शुरुआत में कुत्ते का काटना केवल मामूली घाव लग सकता है लेकिन अगर इलाज नहीं कराया गया तो रेबीज का वायरस किसी भी समय उभर सकता है और फिर जानलेवा हो जाता है। इसलिए कुत्ते के काटने या नाखून लगने के तुरंत बाद जख्म को साबुन से धोएं (नल के बहते पानी में)। वहीं समय पर टीकाकरण और आवश्यक उपचार करा लिया जाए तो रेबीज से बचाव संभव है।
इस 21वीं सदी में भी रेबीज दुनिया के कुछ सबसे खतरनाक संक्रमणों में से एक है। अगर किसी को रेबीज का संक्रमण हो जाए, तो उसे चिकित्सा व्यवस्था कतई बचा नहीं पाती। व्यक्ति की सौ फीसदी मौत तय है, लेकिन इसी बीमारी के साथ एक यह तथ्य भी है कि अगर रेबीज के लक्षण आने से पहले समय पर और सही उपचार मिल जाए, तो इससे सौ फीसदी बचाव सुनिश्चित है। हर साल विश्व रेबीज दिवस भी मनाया जाता है। जो याद दिलाता है कि रेबीज केवल कुत्ते के काटने की बीमारी नहीं है बल्कि लापरवाही, उपचार में देरी से भी यह जुड़ी जानलेवा सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है।
कुत्तों आदि से फैलने वाला संक्रमण
जैसा कि हम जानते हैं रेबीज एक विषाणुजनित बीमारी है, जो संक्रमित स्तनधारी जानवर की लार के माध्यम से फैलती है। भारत में इसके संक्रमण का सबसे प्रमुख स्रोत कुत्ते हैं। अगर रेबीज से संक्रमित कोई कुत्ता किसी को काट ले या उसके पंजों से गहरी खरोंच हो जाए, तो उसके जरिये भी शरीर में वायरस प्रवेश कर सकता है और तंत्रिकाओं के रास्ते केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुंच सकता है। यही उसकी सबसे बड़ी भयावहता होती है।
तुरंत इलाज में ही बचाव
शुरुआत में कुत्ते का काटना केवल एक मामूली घाव लग सकता है और कभी-कभी काटने के बाद निशान तो दो-चार दिन के बाद ठीक हो जाते हैं, लेकिन अगर इलाज नहीं कराया गया और शरीर में रेबीज का वायरस पड़ा रहा, तो वह किसी भी समय उभर सकता है और फिर जानलेवा हो जाता है। इसलिए कुत्ते या किसी भी जानवर के काटने पर लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए, तुरंत इलाज कराना चाहिए ताकि बीमारी के लक्षण आने से पहले ही शरीर से रेबीज का वायरस खत्म हो जाए।
ये हैं रोग के शुरुआती संकेत
याद रखिए सिर्फ कुत्ते में ही रेबीज के वायरस नहीं होते, बिल्ली, गधा और चूहे के काटने से भी रेबीज का वायरस शरीर में जा सकता है। लेकिन इसके साथ एक अच्छी बात है कि तुरंत यह एक्टिव नहीं होता। कुछ सप्ताहों की मोहलत देता है। यही सबसे अच्छा समय होता है कि हम बिना किसी लापरवाही के रेबीज का इलाज करा लें। अगर हम ऐसा नहीं कराते तो कुछ ही दिनों में पहले बुखार आयेगा, फिर शरीर में कमजोरी महसूस होगी, फिर बेचैनी बढ़ेगी, सिरदर्द या काटे गये स्थान पर असहनीय दर्द शुरू होगा। शरीर में जबर्दस्त झनझनाहट होगी या पूरी तरह से संवेदनशीलता खत्म हो जायेगी। धीरे-धीरे तंत्रिका तंत्र प्रभावित होने पर पानी निगलने में कठिनाई होगी। अत्यधिक उत्तेजना, भ्रम, मतिभ्रम, लकवा और अन्य गंभीर न्यूरोलॉजिकल लक्षण पैदा हो जाते हैं। यही रेबीज का सबसे कठोर सच है।
ये लक्षण हैं संकट की निशानी
क्लीनिकल लक्षण शुरू हो जाने के बाद रेबीज लगभग हमेशा घातक हो जाता है। लेकिन कहानी यहीं नहीं खत्म होती, असली उम्मीद इसके पहले होती है। अगर कोई संभावित संक्रमित जानवर आपको काट ले या गहरी खरोंच मार दे, तो सबसे पहले घाव को तुरंत साबुन और बहते पानी से अच्छी तरह से धोना चाहिए, इसके बाद बिना समय गंवाये चिकित्सा केंद्र तक जाएं और किसी भी तरह का जोखिम न लें। रेबीजरोधी टीके और कुछ परिस्थितियों में रेबीज इम्यूनोग्लोब्यूलिन की जरूरत है या नहीं, यह इसके लक्षणों को देखने का इंतजार नहीं करना चाहिए। क्योंकि एक बार अगर लक्षण पैदा हो जाएं तो बचाव मुश्किल हो जाता है। दरअसल रेबीज से हमारी लड़ाई लक्षण आने के बाद नहीं, उसके पहले से ही शुरू होती है। एक बार लक्षण आ जाएं तो बचना असंभव होता है। इसलिए ही कहते हैं कि इस सौ फीसदी मौत वाले संक्रमण से सौ फीसदी बचाव संभव है, लेकिन यह बचाव समय रहते करना चाहिए। अगर रेबीज के लक्षण आने से पहले समय पर उचित रोकथाम कर ली गई, तो रेबीज से हर हालत में बचाव हो जाता है, लेकिन अगर जरा भी लापरवाही हुई और लक्षण आने के पहले उन्हें खत्म करने की कोशिश नहीं की गई तो मौत लगभग निश्चित है। इसलिए कभी भी समय न गंवाएं।
कुत्ता काट ले तो तुरंत ये करें
घाव को साबुन लगाकर बहते पानी में धोएं और काफी देर तक। घाव को ढककर घरेलू उपचार करें, इस पर मिर्च, तेल, मिट्टी, राख या अन्य पदार्थ लगाने से बचें। जितना जल्दी हो सके, तुरंत चिकित्सीय सहायता लें। नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में अपना चिकित्सीय मूल्यांकन कराएं तथा टीकाकरण में कतई देर न करें। चिकित्सक आपके जोखिम के आधार पर रेबीजरोधी टीके की आवश्यकता और समयसारणी तय करेंगे। कुछ मामलों में डॉक्टर रेबीज और इम्यूनोग्लोब्यूलिन की सलाह दे सकते हैं। रेबीज की रोकथाम का सबसे महत्वपूर्ण समय लक्षण आने से पहले का होता है। इसलिए लक्षणों का इंतजार कतई न करें।
-इ.रि.सें.

