पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत निर्वाचन नामावलियों के निस्तारण में लगे, सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकारियों को नौ घंटे तक बंधक बनाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण ही है। इन सात बंधक अधिकारियों में तीन महिलाएं भी शामिल थीं जिन्हें नौ घंटे तक बिना खाना-पानी के रोके रखा गया। स्वाभाविक रूप से इस घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव व डीजीपी समेत कई उच्च अधिकारियों का कारण बताओ नोटिस भी दिए हैं। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर प्रक्रिया को पूरा करने के लिए सात अप्रैल की तिथि निर्धारित की है। पिछले महीने तक साठ लाख में 47 लाख आपत्तियों का निस्तारण होने पर सुप्रीम कोर्ट ने भी संतुष्टि व्यक्त की है। बहरहाल, इसके बावजूद एसआईआर प्रक्रिया को लेकर किसी व्यक्ति को कोई शिकायत है तो उसका निस्तारण निर्धारित प्रक्रिया से ही किया जा सकता है। बहरहाल, मालदा का यह घटनाक्रम कानून व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं के लिए भी अग्निपरीक्षा है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने पश्चिम बंगाल को राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत तथा चुनाव आयोग ने राज्य में जंगलराज होने की बात कही है। ध्यान रहे कि इससे पहले भी निर्वाचन अधिकारियों से मारपीट व घेराव की घटनाएं सामने आई हैं। जाहिर बात है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर कुछ लोगों में असंतोष है। मतदाता सूची से नाम कटने वाले लोगों की तल्ख प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। लेकिन यह तंत्र के प्रति बढ़ते अविश्वास का भी प्रतीक है, जिसके चलते ही घटनाक्रम के बाद सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने पश्चिम बंगाल में इस महीने होने वाले चुनाव से पहले कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। अब राज्य में विधानसभा चुनाव होने में कुछ ही दिन बाकी हैं। उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल में इस माह की 23 व 29 अप्रैल को मतदान होना है। ऐसे में मालदा का घटनाक्रम निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के लिए चुनौती दर्शाने वाला है।
बहरहाल, मालदा के कालियाचक में भीड़ द्वारा अभिव्यक्त आक्रोश और न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने का घटनाक्रम यह बताता है कि लोगों में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर व्यापक असंतोष है। यद्यपि कानून व्यवस्था को हाथ में लेना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता है, लेकिन स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा पहले ही घटना का आकलन न कर पाना और समय रहते कार्रवाई न करना, तंत्र की विफलता को ही दर्शाता है। जिसे कानून व्यवस्था की नाकामी ही कहा जा सकता है। जब राज्य में एसआईआर काम में लगे लोगों को पहले से लोगों के आक्रोश का सामना करना पड़ रहा था, तो इस कार्य में लगे न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था की जानी चाहिए थी। लोगों में उपजे अविश्वास के मद्देनजर इस दिशा में सतर्क पहल जरूरी थी। इसमें दो राय नहीं कि पश्चिम बंगाल में व्यापक पैमाने पर विदेशियों की घुसपैठ की समस्या रही है। ऐसे में एसआईआर प्रक्रिया द्वारा मतदाताओं की पड़ताल राष्ट्रीय सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन जटिल प्रक्रिया के चलते व जरूरी कागजों के उपलब्ध न होने से कुछ वैध मतदाताओं को अपनी वैधता की पुष्टि के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इन चिंताओं को भी समझने की जरूरत है। ऐसे मतदाताओं के अविश्वास को भी दूर करने की जरूरत है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस प्रक्रिया पर शुरू से ही नजर बनाये हुए है। चुनाव आयोग भी दावा कर रहा है कि किसी योग्य मतदाता के साथ अन्याय नहीं होगा। इसी मकसद से ही सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया पर निगरानी के मकसद से न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की थी। लेकिन विडंबना है कि उन्हें ही आक्रोशित भीड़ ने बंधक बनाया। लेकिन इसके बावजूद सरकारी तंत्र को लोगों के बीच भरोसा कायम करने का प्रयास करना चाहिए। विश्वास किया जाना चाहिए कि राज्य के राजनीतिक दल इस मुद्दे को लेकर राजनीति करने के बजाय मतदाताओं को तर्कपूर्ण ढंग से स्वतंत्र व पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने के लिये प्रेरित करेंगे। राज्य में स्वतंत्र-निष्पक्ष तथा पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया के लिए राजनेताओं का संवेदनशील व्यवहार जरूरी है।

