सुरक्षा में सेंध

सुरक्षा में सेंध

यह खबर चौंकाती है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी व सेना से जुड़ी एक आईटी कंपनी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, विपक्षी नेताओं तथा राज्यों के मुख्यमंत्रियों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी जुटाती रही है। गोपनीय ढंग से डेटा जुटाना चीन के ‘हाइब्रिड वारफेयर’ की कुत्सित कोशिशों का हिस्सा है, जिसके जरिये गैर सैन्य तौर-तरीकों से किसी देश को नुकसान पहुंचाने के प्रयास किये जाते हैं। जाहिरा तौर पर देश का मन पढ़ने और भावी रणनीतियों के निर्धारण के घटकों को समझकर चीन अपनी चालों को चलने की तैयारी में है। ऐसे में लगता है कि भले ही देर से ही सही, भारत सरकार ने पिछले दिनों चीन के जिन दो सौ एप पर प्रतिबंध लगाया है, वह इस दिशा में उठाया गया सही कदम था। इससे बढ़कर आगे देखें तो चीन ने भारतीय बाजारों को स्मार्टफोनों से पाट दिया है, जिनके माध्यम से तमाम आम व खास लोगों के डेटा पर आसानी से हाथ डाला जा सकता है। चीन उन्नत तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिये उस मुकाम पर पहुंच गया है कि अमेरिका समेत पूरी दुनिया में उस पर राजनीतिक-सामरिक जासूसी के आरोप लग रहे हैं। निस्संदेह साइबर रूट के जरिये भारत के प्रमुख नागरिकों व संस्थाओं की जासूसी किया जाना राष्ट्रीय चिंता का विषय है। दरअसल, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी एक कंपनी झेनहुआ डेटा इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी कंपनी लिमिटेड राजनेताओं, रक्षा विशेषज्ञों तथा महत्वपूर्ण विभागों के प्रमुखों समेत करीब दस हजार से अधिक लोगों के डेटा को गोपनीय ढंग से एकत्र करके चीन भेज रही थी। इस माह की शुरुआत में जब कंपनी के वेबसाइट के जरिये कुछ सवाल पूछे गये तो कुछ ही दिनों बाद वेबसाइट बंद कर दी गई। दरअसल, भारतीयों की डिजिटल गतिविधियों को ट्रैक करने के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बड़ी डेटा संग्रहण तकनीक का उपयोग किया जा रहा था। कंपनी द्वारा विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर महत्वपूर्ण व्यक्तियों की ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी रखी जा रही थी।

निस्संदेह इस हाईटेक षड्यंत्र के दूरगामी घातक परिणाम हो सकते हैं। दरअसल, आज युद्ध परंपरागत तौर-तरीकों के बजाय तकनीक निपुणता के बूते कई मोर्चों पर लड़े जा रहे हैं। हमें अपने विशिष्ट लोगों और महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्थानों की सुरक्षा रणनीति पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। जाहिर है कि ये डेटा जुटाकर भारत के खिलाफ इन्हें सूचना हथियार के रूप में ही प्रयुक्त किया जायेगा। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया और भारत कोरोना संक्रमण के भयावह संकट से जूझ रहा है, चीन की कुत्सित चालें बताती हैं कि यह देश कितना निर्मम है और अपने साम्राज्यवाद के विस्तार के लिये किसी भी सीमा तक जा सकता है। वह डेटा चुराकर इसे एक रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करेगा। निस्संदेह आज के आधुनिक युग में डेटा गोला-बारूद से ज्यादा घातक साबित हो सकता है। इसका निष्कर्ष यह भी है कि चीन थल, जल और आकाश के साथ ही साइबर क्षेत्र में भी भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध लड़ रहा है, जिसको लेकर देश को सजग-सचेत होने की जरूरत है। इस खुलासे को हमें खतरे की घंटी के रूप में देखना चाहिए, जिसके मुकाबले के लिये सैन्य, राजनयिक और आर्थिक मोर्चों से आगे जाकर सोचने की जरूरत है। नागरिकों की सूचनाओं की गोपनीयता के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी नीतियों पर नये खतरे के संदर्भ में विचार करने की जरूरत है। इसके लिये सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में कड़े प्रावधान शामिल किये जाएं, तभी साइबर सुरक्षा के प्रयासों को कवच प्रदान किया जा सकेगा। इतना ही नहीं, देश को इस बात पर विचार करना होगा कि आने वाले समय का युद्ध महज परंपरागत तौर-तरीकों से ही नहीं लड़ा जायेगा। तीनों सेनाओं को साइबर युद्ध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता लैस तकनीकों से मुकाबले के लिए तैयार करने की जरूरत है। यहां उल्लेखनीय है कि चीनी कंपनी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, आर्मी, नेवी और एयरफोर्स प्रमुखों समेत महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्थानों की निगरानी भी कर रही थी।

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