Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
Add Tribune As Your Trusted Source
search-icon-img
Advertisement

चुनाव आयोग की जवाबदेही

एसआईआर की विसंगति से मताधिकार का हनन

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

हाल के वर्षों में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर देश का विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। हालांकि, चुनाव हारने पर विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का सिलसिला पुराना है। लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत का चुनाव आयोग विश्वसनीयता की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है। जिसकी तपिश भारतीय लोकतंत्र की साख पर भी पड़ती है। निस्संदेह, चुनाव आयोग का दायित्व लोकतंत्र में पारदर्शी चुनाव कराना और नागरिकों के वोट देने के महत्वपूर्ण अधिकार की रक्षा करना होता है। लेकिन पिछले कुछ समय से इस संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता को विवादित ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ यानी एसआईआर से जुड़ी विसंगतियों ने भारी ठेस पहुंचायी है। हाल ही में दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार की पड़ताल में पता चला है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्तूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम चौदह बार उन फैसलों पर आपत्ति जताई, जो उनकी जानकारी में लाए बगैर लिये गए थे। सूत्रों के मुताबिक इन दो चुनाव आयुक्तों की चिंताओं में फॉर्म-6 में बदलाव, वोटर लिस्ट डेटाबेस का सेंट्रलाइजेशन, फील्ड अधिकारियों की इस तक सीमित पहुंच और वोटरों के नाम हटाने की प्रक्रिया शामिल थी। निस्संदेह, इस प्रकरण से मुख्य चुनाव आयुक्त की स्थिति असहज हो गई है। इसके बाद अक्सर चुनाव आयोग पर हमलावर रहा, कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष और ज्यादा हमलावर हो गया है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग कर रहा है। भारतीय लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया का संचालन करने वाली संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग के चुनाव आयुक्तों के बीच उजागर हुए इस मतभेद को प्रशासनिक छोटी-मोटी बात कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये प्रकरण चुनाव की विश्वसनीयता और जवाबदेही के मूल मुद्दे से जुड़ा है। वोटर रजिस्ट्रेशन को आसान बनाने के लिये बने फॉर्म-6 में, रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स-1960 में कानूनी रूप से सही तरीके से संशोधन किए बिना बदलाव कर दिए गए। इन बदलावों के चलते नागरिकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा है।

विडंबना यह है कि जो फॉर्म-6 वोटर रजिस्ट्रेशन को आसान बनाने के लिये बना था, उसे बेहद जटिल बना दिया गया। जिसमें यह जानकारी देनी अनिवार्य कर दी गई कि क्या वोटर के माता-पिता का नाम पिछली एसआईआर सूची में शामिल था। उल्लेखनीय है कि एसआईआर की जटिलता को महसूस करते हुए पिछले बार की प्रक्रिया की जिम्मेदारी चुनाव आयोग के कर्मचारियों ने निभायी थी। लेकिन इस बार यह जवाबदेही वोटरों के सिर पर डाल दी गई। एक सामान्य मतदाता कैसे याद रखे कि करीब चौथाई सदी पहले उसने या उसके माता-पिता ने किस बूथ पर वोट डाला था। इस संबंध में जानकारी जुटाने के लिये लोग दर-दर की ठोकरें खाते रहे हैं। इस जानकारी से मैपिंग न हो पाने के कारण पूरे देश में करोड़ों मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से निकाल दिए गए। पश्चिम बंगाल में, ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से लाखों नाम हटाने पर नागरिकों व विपक्ष ने कड़ा प्रतिरोध किया। अब तक तय की गई दस में से नौ अपीलों में वोट बहाल होने की रिपोर्ट से पता चलता है कि विसंगतियों को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था। इस समस्या का समाधान करने की प्रक्रिया की कछुआ चाल का पता इस बात से चलता है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त ट्रिब्यूनल को बंगाल में लंबित 37 लाख अपीलों का निस्तारण करने में करीब बारह साल लग सकते हैं। भारतीय लोकतंत्र के हित में जरूरी है कि चुनाव आयोग को गोपनीयता का पर्दा अविलंब हटाना चाहिए। उसे संबंधित रिकॉर्ड प्रकाशित करने चाहिए। सही मायने में चुनाव आयोग को अपने निर्णय लेने की प्रक्रिया के बारे में पारदर्शी तरीके से बताना चाहिए। साथ ही चुनाव आयोग को अपने आयुक्तों द्वारा उठाये गए हर अहम सवाल का जवाब भी देना चाहिए। चुनाव आयोग का नैतिक दायित्व है कि वह सरकार के बजाय नागरिकों के हितों के प्रति जवाबदेह हो। आयोग का फर्ज है कि वह स्पष्ट जवाब देश के नागरिकों को दे। साथ ही हर भारतीय को एक ऐसा चुनावी सिस्टम दे, जो समावेशी और नागरिकों की सुविधा के अनुकूल हो।

Advertisement

Advertisement
Advertisement
×