Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

मितव्ययिता का दिखावा

हिमाचल में बचत की कोशिश कारगर नहीं

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

इसमें दो राय नहीं कि हिमाचल प्रदेश फिलहाल वित्तीय संकट की चुनौती से जूझ रहा है। लेकिन उससे उबरने के लिए जो कदम उठाये जा रहे हैं, उनकी तार्किकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा मंत्रियों, विधायकों और वरिष्ठ नौकरशाहों के वेतन में कटौती का फैसला, बचत करने के एक सांकेतिक प्रयास के तौर पर पेश किया जा रहा है। यह जनता को बताने की राजनीतिक कवायद हो सकती है कि हम राज्य में वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए प्रतिबद्ध हैं। लेकिन सवाल यह है कि यह कदम संकट से उबारने में किस हद तक मदद कर पाएगा। बहरहाल, यह प्रयास इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राज्य के सामने गहरे वित्तीय संकट की स्थिति बन रही है। लेकिन हकीकत यही है कि यह कदम राजनीतिक रूप से एक प्रतीकात्मक होने के बावजूद राज्य के सिमटते खजाने को कोई ठोस राहत नहीं देने वाला है। यदि इससे जुड़े आंकड़ों पर नजर डालें तो वास्तविकता सामने आ जाती है। मुख्यमंत्री के वेतन में पचास फीसदी, मंत्रियों के वेतन में तीस फीसदी तथा विधायकों के वेतन में बीस फीसदी की छह माह के लिये कटौती, आठ-दस हजार करोड़ रुपये के घाटे को कितना कम कर पाएगी? निश्चित रूप से राजस्व घाटे के अनुपात में यह बचत नगण्य ही होगी। हां, जनता को यह संदेश, उनके त्याग करने के रूप में पहुंचाने की कवायद जरूर होगी।

यहां विचारणीय तथ्य यह है कि राज्य में यह वित्तीय संकट अचानक नहीं आया है। यह संरचनात्मक विसंगतियों की ही परिणति है। निर्विवाद रूप से केंद्र द्वारा राजस्व घाटा अनुदान की वापसी ने संघीय हस्तांतरण पर राज्य की दीर्घकालीन निर्भरता को उजागर कर दिया है। इस बीच वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे निश्चित व्यय बजट राज्य की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाए हुए हैं, जिसमें बदलाव की गुंजाइश बहुत कम रह गई है। ऐसे पर परिदृश्य में, वेतन में कटौती आर्थिक समाधान से अधिक एक राजनीतिक संकेत मात्र ही है। यह सरकार को कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावित किए बिना या स्थापित व्यय पद्धतियों का सामना किए बिना नैतिक रूप से श्रेष्ठ होने का दावा करने का अवसर देता है। निस्संदेह, राजकोषीय विवेक के लिये समय-समय पर कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। मसलन सब्सिडी को युक्तिसंगत बनाना, कर आधार का विस्तार करना और विकासोन्मुखी पूंजी निवेश को प्राथमिकता देना जरूरी होता है। इसके बिना, अस्थायी समाधान शासन की एक नियमित लोकलुभावनी परिपाटी बनने का जोखिम भी बना रहेगा। यह घटनाक्रम संघीय राजकोषीय ढांचे के भीतर पहाड़ी राज्यों की नाजुक स्थिति पर भी सवाल उठाता है। केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता पर अत्याधिक निर्भरता, उन्हें उन नीतिगत बदलावों के प्रति संवेदनशील बनाती है, जो वास्तव में उनके नियंत्रण से बाहर हैं। आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये हस्तांतरण की एक अधिक पूर्वानुमानित और न्यायसंगत प्रणाली आवश्यक है। अंतत: वेतन में कटौती से सरकार को कुछ समय तो मिल सकता है, लेकिन इससे उसे राजकोषीय मजबूती नहीं मिलेगी। निश्चित रूप से इसके लिये सुधारों को अपनाना होगा।

Advertisement

Advertisement
Advertisement
×