देश-दुनिया में करोड़ों लोग दुर्लभ रोगों से पीड़ित हैं जिनमें अधिकांश आनुवंशिक होते हैं। ये पूरी जिंदगी पर असर डालते हैं। इनमें आम रोग जैसे लक्षण दिखते हैं लेकिन ये सामान्य बीमारियां नहीं होतीं। इनके निदान में वर्षों लग जाते हैं, वहीं इलाज बहुत महंगा है। इन हजारों रोगों में कई लाइलाज भी हैं। ऐसे रोगों से मुक्ति केवल अस्पताल के जरिये संभव नहीं। बल्कि स्कूलों में समावेशी शिक्षा, कार्यस्थलों में संवदेनशील नीतियां और समाज में सहानुभूति का होना जरूरी है।
कुछ बीमारियां इतनी कम दिखती हैं कि वे समाज, चिकित्सा व्यवस्था और नीति निर्माताओं की नजर से भी ओझल रह जाती हैं। इन्हें दुर्लभ रोग कहा जाता है यानी जो दुनिया के बहुत कम लोगों को होते हैं। लेकिन जिनका असर जीवन पर बेहद गहरा और अकसर आजीवन होता है। विडंबना यह है कि संख्या में कम होने के बावजूद दुर्लभ रोगों से पीड़ित लोगों की सामूहिक संख्या दुनियाभर में करोड़ों में है। शायद इसीलिए हर साल 28 फरवरी या लीप ईयर में 29 फरवरी को यह महत्वपूर्ण दिवस मनाया जाता है ताकि लोग दुर्लभ कही जाने वाली इन बीमारियों को लेकर सजग रहें।
ऐसे होते हैं दुर्लभ रोग
भारत में आमतौर पर दुर्लभ रोग उन्हें माना जाता है, जो दस हजार में से किसी एक व्यक्ति को या उससे भी कम लोगों को होते हैं। लेकिन ये रोग भले कम लोगों को होते हों, मगर इन रोगों की कम संख्या नहीं है। अब तक दुनिया में 7 हजार से ज्यादा ऐसे रोग चिन्हित किए जा चुके हैं, जिन्हें दुर्लभ रोग कहा जा सकता है। इनमें से अधिकांश रोग आनुवंशिक या जेनेटिक होते हैं। इन रोगों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनके लक्षण तो सामान्य बीमारियों जैसे ही दिखते हैं, लेकिन ये सामान्य बीमारियां नहीं होतीं, यही कारण है कि इनके निदान में वर्षों लग जाते हैं और हां, इनका इलाज भी बहुत महंगा होता है अथवा कोई इलाज ही नहीं उपलब्ध होता।
समूची जिंदगी पर असर
दुर्लभ रोग किसी एक अंग या समस्या तक सीमित नहीं होते। वे व्यक्ति की पूरी जीवन यात्रा को प्रभावित करते हैं। शिक्षा, रोजगार, विवाह, सामाजिक स्थिति और स्वीकार्यता जैसे सभी सामाजिक पहलुओं पर इस दुर्लभ रोग का बहुत जबर्दस्त प्रभाव पड़ता है। कई मामलों में बच्चे बहुत कम उम्र में ही किसी गंभीर शारीरिक या मानसिक चुनौती से जूझ रहे होते हैं। माता-पिता अस्पतालों के चक्कर लगाते रहते हैं और सही डॉक्टर की तलाश में अपना समय, ऊर्जा और अपने समूचे आर्थिक संसाधन खर्च करते रहते हैं। फिर भी कई बार किसी दुर्लभ रोग के लिए योग्य डॉक्टर मिलने की संभावना बहुत कम रह जाती है यानी इलाज सीमित व महंगा और अनिश्चित होने के साथ-साथ रोग की पहचान भी दुर्लभ होती है।
स्वास्थ्य सजगता का महत्व
दुर्लभ रोग दिवस का सबसे बड़ा उद्देश्य लोगों को इनके बारे में जागरूक करना है। डॉक्टरों में, समाज में और सरकारों में, दुर्लभ रोगों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना है। जागरूकता बढ़ने से सबसे बड़ा लाभ ये होता है कि डॉक्टर शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से लेते हैं और इसके निदान में लगने वाले वर्षों को कम करके महीनों में बदल देते हैं। लेकिन ऐसा तब होता है, जब सरकारें दवाओं, रिसर्च और सहायता योजनाओं के बजट तय करती हैं और लोगों को इनकी दहशत से मुक्ति दिलाती हैं। दुर्लभ रोग दरअसल सिर्फ बीमार होने की डिग्री के मामले में ही गंभीर नहीं होते बल्कि ये रोग, पीड़ित व्यक्ति को भी दुनिया से अलग-थलग कर देते हैं और उसे यह महसूस कराते हैं कि वह कुछ गिने-चुने दुर्भाग्यशाली लोगों में से एक है, तभी इतनी खतरनाक बीमारी से पीड़ित हैं। यह दिवस बताता है कि स्वास्थ्य की गंभीर समस्याओं के लिए स्वास्थ्य की देखभाल करने वाली बिरादरी चिंतित है और पीड़ित लोगों के साथ भी है। इसलिए दुर्लभ रोगों के संबंध में बीमार को समय रहते जानकारी मिलना जरूरी है कि वह आखिर किस रोग से पीड़ित है और क्या यह उसकी पिछली पीढ़ियों से चला आ रहा रोग है? अगर ऐसा होता है तो कोशिश की जाती है कि आने वाली पीढ़ियां इन विशेष रोगों से पीड़ित न हों।
भारत में चुनौती
यूं तो पूरी दुनिया के लिए दुर्लभ रोग एक गंभीर समस्या हैं, लेकिन भारत के लिए भी यह विकट चुनौती है। क्योंकि हमारी जनसंख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है और हमारे पास बीमारियों से लड़ने के लिए संसाधन सीमित हैं। इसलिए भारत में दुर्लभ रोग एक दिखायी न देने वाला सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। अनुमान है कि देश में 7 से 9 करोड़ तक लोग किसी न किसी दुर्लभ रोग से पीड़ित हैं। विशेषकर ऐसे रोगों से पीड़ित लोगों के लिए सबसे बड़ी समस्या ग्रामीण क्षेत्र में होती है, जहां विशेषज्ञों की कमी और जांच सुविधाएं बहुत सीमित होती हैं। अधिकांश इलाज आम आदमी की सीमा से बाहर होता है यानी इलाज में खर्च आने वाला बजट आम आदमी के बस में नहीं होता। इसलिए हाल के वर्षों में सरकार ने राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति बनायी है। लेकिन यह बात भी सही है कि इस दिशा में पर्याप्त कदम उठाने के लिए अभी काफी दिन लगेंगे और बहुत सारे संसाधनों की जरूरत होगी।
दुर्लभ रोगों में समाज की भूमिका
चूंकि दुर्लभ रोग दिवस हमें सोचने पर मजबूर करता है कि सभी तरह की बीमारियों से छुटकारा पाना केवल अस्पताल के जरिये संभव नहीं है। क्योंकि यह एक सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। इसलिए स्कूलों में समावेशी शिक्षा, कार्यस्थलों में संवदेनशील नीतियां और समाज में सहानुभूति का होना जरूरी है। इन सब चीजों के जरिये ही हम दुर्लभ रोगों से निपटने में सफल होते हैं। लब्बोलुआब यह कि 28 फरवरी का दिन सिर्फ एक स्वास्थ्य दिवस नहीं है बल्कि यह अनदेखी पीड़ाओं को देखे जाने की अपील का दिन है। यह सजगता तभी पूरी होगी, जब हम उन आवाजों को भी सुनें, जो संख्या में कम हों, लेकिन इससे उनका दर्द कम नहीं होता। -इ.रि.सें.

