आये दिन देश के विभिन्न निजी विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता और आर्थिक संसाधन जुटाने में पारदर्शिता के अभाव की खबरें सुर्खियां बनती रहती हैं। कुछ विश्वविद्यालयों ने अपनी सुविधा के हिसाब से कायदे-कानून बनाने और शैक्षिक जवाबदेही से बचने के रास्ते भी निकाल लिए हैं। इसी आलोक में देश भर के निजी विश्वविद्यालयों के लिए सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों का स्वागत ही किया जाना चाहिए। दरअसल, कई तरह के आक्षेपों के बाद शीर्ष अदालत ने प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के संचालकों से पूछा है कि वे बताएं कि उनके विश्वविद्यालयों में वित्तीय संसाधन कैसे जुटाये जाते हैं? संसाधनों का प्रबंधन किस तरह से किया जाता है? इसके अलावा ये विश्वविद्यालय इस धन का प्रयोग किस तरह से करते हैं? सही मायने में अदालत का यह निर्देश विश्वविद्यालयों के आय और व्यय के सामान्य ऑडिट से कहीं आगे की बात करता है। दूसरे शब्दों में अदालत के निर्देशों में यह जानने का प्रयास किया गया है कि प्रवेश के समय छात्रों को सुविधाओं के जो सब्जबाग दिखाए जाते हैं उसके मुकाबले हकीकत में कितनी सुविधाएं मिलती हैं। कह सकते हैं कि यह एक आवश्यक रियलिटी चेक है। वास्तव में कोर्ट की जिज्ञासा के पीछे ठोस कारण भी हैं। दरअसल, समाज में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि शिक्षा का क्षेत्र धीरे-धीरे एक बिजनेस मॉडल का रूप लेने लगा है। आक्षेप तो यहां तक हैं कि शिक्षा का ये कारोबार रियल एस्टेट मॉडल में बदल गया है। जहां सिर्फ इस बात से ही फर्क पड़ता है कि कितने छात्र दाखिला ले रहे हैं और विभिन्न प्रकार के शुल्क लगाने से इन संस्थानों को कितना मुनाफा हो रहा है। निस्संदेह, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी तार्किक ही है कि प्राइवेट यूनिवर्सिटीज को शिक्षा के व्यापक सार्वजनिक उद्देश्य को पूरा करना चाहिए। वे सिर्फ मुनाफे के लिये ही काम नहीं कर सकते। कोर्ट का कहने का अभिप्राय है कि छात्रों के किसी भी तरह के शोषण को रोकने के लिये मजबूत नियामक संस्था की निगरानी जरूरी है।
निस्संदेह, इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती है कि दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश में उच्च शिक्षा की मांग तेजी से बढ़ी है। वहीं सरकारी विश्वविद्यालय इस मांग को पूरा करने में असमर्थ हैं। वजह साफ है कि वित्तीय संसाधनों की कमी के चलते सरकारी संस्थान ज्यादा संख्या में छात्रों को मौका देने में विफल नजर आते हैं। जिसके चलते देश में निजी विश्वविद्यालयों को पांव पसारने का मौका मिल रहा है। वहीं एक हकीकत यह भी है कि कड़ी स्पर्धा वाले निजी क्षेत्र ने बीते कुछ वर्षों में आधी-अधूरी सच्चाइयों का सहारा लेकर अपना कारोबार बढ़ाया है। पर्याप्त शैक्षिक ढांचा न होने, योग्य-अनुभवी शिक्षकों की कमी और प्रभावी अकादमिक शोध की अनदेखी के बावजूद विश्वविद्यालय परिसरों में उपलब्ध सुविधाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। वहीं दूसरी ओर प्लेसमेंट के बाबत भी आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। दरअसल, यदि फैकल्टी डेवलपमेंट की कमी एक समस्या है, तो उससे अधिक चिंता करने वाली बात यह भी है कि कम स्टाफ पर ज्यादा काम करने का अतिरिक्त बोझ भी है। अंतत: इस सब का खामियाजा छात्रों को ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि उनके हितों से ही समझौता किया जाता है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद निजी विश्वविद्यालयों के लिये फीस स्ट्रक्चर, कर्मचारियों के वेतन, अन्य खर्चों व सरकार से मिलने वाले फायदों या भर्ती और शिक्षा के मानकों के बारे बढ़ा-चढ़ाकर जानकारी देना मुश्किल नहीं होगा। कागजी कार्यवाही पूरी करने की उनकी महारत पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता है। सही मायने में असली चुनौती सख्त जांच-पड़ताल की होगी। खासकर उस वातावरण में जहां लंबे समय से नियमों और सही तौर-तरीकों की अनदेखी की जाती रही है। हकीकत में निजी विश्वविद्यालयों के लिये जिम्मेदारी और जवाबदेही अनिवार्य शर्त होनी चाहिए। विश्वास किया जाना चाहिए कि देश में उच्च शिक्षा का नियमन करने वाली संस्थाएं अब अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी से करेंगी। तभी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के सार्थक परिणाम सामने आ सकते हैं।

