमण और उसके राष्ट्रपति को गिरफ्तार करके अमेरिका ले जाना अंतर्राष्ट्रीय दादागिरी का दुर्लभ उदाहरण है। उससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ट्रंप ने ऐलान किया है कि सत्ता परिवर्तन होने तक वाशिंगटन इस लैटिन अमेरिकी देश का संचालन करेगा। यह एक खतरनाक परंपरा है, जिसकी पुनरावृत्ति अमेरिकी महाद्वीप से बाहर होने की आशंका भी बलवती हो सकती है। इसमें दो राय नहीं कि निकोलस मादुरो के पतन के बाद वेनेज़ुएला में मिश्रित प्रतिक्रिया होगी। अंतर्राष्ट्रीय साजिशों से मादुरो को लगातार खलनायक बनाने की कोशिशों में एक वैश्विक तंत्र लगा हुआ था। वैसे आरोप मादुरो पर लगे कि उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को खोखला किया, असहमतियों को कुचला और लाखों लोगों को निर्वासन के लिये मजबूर किया। उन पर चुनाव में धांधली और मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप भी लगते रहे हैं। लेकिन वैश्विक कूटनीति के जानकार मानते हैं कि ट्रंप के इस दांव का लक्ष्य तानाशाही के पीड़ितों को न्याय दिलाने या इस देश की संप्रभुता की रक्षा के बजाय वेनेज़ुएला के समृद्ध तेल भंडारों पर नियंत्रण हासिल करना ज्यादा रहा है। वहीं दूसरी ओर अमेरिका द्वारा सैन्य अभियान चलाकर देश से बाहर किसी शासनाध्यक्ष को गिरफ्तार करना तथा वहां की सत्ता को वाशिंगटन से संचालित करना निश्चय ही साम्राज्यवादी सोच का ही पर्याय है।

निस्संदेह, इस अमेरिकी निरंकुशता के गहरे भू-राजनीतिक परिणाम सामने आएंगे। यहां तक कि मादुरो का विरोध करने वाले अमेरिका के सहयोगी देश भी, अब मुखर होकर चेतावनी देने लगे हैं। रूस और चीन इस अमेरिकी कार्रवाई को नियम-कानून आधारित वैश्विक व्यवस्था के लिये खतरा बता रहे हैं। वहीं वेनेज़ुएला के इस घटनाक्रम ने चीन को अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं पर अमेरिकी आलोचना को बेअसर करने का भरपूर मौका दे दिया है। जिससे ताइवान की चिंताएं बढ़ सकती हैं। अमेरिका के इस कृत्य ने इराक और अफगानिस्तान में हमले व सेना की तैनाती की यादें ताजा कर दी हैं। ऐसे युद्ध जो अमेरिकी आत्ममुग्धता और अति-आत्मविश्वास से शुरू हुए, लेकिन उनका समापन अपमानजनक विदाई से हुआ। लेकिन इन हमलों के बाद वे देश कभी सामान्य नहीं रह पाए। वहीं ट्रंप की यह दलील कि मादुरो को पकड़ने के लिये चलाए अभियान का खर्च वेनेज़ुएला के तेल राजस्व से वसूला जाएगा, उसके प्राकृतिक संसाधनों पर अमेरिकी नियंत्रण की मंशा को ही दर्शाता है। वहीं अमेरिका ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सुशासन, सुरक्षा के लिये वेनेज़ुएला की जनता की आकांक्षाओं वाले किस नेता को सत्ता हस्तांतरण किया जाएगा। भारत भी उन देशों में शामिल है, जिन्होंने घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त की है। जो सही मायनों में भविष्य की वैश्विक चिंताओं के अनुरूप ही है। बहरहाल, देर-सवेर ट्रंप को अहसास होगा कि एक निरंकुश शासक को हटाना आसान है, लेकिन उस देश में दीर्घकालिक शांति-स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये गंभीर प्रयासों की जरूरत होती है।

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