बृहस्पतिवार को जारी सरकारी आंकड़ों से पता चला कि एक माह के भीतर ही थोक महंगाई दर दुगनी हो गई है। जो कि पिछले 42 महीनों के उच्चतम स्तर पर जा पहुंची है। अब शुक्रवार को पेट्रोल व डीजल तथा सीएनजी के दामों में वृद्धि ने आम आदमी को व्यथित कर दिया। जाहिर है पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि से न केवल यातायात महंगा हो जाता है बल्कि मालभाड़ा बढ़ने से हर चीज के दामों में उछाल आ जाता है। वहीं रोजमर्रा का सामान बनाने वाली कंपनियां दुहाई दे रही हैं कि पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में वृद्धि से उनकी उत्पादन लागत में दस से बीस फीसदी की वृद्धि हुई है। फलतः इन कंपनियों ने छूट व प्रचार खर्च में कटौती करके भंडारण क्षमता व आपूर्ति शृंखला को मजबूत करना प्राथमिक लक्ष्य बनाया है। अतः देश की एफएमसीजी रोजमर्रा के सामान की लागत बढ़ने व मुनाफे पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिये चरणबद्ध तरीके से वस्तुओं के दाम बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। यह भी हकीकत है कि पिछली तिमाही में ये एफएमसीजी पहले ही तीन से पांच प्रतिशत की वृद्धि वस्तुओं की कीमतों में कर चुकी हैं। फलतः आम उपभोक्ता को अभी और महंगाई को झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह भी एक हकीकत है कि रुपये के गिरते मूल्य ने भी कीमतें बढ़ाने का दबाव बनाया है। कंपनियां अपना मुनाफा बनाये रखने के लिये कीमतें बढ़ाने और पैकेटबंद उत्पादों की मात्रा घटाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। आशंका जतायी जा रही है कि पेट्रोल व डीजल के दामों में तीन-तीन रुपये की वृद्धि के बाद टेलीकॉम कंपनियां रिचार्ज प्लान बढ़ा सकती हैं। उनका दावा है कि मोबाइल टाॅवर को चलाने में आने वाला 40 फीसदी खर्च सिर्फ पेट्रोल और बिजली पर होता है। यह खर्चा टैरिफ बढ़ाकर ग्राहकों पर डाला जा सकता है। वहीं सरकारी तेल कंपनियां कह रही हैं कि होर्मुज स्ट्रेट बाधित होने से कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि के बाद उन्होंने मामूली वृद्धि पेट्रोल व डीजल के दामों में की है।
निश्चित रूप से पश्चिम एशिया संकट के चलते उपजे हालात ने बताया है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा नीति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। प्रधानमंत्री द्वारा ईंधन की खपत को कम करने के आह्वान के कुछ दिन बाद ही पेट्रोल, डीजल व सीएनजी के दामों में बढ़ोतरी की गई है। यह बढ़ोतरी चार साल से अधिक समय में पहली बार की गई है। निस्संदेह, खाड़ी संकट से उपजे हालात में कीमतों में यह वृद्धि अनिवार्य लग रही थी। माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु आदि राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के चलते ही सरकार ने यह कदम देर से उठाया है। चुनाव परिणाम आने के बाद जब हैदराबाद में प्रधानमंत्री ने देशवासियों से ईंधन खपत में कटौती करने का आगाह किया था, तो संकेत माना गया कि पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में वृद्धि हो सकती है। सरकार ने तेल विपणन कंपनियों को हो रहे भारी नुकसान की ओर इशारा करते हुए मूल्य वृद्धि का बचाव किया है। रिपोर्ट बताती है कि देश के सार्वजनिक क्षेत्र के रिटेलर्स रोजाना एक हजार करोड़ का नुकसान उठा रहे हैं,जबकि कच्चे तेल की कीमत सौ डॉलर प्रति बैरल थी। निस्संदेह, पहले ही मुद्रास्फीति व स्थिर आय से जूझ रहे नागरिकों को सरकार की यह दलील गले नहीं उतरेगी। वैसे भी चुनावी रणनीति के मद्देनजर संचालित आर्थिक निर्णय सार्वजनिक विश्वास में कमी लाते हैं। जाहिर बात है कि करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवार, किसान व छोटे व्यवसाय चलाने वाले लोगों के लिए बढ़ी ईंधन दरें जल्दी ही भोजन, परिवहन और आवश्यक वस्तुओं को महंगा बना देती हैं। फिक्र की बात यह है कि भारत की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता अर्थव्यवस्था को भू राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील बना देती है। रूस से मिलने वाला सस्ता कच्चा तेल हमें अस्थायी राहत ही प्रदान करता है। लेकिन यह मार्ग भी प्रतिबंधों, शिपिंग रुकावटों और कूटनीतिक दबावों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। यह संकट भारत को दीर्घकालीन ऊर्जा रणनीति बनाने के लिये बाध्य करता है। हमारी प्राथमिकता सार्वजनिक परिवहन विस्तार, इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग व नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाने की होनी चाहिए।

