Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

परिपक्व उम्र में ही हो सोशल मीडिया तक पहुंच

डिजिटल नशा

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

बच्चों व किशोरों की सोशल मीडिया पर बढ़ती अति-सक्रियता अभिभावकों ही नहीं, देश के लिये भी एक गंभीर चिंता का विषय है। छात्रों का पढ़ाई से भटकाव व एकाग्रता में गिरावट समय की बड़ी फिक्र है। इसी बीच इकोनॉमिक सर्वे में सोशल मीडिया तक उम्र के हिसाब से पहुंच का सुझाव एक स्वागत योग्य कदम है। सालों से, डिजिटल विस्तार को एक बिना शर्त अच्छे बदलाव के रूप में देखा जाता रहा है। कहा जाता रहा है कि सोशल मीडिया तक पहुंच को लोकतांत्रिक बनाने, डिजिटल लिटरेसी की खामियों को दूर करने और शिक्षा को आधुनिक बनाने में डिजिटल क्रांति सहायक है। निश्चित रूप से आर्थिक सर्वे में इस बाबत उल्लेख एक असहज करने वाली सच्चाई को संतुलित करने का प्रयास करता है। यह स्वीकार किया जा रहा है कि बिना रोक-टोक के डिजिटल एक्सपोजर तेजी से एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता बनता जा रहा है। सही मायनों में डिजिटल लत को मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक प्रदर्शन और उत्पादकता को प्रभावित करने वाली समस्या के रूप मे पहचानते हुए, सर्वे इस बहस को तथ्यों पर आधारित नीति बनाने की जरूरत बताता है। इसकी सिफारिश है कि उम्र के हिसाब से एक्सेस की सीमाएं तय करने, उम्र की वेरिफिकेशन के लिये प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही निर्धारित करने, बच्चों के लिये सरल डिवाइस बनाने और ऑनलाइन कक्षाओं पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता है। सही मायनों में इस मुद्दे पर वैश्विक सहमति का ही अनुसरण किया जा रहा है। वास्तव में बच्चों को सम्मोहित करने वाले डिजिटल डिजाइनों से उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराने की भी जरूरत है। जो कोमल मन-मस्तिष्क वाले बच्चों पर खासा नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। निश्चित रूप से डिजिटल लत के शिकार होते बच्चों व किशोरों के, शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के मद्देनजर राष्ट्रीय स्तर पर नीति-निर्धारण समय की मांग है। इसके अलावा इस बाबत सामूहिक जिम्मेदारी पर जोर देना भी उतना ही जरूरी है। तभी इस संकट का आशाजनक समाधान तलाशना संभव हो सकेगा।

वहीं दूसरी ओर, इस संकट से उबरने के लिये प्लेटफॉर्म लेवल सेफ्टी और फैमिली डेटा प्लान की भी मांग की जा रही है। जो पढ़ाई की जरूरत और मनोरंजन के लिये डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए इस्तेमाल का फर्क कर सके। इसके साथ ही हालिया आर्थिक सर्वे में इस बात को स्वीकार किया गया है कि माता-पिता पहले से ही यह जानते हैं कि व्यक्तिगत कंट्रोल बड़े पैमाने से इस समस्या का समुचित हल नहीं निकाल सकता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए प्रयास इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। यही वजह है कि आस्ट्रेलिया व फ्रांस जैसे विकसित देशों में सरकारों को इस दिशा में सख्त पहल करनी पड़ी। एक ओर जहां आस्ट्रेलिया ने सोलह साल से कम उम्र वाले बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच पर रोक लगायी है, वहीं फ्रांस ने पंद्रह साल से कम उम्र वाले बच्चों की सोशल मीडिया तक सीधी पहुंच को रोकने को कदम उठाये हैं। कुछ अन्य देशों में भी सरकारें तेजी से सख्त सीमाएं तय करने की दिशा में काम कर रही हैं। आज जहां भारत में स्मार्टफोन के इस्तेमाल की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। वैसे भारत जैसे देश जहां युवाओं की आबादी बहुत ज्यादा है, वहां डिजिटल क्रांति से पूरी तरह अलग भी नहीं रहा जा सकता। ऐसे में एक नियम से ही सबको नियंत्रित करना संभव नहीं होगा। इसके बावजूद हमें स्वीकारना होगा कि विदेशी प्लेटफॉर्मों से प्रसारित अपसंस्कृति भारतीय किशोरों को पथभ्रष्ट करने में घातक भूमिका निभा रही है। जिससे देश में किशोरों की यौन अपराधों में संलिप्तता का खतरा बढ़ रहा है। ये अपसंस्कृति न केवल समय से पहले बच्चों को वयस्क बना रही है, बल्कि उनमें मानवीय संवेदनाओं का भी क्षरण कर रही है। जो किसी भी सभ्य समाज के लिये एक गंभीर चुनौती है। खासकर भारत जैसे देश में जहां सांस्कृतिक मूल्यों व संबंधों में शुचिता को हमेशा प्राथमिकता दी जाती रही है। इस बाबत सरकार की सख्त पहल और अभिभावकों की सजगता मिलकर ही समस्या का समाधान निकाल सकती है।

Advertisement

Advertisement
Advertisement
×