चौदह साल पहले दिल्ली में जिस निर्भया कांड ने भारत की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था, दिल्ली में एक बार फिर उस जैसी त्रासदी की पुनरावृत्ति हुई है। दिल्ली ने एक बार फिर इस भयावह सच का सामना किया किया है कि वहां की सार्वजनिक जगहें महिलाओं के लिये कितनी असुरक्षित व भयावह बनी हुई हैं। दुर्भाग्य से एक बार फिर वही बस अपराध स्थली बनी है, जो सार्वजनिक आवागमन और सुरक्षा के लिये बनी होती हैं। दिल्ली स्थित नांगलोई में एक प्राइवेट स्लीपर बस के भीतर ड्राइवर और कंडक्टर द्वारा एक महिला के साथ कथित रूप से गैंगरेप की घटना ने सभ्य समाज को गहरे तक विचलित किया है। इस घटना ने एक बार फिर से शासन-प्रशासन, पुलिसिंग और परिवहन नियमों के पालन में हुई भारी चूक का एक जीता-जागता सबूत पेश किया है। निस्संदेह, इस घटना की क्रूरता केवल उस हमले में ही नहीं है, बल्कि उत्पन्न परिस्थितियों की भयानक रूप में जानी-पहचानी प्रकृति में भी है। विडंबना देखिए कि जिस बस को महिलाएं सार्वजनिक यातायात के लिये सुरक्षित मानकर चलती हैं, उसी में यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित हुई है। एक बार फिर बस अपराधियों के मंसूबों को पूरा करने वाला साधन बनी। इस घटना ने एक बार फिर से उजागर किया है कि जिन लोगों को यात्रियों के सुरक्षित आवागमन की जिम्मेदारी दी गई थी, वे ही कथित तौर पर दरिंदे बनकर सामने आए। हर बार की तरह तुरंत कार्रवाई का दावा करते हुए गिरफ्तारी को तत्काल कदम उठाने के रूप में दर्शाया जा रहा है। जबकि एक हकीकत है कि हमारी व्यवस्था की विद्रूपताएं जस की तस बनी हुई हैं। सही मायनों में देश के हृदय में वर्ष 2012 के जख्म अभी भरे नहीं हैं। विडंबना देखिए कि निर्भया कांड के बाद सरकारों ने तमाम सुधारों के वायदे जनता के सामने किए थे। तब घोषणा की गई थी कि अपराधियों पर नजर रखने के लिये दिल्ली में सीसीटीवी कैमरों की निगरानी को व्यापक रूप दिया गया है। लेकिन परिणाम जस के तस रहे।
देश को याद है कि वर्ष 2012 के निर्भया कांड के बाद त्वरित फैसले लेने वाली अदालतों की स्थापना करने की घोषणा की गई थी। इसके अलावा महिला सुरक्षा से जुड़ी तमाम योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये व्यापक प्रचार किया गया था। इसके बावजूद एक और निर्भया जैसी घटना बताती है कि अब तक जमीनी हकीकत में बहुत कुछ बदलाव नहीं आया है। देखने में आया है कि तमाम निजी बसें अपर्याप्त निगरानी व लचर सुरक्षा व्यवस्था के साथ चलती रहती हैं। महिला यात्रियों की सुरक्षा के प्रोटोकॉल का पालन अक्सर महज दिखावे के लिये होता है। निस्संदेह, निजी बसों के कर्मचारियों की सख्त जांच के अभाव ने ऐसे वातावरण को तैयार किया है जहां चालक-परिचालक व अन्य अपराधियों की समांतर गुंडागर्दी चलती रहती है। यही वजह है कि गाहे-बगाहे दिल्ली की छवि महिलाओं के लिये असुरक्षित शहर होने के कारण खराब हुई है। जिसका कारण है कि यहां जवाबदेही संस्थागत होने के बजाय सतही तौर पर नजर आती है। यह विडंबना ही है कि हर बार ऐसी घटना के बाद जन आक्रोश में उबाल आता है। लेकिन देखने में आता है कि जल्दी ही राजनीतिक बयानबाजी और कालांतर नौकरशाही की उदासीनता में बदल जाता है। यही वजह है कि महिलाएं इस भय को अपनी नियति मानकर जीने को अभिशप्त हैं। दिल्ली की जागरूक जनता को चाहिए कि वे नांगलोई की घटना को महज एक और गुजरती सुर्खी बनकर न रहने दें। उन्हें इसे ऐसे अपराधों को रोकने की दिशा में एक निर्णायक मोड़ बनाना चाहिए। निस्संदेह, दिल्ली के अधिकारियों को निजी परिवहन संचालकों की व्यापक जांच-पड़ताल करनी चाहिए। जिसमें रियल-टाइम जीपीएस ट्रैकिंग को निजी बसों में अनिवार्य रूप से लागू करना चाहिए। साथ ही निजी बस चालक व परिचालकों की पृष्ठभूमि की कड़ी जांच करनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह कि सरकारों को समझ लेना चाहिए कि महिलाओं की सुरक्षा महज बयानबाजी व नारे लगाने से सुनिचित नहीं होगी। साथ ही शासन-प्रशासन को घटना के बाद पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं होना चाहिए। बल्कि अपराध नियंत्रण की दिशा में भी गंभीर पहल होनी चाहिए।

