एक प्रेरक कहावत है कि सुबह जिसकी हुई, सचमुच वो सारी रात नहीं सोया होगा। आज जब हम पंजाब के पुत्र गुरिंदरवीर सिंह की रिकॉर्ड तोड़ कामयाबी की बात कर रहे हैं तो हमें इस मुकाम तक पहुंचने के उसके संघर्ष को भी याद करना चाहिए। कोई भी कामयाबी रातों-रात नहीं मिलती। महज 10.09 सेकंड में सौ मीटर की रेस पूरी करने वाले गुरिंदरवीर सिंह ने, निस्संदेह नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाकर देशवासियों को गर्व करने का मौका दिया है। निर्विवाद रूप से उनके भारत के सबसे तेज धावक बनने की कहानी महज चंद घड़ियों की बदौलत नहीं नापी जा सकती। गांव की धूल से भरी सड़कों में उनका अभ्यास, प्रशिक्षण मैदानों में पसीने के साथ थका देने वाला सफर और संसाधन के अभावों से जूझकर ही वे इस मुकाम तक पहुंचे हैं। वहीं इस कामयाबी में उनके परिवार का खामोश त्याग भी शामिल है, जो उनकी कामयाबी के बाद ही सुर्खियों में नजर आ पाया है। जालंधर के निकट स्थित पटियाल गांव के स्प्रिंट किंग गुरिंदरवीर सिंह ने रांची में फेडरेशन कप में जब सौ मीटर की दौड़ 10.09 सेकेंड में पूरी की तो इस मुकाम तक पहुंचने वाले वे पहले भारतीय थे। एक नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बना। इस इतिहास को रचकर गुरिंदरवीर सिंह देश के सर्वश्रेष्ठ एथलीटों में शामिल हो गए हैं। इस सफलता का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि इस कामयाबी के बाद वे स्वत: ही राष्ट्रमंडल खेलों में खेलने के हकदार हो गए हैं। उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में एक और पदक जीतने की उम्मीद फिर से जगा दी है। उल्लेखनीय है कि स्प्रिंट किंग गुरिंदरवीर का सौ मीटर की दौड़ पूरी करने का यह समय इस सीजन में एशिया का दूसरा सबसे तेज समय है। वे जापान के फुकुतो कोमुरो से महज .01 सेकेंड ही पीछे रहे हैं। विश्वास करना चाहिए कि भविष्य में गुरिंदरवीर सिंह नये मुकाम हासिल करेंगे।
यह विरोधाभास ही है कि जब कोई खिलाड़ी रिकॉर्ड कामयाबी हासिल करता है तो हम उसे पलक-पावड़ों पर बैठा देते हैं। मान-सम्मान और पुरस्कार देते हैं। लेकिन यदि छोटी उम्र में ही प्रतिभा को पहचान करके उसे पर्याप्त संसाधन व प्रशिक्षण प्रदान करें तो देश में कई गुरिंदरवीर तैयार हो सकते हैं। गुरिंदरवीर सिंह की इस कामयाबी के पीछे कई प्रेरणादायक कहानियां भी निहित हैं। उनका मानवीय पहलू हमारे समाज की सकारात्मक ऊर्जा को दर्शाता है। उनके पिता ने अपने बेटे को दौड़ के अभ्यास हेतु भेजने के लिये किश्तों में एक पुराना स्कूटर खरीदा था। जो बताता है कि एक तरफ क्रिकेट खिलाड़ियों पर लाखों-करोड़ों वारे जाते हैं तो दूसरी ओर परंपरागत खेलों से जुड़े खिलाड़ियों का संघर्ष कितना बड़ा है। वहीं गुरिंदरवीर सिंह को तराशने-निखारने की यात्रा में भारतीय नौसेना के योगदान को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। जिसने गुरिंदरवीर सिंह को ट्रैक पर उत्कृष्ट सफलता हासिल करने हेतु संबल दिया। निस्संदेह, गांव-कस्बों से निकलने वाली प्रतिभाओं की कामयाबी के पीछे सीमित संसाधनों वाले माता-पिता के दृढ़ संकल्प और त्याग की कहानी छिपी रहती है। गुरिंदरवीर सिंह जैसे राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाने वाले खिलाड़ी के पीछे एक परिवार शिद्दत के साथ खड़ा होता है, जो उसके सुनहरे भविष्य के लिये अपनी सुख-सुविधा, बचत व आर्थिक सुरक्षा तक त्याग कर देता है। गुरिंदरवीर सिंह के दिल में गांव और साधारण परिवारों में पले-बढ़े बच्चों के संघर्ष के प्रति खासा सम्मान है। वे उन हजारों नवोदित खिलाड़ियों के लिये प्रेरणापुंज हैं जो अपनी पृष्ठभूमि वाले एक खिलाड़ी को राष्ट्रीय फलक पर चमकता देख रहे हैं। निश्चय ही इस कामयाबी से उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा। यही वजह है कि इस ऐतिहासिक कामयाबी से पहले जालंधर की महिला खिलाड़ियों से उनका संवाद बेहद सहज-सरल व प्रेरणादायक था कि तुम्हें भी एकदिन यहां पहुंचना है। निश्चय ही उनका यह कथन नवोदित प्रतिभाओं में नई ऊर्जा का संचार करने वाला है। निस्संदेह, विगत में भी पंजाब ने कई ऐसे खेल नायकों को जन्म दिया, जिन्होंने अभावों से जूझते हुए दृढ़ संकल्प से कामयाबी की नई इबारत लिखी। फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह से लेकर जालंधर एक्सप्रेस गुरिंदरवीर की कामयाबी उसकी गवाह है। जो नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को बड़े सपने देखने को प्रेरित करती है।

