ऑनलाइन गेमिंग के भ्रमजाल में फंसकर, उसे हकीकत मानकर जीने वाले किशोरवय जरा से विचलन से आत्मघात की राह पकड़ना अंतिम समाधान समझ लेते हैं। धीरे-धीरे किशोरवय को अपने चपेट में लेने वाली यह प्रवृत्ति कितनी घातक हो सकती है, उसका उदाहरण बुधवार को घटी दो भयावह घटनाएं हैं। एक हृदयविदारक घटना में गाजियाबाद की तीन अल्पवयस्क बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। ऑनलाइन कोरियन गेम की दीवानी बहनें कोरिया में जाकर बसने और वहीं नया जीवन शुरू करने का सपना देखती थीं। घर वालों ने जब उनकी ऑनलाइन सनक से परेशान होकर उनसे मोबाइल छीन लिए, तो वे तनाव व अवसाद में घिर गई। फिर तीनों बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। ऐसी ही घटना हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी घटी जहां एक पंद्रह वर्षीय किशोर ने ऑनलाइन गेम के अपने एक विदेशी साथी के बिछुड़ने के गम में घर में आत्महत्या कर ली। किशोर दसवीं का छात्र था। इन घटनाओं ने आम जनमानस को झकझोर कर रख दिया और बच्चों को लेकर फिक्र बढ़ा दी। निस्संदेह, ये आत्मघात की घटनाएं, ऑनलाइन गतिविधियों के अतिरेक से मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले घातक प्रभाव को लेकर गंभीर सवालों को जन्म देती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि गाजियाबाद में 12, 14 और 16 साल की तीन सुकोमल बहनें असमय काल-कवलित हो गईं। पुलिस भी प्रथम दृष्टया मान रही है कि इस दुखद घटना के पीछे ऑनलाइन गेमिंग ऐप का अत्यधिक उपयोग और घर में इसके इस्तेमाल को लेकर हुआ विवाद था। वहीं दूसरी ओर जांच अधिकारी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले पारिवारिक परिस्थितियों और मनौवैज्ञानिक स्थिति सहित सभी पहलुओं की जांच कर रहे हैं। इसी तरह कल्लू की घटना भी विचलित करने वाली है। जहां विदेश में रहने वाले एक ऑनलाइन गेमिंग मित्र के साथ संपर्क टूट जाने के बाद अत्याधिक मानसिक व्याकुलता से ग्रस्त पंद्रह वर्षीय छात्र ने आत्महत्या कर ली। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
निश्चित रूप से आत्मघात की ये घटनाएं हमारे नीति-नियंताओं और अभिभावकों को आसन्न संकट के प्रति सचेत करती हैं। दरअसल,ये दुखद घटनाएं एक घातक प्रवृत्ति को ही उजागर करती हैं कि गेमिंग और डिजिटल संपर्क लाखों युवाओं को आभासी समुदाय और मनोरंजन तो प्रदान कर सकते हैं, लेकिन साथ ही ये भावनात्मक कमजोरियों,सामाजिक अलगाव और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों की पूर्ति न होने जैसी समस्याओं को भी जन्म दे सकते हैं। हालांकि, वहीं दूसरी ओर समाज विज्ञानी इस बात पर भी बल देते हैं कि केवल गेमिंग या ऑनलाइन मित्रता ही आत्महत्या का कारण नहीं बन सकती हैं। निस्संदेह, आत्महत्या एक जटिल और बहुआयामी घटना है। लेकिन समस्याग्रस्त डिजिटल जुड़ाव, विशेष रूप से जब यह ऑफलाइन जीवन से अलगाव, बाधित शिक्षा और तीव्र भावनात्मक तनाव के साथ होता है तो संवेदनशील युवा मन में परेशानी को और बढ़ा सकता है। निस्संदेह, इन दुखद घटनाओं के सामने आने के बाद डिजिटल युग में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। इन त्रासदियों को टालने हेतु तात्कालिक प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसके लिये जरूरी है कि माता-पिता को भी डिजिटल जागरूकता प्रदान की जाए। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने तथा किशोरों के लिये मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध कराना सुनिश्चित करने की जरूरत है। वक्त की दरकार है कि परिवारों के भीतर खुले संवाद को बढ़ावा दिया जाए। जिससे बच्चे किसी संकट में फंसने से पहले अपनी बात अपने परिवार से कह सकें। गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रहे बच्चों को संवेदनशील ढंग से सुना जाना चाहिए। नीति-नियंताओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऑनलाइन वातावरण नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को प्राथमिकता दे। आस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे विकसित देशों ने किशोरवय को कथित सोशल मीडिया के संजाल से बचाने के लिये एक उम्र तक उनके सोशल मीडिया अकाउंट खोलने पर प्रतिबंध लगाया है। दरअसल, सोशल मीडिया व अन्य इंटरनेट प्लेटफॉर्मों पर इतनी घातक व भ्रामक सूचनाएं प्रसारित की जा रही हैं कि वे बच्चों के सुकोमल मस्तिष्क पर घातक असर डाल सकती हैं।

