आतंक के खिलाफ

अंतर्राष्ट्रीय मंचों से पाक-चीन को सख्त संदेश

आतंक के खिलाफ

शंघाई सहयोग संगठन के बाद ब्रिक्स देशों के बारहवें शिखर सम्मेलन से एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा खोला। उन्होंने आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों को दोषी ठहराने तथा उनका संगठित तरीके से विरोध करने का आह्वान किया। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि भारत पाक प्रायोजित आतंकवाद का लगातार शिकार रहा है। इन साजिशों के खिलाफ चीन न केवल मूकदर्शक बना रहा बल्कि उससे आगे जाकर कुख्यात आतंकवादी संगठनों का अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बचाव करता रहा है। यह तथ्य सर्वविदित है कि चीन ने भारत में तमाम आतंकी वारदातों में लिप्त रहे आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने का अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विरोध किया है, जिसका पुलवामा तथा अन्य आतंकी घटनाओं में हाथ रहा है। प्रधानमंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों का बखूबी उपयोग करके न केवल पाक को बेनकाब किया बल्कि चीन को भी आईना दिखाया। साथ ही प्रधानमंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की कार्यशैली में सुधार की भी वकालत की। यहां तक कि शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में प्रधानमंत्री ने इस मंच से द्विपक्षीय मुद्दे न उठाने पर जोर दिया, जिसका रूस ने भी समर्थन किया। निस्संदेह अब वक्त आ गया है कि पाक में सरकार प्रायोजित आतंकवाद और साम्राज्यवादी चीन की आतंकवाद को संरक्षण की कोशिशों की हकीकत से दुनिया को अवगत कराया जाये। निस्संदेह चीन एक ओर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग की वकालत करता है तथा दूसरी ओर आतंक की पाठशाला चलाने वाले पाकिस्तान को संरक्षण देता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में आतंकवाद का पोषण करने वाले देशों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही। लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अतिक्रमण कर अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने की कोशिश कर रहे चीन को दुनिया के सामने बेनकाब करना बेहद जरूरी है। इसी दिशा में प्रधानमंत्री ने पहल की है। निस्संदेह घात और बात का खेल साथ-साथ नहीं चल सकता। चीन की असलियत दुनिया को बताना समय की जरूरत भी है।

ऐसे वक्त में जब दुनिया कोरोना संकट से उबरने का प्रयास कर रही है, चीन हालात का फायदा उठाने का कोई मौका नहीं चूकना चाहता। इन हालात में दुनिया की अर्थव्यवस्था का इंजन कहे जाने वाले ब्रिक्स देशों में ऐसी अपार क्षमताएं हैं कि वे दुनिया को मंदी की चपेट से उबार सकते हैं। यह अच्छी बात है कि ब्रिक्स समूह में शामिल रूस, ब्राजील व दक्षिण अफ्रीका से बेहतर संबंधों के चलते भारत चीन की मनमानी पर अंकुश लगा सकता है। ऐसे में विशाल आबादी और अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले इस समूह की क्षमताएं कोरोना संकट के दौर में दुनिया की आर्थिकी को दिशा देने में निर्णायक भूिमका निभा सकती हैं। हालांकि, अपने प्रभुत्व वाले दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक गठबंधन आरसीईपी के जरिये चीन अपनी महत्वाकांक्षाओं को अंजाम देने की कोशिश कर रहा है। इससे अलग रहकर भारत ने चीन को साफ संकेत दिया है कि भारत अपनी आर्थिक संप्रभुता को अक्षुण्ण बनाये रखने में सक्षम है। यही वजह है कि हाल में दो अंतर्राष्ट्रीय मंचों के माध्यम से प्रधानमंत्री ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी में भारत की नीतियों को स्पष्ट किया। आज भारत ने विश्व राजनय में अपना एक मुकाम तय किया और अब वह चीन के दबाव में आने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में भारत ने स्पष्ट किया कि संपर्कों को विस्तार देने के लिये अन्य देशों की संप्रुभता और राष्ट्रीय अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए। साथ  ही प्रधानमंत्री ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए भारत ने करीब डेढ़ सौ देशों को आवश्यक दवाइयां व चिकित्सा साधन उपलब्ध कराये हैं। साथ ही निकट भविष्य में कोविड-19 की वैक्सीन आने पर भारत इसके उत्पादन व जरूरतमंद देशों तक इसे पहुंचाने में अपनी भूमिका निभायेगा। निस्संदेह आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक मुहिम में हमें यह सफलता तभी मिलेगी जब घरेलू स्तर पर राजनीतिक दल एकजुटता दिखाएंगे।

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