बहू-बेटियां होली के उत्सव को भी प्यारा पर्व बना देती हैं। अपनों संग मस्ती में झूमने और त्योहारी रंगत में गुम हो जाने वाला स्त्रीमन का भाव-चाव सचमुच सुंदर होता है। वहीं समाज को व्यवहार की सतरंगी डोरी से बांधने वाली भी बहू-बेटियां ही हैं। परिधानों व लोकगीतों तक सांस्कृतिक रंगों को महिलाओं ने खाद-पानी दिया है। सुख-दुख में साथ देने का भाव हो या तीज त्योहार का निबाह- ऐसी जिम्मेदारियां महिलाएं ही निभाती आई हैं।
स्त्रियां, समाज और परिवार में स्नेह का रंग बिखेरती है। सम्बन्धों के सतरंगी इंद्रधनुष को सजाती हैं। नेह का गुलाल उड़ाती हैं। जुड़ाव की रंगाई से संवेदनाओं को पोसती हैं। घर-परिवार में साथ-स्नेह की चटक आभा से रिश्तों को मजबूती देती हैं। स्त्रियां ही तो हैं जो, साझी संस्कृति के अबीर से समाज की रंगत को कायम रखती हैं। स्नेह और सद्भाव का पर्व होली, महिलाओं की इस मानवीय भूमिका को और गहराई से रेखांकित करता है। गुजिया की मिठास से लेकर अपनों की मनुहार तक। आस-पड़ोस के मेलजोल से लेकर रिश्तों के त्योहारी अभिवादन तक। सहेलियों के आपसी उल्लास से लेकर परिजनों के मान-सम्मान तक। रंगपर्व पर स्त्रियों की संवेदनाओं से पूरित सतरंगी भूमिका और मुखर हो उठती है।
मन के रंग
महिलाएं मन के रंगों को पूरे मन और मान के साथ जीती हैं। अनगिनत तकलीफ़ों के बीच भी त्योहारी रौनक को पोसने का भाव भारतीय स्त्रियां सदा से करती आई हैं। होली भी औपचारिकताओं से परे जीवन जीने का एक सतरंगी उत्सव ही होता है। महिलाएं भी रंगों की फुहार में खुलकर हास-परिहास करती हैं। गृहिणी हों या कामकाजी, होली के रंग महिलाओं के जीवन में नया उल्लास ले आते हैं। रंग तो यूं भी हर इंसान की मनःस्थिति पर सकारात्मक असर डालते ही हैं। खिलते पलाश और स्पंदित प्रकृति की इस रुत में स्त्रीमन भी घर-आंगन में बिखरते रंगों से उल्लासित हो उठता है। अपनों के संग रंगभरी मस्ती में झूमने और त्योहारी रंगत में गुम हो जाने वाला, स्त्रीमन का यह भाव-चाव सचमुच बेहद सुंदर होता है। स्त्रियां ब्रज की लट्ठमार होली में हुड़दंग और मस्ती का भी हिस्सा बनती हैं और उत्तराखंड में पारम्परिक परिधान पहन लोकगीत गाते हुए शुभकामनाएं देती गांव-शहर भर में टोलियों में भी निकलती हैं। महिलाएं, रंगों की बौछार के बीच खुलकर हंसी-ठिठोली करती हैं और बड़े-बुजुर्गों के साथ गुलाल लगाकर अहसासों से पूरित अभिवादन भी। बहू-बेटियां होली के रंगीन उत्सव को भी प्यारा पर्व बना देती हैं।
जीवन के रंग
जीवन के रंग स्त्री जीवन, व्याख्या से परे हैं। हमारे समाज में महिलाओं ने बंधन और खुलेपन दोनों के रंग जीये हैं। आज भी जीती हैं। बावजूद इसके जीवन के हर फीकेपन से आत्मविश्वास की रंगत के संग जूझने का पाठ भारतीय महिलाओं से ही सीखा जा सकता है। हमारे यहां स्त्रियों ने जिजीविषा की लाली और सहजता की आभा सब कुछ जीया है। जैसे होली के रंग समाज में सामाजिकता और जुड़ाव को पोसते हैं वैसे ही समाज को व्यवहार के सतरंगी वर्ण की डोरी से बांधने वाली भी बहू-बेटियां ही रही हैं। इंद्रधनुष के रंग हर ओर बिखेरने वाला यह उत्सव महिलाओं की ज़िंदगी को माधुर्य की उमंगों और तरंगों से जोड़ता है। स्त्रियां भी सकारात्मकता और नेह-साथ का यह भाव लौटाने से नहीं चूकतीं। होली पर गली में निकली स्त्रियों की टोलियां जुड़ाव के इसी जीवंत रंग की वाहक बनती हैं। जिसके चलते परिवार और आस-अड़ोस में यह त्योहार मेल-जोल का सुंदर अवसर बन जाता है। महिलाओं के मन का जुड़ाव ही है कि समय के साथ आए अनगिनत बदलावों के बावजूद इस त्योहार पर गुजिया की मिठास भी पकवानों का हिस्सा बनाती हैं और मालपुआ-दही बड़ा भी। असल में बात पकवानों और परिधान की हो या परम्पराओं के निर्वहन की, त्योहारी छटा के विविध रंग स्त्रीमन के साझीदार होते ही हैं। होली इस रौनक को जीने का सबसे प्यारा उत्सव है।
संस्कृति के रंग
पारंपरिक परिधानों के रंगों से लेकर संस्कृति की सुंदर छटा तक- कल्चरल रंगों को महिलाओं ने खाद-पानी दिया है। लोकगीतों के शब्द तो स्त्रियों के सुर के बिना अधूरे ही हैं। भंवरों की गुंजन की इस रुत में होली के उत्सवीय रंग महिलाओं के गाये गीतों में सुनाई भी देते हैं। लोक के इन सुंदर रंगों को महिलाएं पीढ़ियों से पोसती आई हैं। इन गीतों में सुख-दुख बांटने से लेकर मन की कहने तक, कितने ही भाव छिपे होते हैं। राजस्थान में परंपरागत सफेद, लाल, पीले रंग की साड़ी पहनने की रीत है। इस फागणिया परिधान को पहनना बहुत शुभ माना जाता है। कहा भी जाता है कि स्त्री रंगों में रचा-बसा जीवन ही पसंद करती है। तभी तो जीवनभर प्रकृति, परिवेश-संस्कृति के रंगों को चाव के संग अपनी और अपनों की ज़िंदगी में शामिल करने का रास्ता खोजती रहती है। होली का उत्सव नारी मन के इस पहलू की भी सतरंगी झांकी सा है।
सम्बन्धों के रंग
होली के त्योहार पर ख़ुशी, उल्लास और हर औपचारिकता से परे अपनेपन का भाव मुखर होता है। सम्बन्धों के लिए संजीवनी बनने वाला सुख और सहजता का यह परिवेश घर की बहू-बेटियां ही बनाती हैं। रिश्तों के रंगों को पोषण देती हैं। सुख-दुख में साथ देने का भाव हो या तीज-त्योहार का निबाह- हर आंगन में प्रेमपगे रंगों को जीते हुए ऐसी जिम्मेदारियां महिलाएं ही निभाती आई हैं। होली, रिश्तों के बीच मतभेद और शिकायतें दूर करने का मौका भी होता है। याद रहे कि अपनों को आंगन में इकट्ठा करने के ऐसे न्योते घर की स्त्रियां ही भेजती हैं। देश के कई हिस्सों में शादी के बाद बेटियां को पहली होली के लिए मायके बुलाया जाता है। सरसों और टेसू के चटक रंगों की यह रुत इस पर्व के माध्यम से सम्बन्धों को सींचने भी आती है। रिश्तों को जोड़ने और जोड़े रखने का अवसर बनती है। जिसका सेतु स्त्रियां बनती हैं।

