हाल के दिनों में देश की शीर्ष अदालत से लेकर आम विमर्श तक में आवारा कुत्तों का मामला सुर्खियों में रहा है। इस संवेदनशील, जटिल व विवादास्पद मुद्दे से जुड़े कई तरह के अंतर्विरोध सामने आ रहे हैं। लेकिन इस कड़ी में बिहार के एक नगर निगम के बेतुके फरमान को लेकर आलोचना की जा रही है। यह निर्णय न केवल बेतुका है बल्कि हास्यास्पद भी है। बिहार के सासाराम के नगर निगम ने शिक्षकों से सड़कों में घूमने वाले आवारा कुत्तों की गिनती करने को कहा है। दरअसल, अदालत के निर्देशों के अनुरूप स्थानीय निकायों की इस बाबत जवाबदेही तय की गई है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर उठ रहे सवालों व गिरते परीक्षा परिणाम के बावजूद शिक्षकों को गैर-शिक्षण कार्यों में लगाना दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। वहीं दूसरी ओर हर छोटे-बड़े सरकारी अभियान में शिक्षकों की जिम्मेदारी लगाना प्रशासनिक विफलता को भी उजागर करता है। कभी जनगणना, कभी चुनावी ड्यूटी तो कभी आपदा सर्वेक्षण, और अब कुत्तों की गिनती का बेतुका काम शिक्षकों के जिम्मे लगा दिया गया है। दरअसल, बिहार के शिक्षक विषम परिस्थितियों के चलते पहले ही अत्यधिक दबाव में हैं। जिसके कारण वे शैक्षणिक जिम्मेदारियों व गैर-शिक्षण दायित्वों के लगातार बढ़ते बोझ के बीच संतुलन बनाने के लिये संघर्ष कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं है कि हर इस तरह का व्यवधान कक्षा के समय, पाठ योजना और छात्रों की सहभागिता को गहरे तक प्रभावित करता है। निश्चित रूप से प्राथमिक शिक्षा बच्चे के विकास की नींव रखती है। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि बिहार के स्कूलों का परीक्षा परिणाम बेहद निराशाजनक रहता है। वर्षों से पेश की जा रही एएसईआर रिपोर्टों में कई बार उजागर किया गया है कि बिहार के स्कूलों का परीक्षा परिणाम देश में सबसे कमजोर रहा है। जो कि एक चिंता का विषय बना हुआ है।
ऐसे में जब पहले ही बिहार के स्कूलों का परीक्षा परिणाम निराशाजनक रहता है तो शिक्षकों को एक और गैर-शैक्षणिक कार्य के लिये कक्षाओं से बाहर निकालना, निस्संदेह शिक्षा व्यवस्था के लिए आत्मघाती कदम ही कहा जाएगा। इससे भी बुरी बात यह है कि यह आदेश कई वास्तविक खतरों से भरा है। आवारा कुत्तों की गिनती करना शिक्षण के कागजी कार्य के समान सहज नहीं है। निश्चित रूप से अनेक शिक्षक ऐसे होंगे जो कुत्तों से डरते भी होंगे। खासकर शिक्षिकाओं के लिये यह कार्य खासा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। कुछ लोग इस गणना प्रक्रिया में वास्तविक खतरे का सामना भी कर सकते हैं। इस बात का संकेत शीर्ष अदालत की टिप्पणी में भी मिलता है। दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया था कि किसी कुत्ते के मन को पढ़ना या यह अनुमान लगाना असंभव है कि कोई जानवर कब आक्रामक हो जाएगा। निश्चित रूप से अप्रशिक्षित शिक्षकों को ऐसे कार्य करने के लिए कहना, उनकी सुरक्षा के लिये भी चुनौती होगी। खासकर तब जब आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं और रेबीज से होने वाली जीवन क्षति सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये चिंता का विषय बनी हुई हैं। ऐसे में नगर निगम के आदेश की तार्किकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय ने पशु जन्म नियंत्रण और जन सुरक्षा उपायों को लागू करने में नगरपालिकाओं की विफलता पर सवाल उठाए थे। जिसके बाद एक स्थानीय निकाय ने अपनी मूल जिम्मेदारी शिक्षकों पर थोपकर इसका जवाब दिया है। निश्चित रूप से यह अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसा है। निर्विवाद रूप से इस बेतुके आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की जरूरत है। सही मायनों में नगरपालिका के अधिकारियों को अपना काम करना चाहिए और शिक्षकों को भी अपना काम करने की आजादी दी जानी चाहिए। यह समस्या केवल शिक्षकों की ही नहीं है बल्कि यह हमारे नौनिहालों के भविष्य से खिलवाड़ करने जैसा है। ऐसे में शिक्षकों को शिक्षण कार्य के अलावा अन्यत्र काम सौंपना, कहीं न कहीं छात्रों और छात्राओं को शिक्षा पाने के अधिकार से वंचित करने जैसा भी है।

