फिल्म संगीत में नीचे सुर में गाए गए, भावप्रधान और गहराई वाले गीत अब कम हो रहे हैं। जबकि एक दौर में ऐसे गीत ही मुख्यधारा थे। जो टिकाऊ भी साबित हुए। इनका श्रोता वर्ग मौजूद है, 30+ उम्र का धैर्य से पूरा गीत सुनने वाला। लेकिन आज संगीत जगत जिनके हिसाब से चलता है, वे ज्यादातर रील्स देखने वाले युवा हैं जो 10 सेकंड में रुकने या स्क्रॉल करने वाले श्रोता हैं,लेकिन जिनकी पसंद पर ट्रेंड तय होता है- वे तेज़, ऊंचे सुर चाहते हैं।
आज दिल में उतरने वाले मधुर गीत फिल्म संगीत के हाशिये पर चले गए। यह संगीत का नहीं, हमारे समय का सवाल है। ‘सीधे दिल में उतरने वाला गीत’ दरअसल वह होता है जो सुनने के दौरान ही नहीं बल्कि उसके बाद भी बहुत देर तक हमारे कानों में बजता रहे और दिलो-दिमाग में गूंजता रहे। आज ऐसे गीत कम इसलिए नहीं हैं कि प्रतिभा खत्म हो गई है, बल्कि इसलिए कि दिल तक पहुंचने का रास्ता बदल गया है और छोटा भी कर दिया गया है। अगर हम आज के बॉलीवुड संगीत को ध्यान से सुनें, तो साफ़ दिखता है कि नीचे सुर (मंद्र सप्तक) में गाए गए ठहरे हुए, भावप्रधान और गहराई वाले गीत अब अपवाद बनते जा रहे हैं। जबकि एक दौर ऐसा भी था, जब ऐसे गीत ही मुख्यधारा हुआ करते थे और वही गीत सबसे ज़्यादा टिकाऊ साबित हुए हैं।
गीतों के प्रभावी होने की वजह
भारतीय शास्त्रीय परंपरा में नीचे सुर को गंभीरता, ठहराव, विरह, आत्मीयता और आत्मसंवाद का स्वर माना जाता है। फिल्मी संगीत में जब यह सुर आया, तो उसने शोर नहीं, अनुभूति पैदा की। मसलन, ‘लग जा गले...’(स्वर- लता मंगेशकर, संगीत-मदन मोहन) नीचे सुर का यह गीत सुकून की पराकाष्ठा है। आवाज़ में न कोई जल्दबाज़ी है, न दिखावा- बस एक अंतिम आग्रह, जो फुसफुसाहट में भी अमर हो गया। इसी तरह है, ‘चिंगारी कोई भड़के...’( किशोर कुमार, संगीत-आर. डी. बर्मन) किशोर कुमार का यह गीत यह साबित करता है कि मध्यम और नीचे सुर दर्द को चीखता नहीं, सहता है। इसी तरह, ‘अभी न जाओ छोड़कर...’(स्वर- मोहम्मद रफ़ी एवं लता मंगेशकर) यह गीत संवाद है, आग्रह है और प्रेम का सभ्य ठहराव है। सुर संयमित हैं। इसी तरह है, ‘वो शाम कुछ अजीब थी..’ ( किशोर कुमार, संगीत- हेमंत कुमार) इस गीत में सुर नहीं चलते, ठहरते हैं।
सवाल ऐसे गीत नहीं बनने का
ऐसे गीत नहीं बनने की वजहें हैं-सुनने की आदत नहीं रहना यानी आज संगीत अक्सर मोबाइल स्पीकर, रील्स और जिम प्लेलिस्ट के लिए बन रहा है। नीचे और मध्यम सुर के लिए शांत वातावरण और ध्यान चाहिए जो आज दुर्लभ है। वॉल्यूम और बीट्स का वर्चस्व : आज के गीत ‘सुनाई देने’ के लिए बनाए जाते हैं, ‘महसूस होने’ के लिए नहीं। तेज़ बीट्स और ऊंचे सुर तुरंत ध्यान खींचते हैं। प्लेबैक गायकी का पतन : पहले गायक किरदार से पहले भाव खोजते थे। आज कई गाने खुद कलाकार पर फ़िल्माए जाते हैं। प्रशिक्षण की कमी : नीचे और मध्यम सुर में गाने के लिए रियाज़, सांस पर नियंत्रण चाहिए,जो फिल्म जगत में कम हो रहा है। बाज़ार का दबाव : म्यूज़िक कंपनियां चाहती हैं- पहले 10 सेकंड में हिट। नीचे सुर वाला गीत धीरे खुलता है, इसलिए ‘रिस्की’ माना जाता है।
पूरी तरह गायब भी नहीं हुए
आज मधुर गीत फिल्म संगीत के हाशिये पर चले गए, लेकिन खत्म नहीं हुए। कुछ चुनिंदा फिल्मों और स्वतंत्र संगीत में आज भी ऐसे प्रयास दिखते हैं, लेकिन वे मुख्यधारा नहीं बन पा रहे। आज भी कुछ मधुर गीत बन रहे हैं जो बिना शोर किये दिल में उतर जाते हैं जैसे- ‘अगर तुम साथ हो..’ (गायक- अरिजीत सिंह, अलका याग्निक, संगीत- ए.आर. रहमान) यह गीत आज के दौर में मधुर गीत की सशक्त वापसी है। अंतरे खासकर मंद्र और मध्य सप्तक में टिके हैं। अलका याग्निक की आवाज़ पुराने दौर की गंभीरता लौटाती है, जबकि अरिजीत का संयम गीत को समकालीन बनाता है। इसी तरह ‘फिर ले आया दिल..’(अरिजीत ,संगीत-प्रीतम) यह गीत ऊंचे सुर से नहीं, सांसों के उतार-चढ़ाव से चलता है। संस्करण खासतौर पर नीचे सुर में ठहराव महसूस कराता है- गुनगुनाहट की तरह। जबकि यह गीत, ‘चन्ना मेरेया..’ (गायक- अरिजीत सिंह, संगीत- प्रीतम, भले ही मुखड़ा ऊंचाई छूता हो, लेकिन अंतरे और भावात्मक आधार नीचे सुर में ही बैठा है। ऐसे ही गीतों में, ‘इकतारा...’ (गायक- कविता सेठ,संगीत- अमित त्रिवेदी) भी है यह गीत मिड-लो स्केल में बहता है। न कोई ज़ोर, न तामझाम-बस अकेलेपन और आत्मसंवाद की धुन।
सवाल है आज नीचे सुर में गीत कम क्यों बन रहे हैं.. जबकि उन्हें पसंद करने वाले बहुत लोग हैं? इसका जवाब संगीत से ज्यादा समाज, बाज़ार, तकनीक और मनोविज्ञान से जुड़ा है। यह भी कि नीचे सुर के गीतों को पसंद करने वाले लोग कम नहीं हुए हैं,वे बस निर्णायक ताक़त नहीं रह गए।
सवाल पसंद का नहीं बाजार का है
मधुर यानी नीचे और मध्यम सुर के गीत पसंद करने वाले आज भी बहुत हैं, पर ‘डिसीजन मेकर’ कम हैं नीचे सुर के गीतों का श्रोता वर्ग आमतौर पर 30+ उम्र का धैर्य से सुनने वाला एल्बम या पूरा गीत सुनने वाला होता है। लेकिन आज संगीत उद्योग जिनके हिसाब से चलता है, वे हैं- रील्स देखने वाले युवा,पहले 10 सेकंड में रुकने या स्क्रॉल करने वाले श्रोता और डेटा एनालिटिक्स यानी पसंद करने वाले बहुत हैं,लेकिन जिनकी पसंद पर पैसा, प्रमोशन और ट्रेंड तय होता है- वे तेज़, ऊंचे और तुरंत पकड़ में आने वाले सुर चाहते हैं। नीचे सुर ‘धीमा असर’ करते हैं मगर बाज़ार ‘तुरंत असर’ चाहता है। ज़्यादातर लोग गाने सुनते हैं- मोबाइल स्पीकर में, ईयर बड्स में, ब्लूटूथ स्पीकर में - इनमें लो-फ्रिक्वेंसी में आवाज़ ‘डल’ लगती है। तो संगीत निर्माता ऐसे सुर चुनते हैं जो छोटे स्पीकर पर भी ‘कट’ करें। वहीं नीचे सुर के गीत सांस, स्थिरता और रियाज़ की मांग करते हैं जबकि आज फिल्मी संगीत में गायक से ज्यादा परफ़ॉर्मर चाहिए।
-इ.रि.सें.
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