घर-घर तिरंगा : The Dainik Tribune

घर-घर तिरंगा

घर-घर तिरंगा

निस्संदेह पंद्रह अगस्त हर साल उत्साह व गरिमा से देश-विदेश में मनाया जाता है, लेकिन इस बार का यह पर्व आजादी के 75 साल पूरे होने के चलते तिरंगामय है। जहां तक नजर जाती है तिरंगे ही तिरंगे नजर आते हैं। दरअसल, आजादी की पौन सदी के सफर को अमृत महोत्सव के रूप में मनाने का फैसला लिया गया है जिसके चलते तिरंगे से जुड़े कई प्रावधानों का सरलीकरण किया गया है। ताकि तिरंगा हर भारतीय के अहसासों में हो और हर समय सहज पहुंच में हो। अब ऐसा लगता है कि अमृत महोत्सव स्वत:स्फूर्त है और हमारे राष्ट्रीय सरोकारों की सघन अभिव्यक्ति भी है। लेकिन साथ ही हर भारतीय को तिरंगे के गहरे अहसासों का बोध होना भी जरूरी है। यह वह प्रतीक है जिसके लिये अनेक लोगों ने बलिदान दिये। इसे फहराने पर गोलियां खाईं। जेलों में सजा व यातनाएं सहनी पड़ीं। तिरंगे के अस्तित्व में आने का लंबा इतिहास है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की तमाम बड़ी घटनाएं इसके स्वरूप से जुड़ी हुई हैं। जो हमें उस कालखंड की भी याद दिलाता है जब इसे फहराना गंभीर अपराध माना जाता था। फहराने पर यातनाओं को सहना पड़ता था। निस्संदेह, तिरंगे ने राष्ट्रीय आंदोलन में राष्ट्रीयता के गहरे रंग भरे। बलिदानियों के त्याग व तपस्या से इसके रंग चटख हुए। इस तिरंगे ने जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्र और भौगोलिक सीमाओं को तोड़कर देश को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। पूरे देश में एक स्वत:स्फूर्त स्वतंत्रता आंदोलन जगाने में तिरंगे की निर्णायक भूमिका रही। लोग इस तिरंगे की शान पर मर मिटे। ऐसे में हम जब भी, जहां भी तिरंगा फहरायें, बलिदानियों के आत्मीय अहसासों का हमें बोध होना चाहिए। उसका फहराना गरिमामय होना चाहिए और तिरंगे का रखरखाव भी। निस्संदेह आजादी के अमृत महोत्सव के दौरान हर घर तिरंगा मुहिम से नई पीढ़ी को इस बात का अहसास होगा कि आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उसमें तिरंगे की क्या भूमिका रही। इस बात का अहसास भी कि तिरंगे ने जोश पैदा करके फिरंगी सरकार की चूलें हिला दीं और देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया।

निस्संदेह, अतीत गवाह है कि जब-जब हमारी राष्ट्रीय एकता कमजोर हुई विदेशी शक्तियां हमारी संप्रभुता को चुनौती देने लगीं। ऐसे में इस पर्व को राजनीतिक-वैचारिक मतभेदों को भुलाकर उल्लासपूर्वक मनाना ही शुभकर है। भले ही हम किसी भी राजनीतिक सोच से जुड़े हों लेकिन राष्ट्रीय हितों के मुद्दे पर हमारा सुर एक ही होना चाहिए। निस्संदेह, यह तिरंगा अभियान हमें एकता के सूत्र में पिरोता है। हमें बताता है कि हम कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक एक ही हैं। जम्मू-कश्मीर के स्वरूप में आये बदलाव के बाद वहां तिरंगा यात्राएं इस बात का हमें गहरे तक अहसास कराती हैं कि राष्ट्रीयता के क्या मायने हैं। केसर की घाटी में तिरंगे की मोहक व स्वतंत्र उपस्थिति देशभक्ति के सरोकारों से भर देती है। किसी भी देश की भौगोलिक सीमाएं व संसाधन ही देशभक्ति का पर्याय नहीं होते। जब तक देशभक्ति का जज्बा उसके नागरिकों की रगों में नहीं दौड़ता कोई राष्ट्र पूर्णता हासिल नहीं कर सकता। इस पूर्णता में हमारे राष्ट्रीय प्रतीक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। तिरंगा भी इन्हीं राष्ट्रीय अहसासों की सरस अभिव्यक्ति ही है। आजादी के पर्व को महज छुट्टी के रूप में देखने वाले लोगों को इस बात का गहरा अहसास होना चाहिए कि आजादी को हासिल करने के लिये वर्ष 1857 से 1947 के बीच हुए स्वतंत्रता संग्राम में देशवासियों ने कितनी बड़ी कीमत चुकायी। परतंत्र भारत में जीने वाले भारतीयों को इस बात का गहरा अहसास था कि आजादी की कीमत क्या होती है। बीते साढ़े सात दशक की हमारी उपलब्धि बताती है कि इन सालों में हमने आज जो हासिल किया उसे हम गुलामी के सैकड़ों सालों में भी हासिल नहीं कर पाये। इस आजादी को अक्षुण्ण बनाये रखना हमारा पुनीत कर्तव्य है। इसी आजादी का प्रतीक है तिरंगा। आसमान में शान से लहराता तिरंगा हमें बताता है कि हम एक स्वतंत्र, संप्रभु और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रतिनिधि देश के नागरिक हैं। इस तिरंगे की शान हमें बनायी रखनी है।

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