बॉलीवुड के कई हिट गीतों को बांसुरी वादक पद्मश्री रोनू मजूमदार ने अपनी बांसुरी की धुन से और मधुर बनाया। उनका यह सफर ‘1942: ए लव स्टोरी’ के गीत ‘कुछ न कहो कुछ भी न कहो’से शुरू हुआ जिससे उन्हें अलग ही पहचान मिली। उन्होंने पंडित रविशंकर, उस्ताद जाकिर हुसैन, जॉर्ज हैरिसन और आर.डी. बर्मन जैसे दिग्गजों के साथ काम किया।
फिल्म ‘1942: ए लव स्टोरी’ में अपनी बांसुरी के माध्यम से एक अलग पहचान के साथ बांसुरी वादक रोनू मजूमदार ने फिल्म संगीत में कदम रखा। बाद में उन्होंने कई हिट गानों को अपनी बांसुरी की धुन से सजाया। इनमें ‘कुछ न कहो कुछ भी न कहो’, फिल्म ‘माचिस’ का गीत ‘पानी-पानी रे’ और फिल्म ‘लव स्टोरी’ का गीत ‘याद आ रही है’ जैसे कई गीत शामिल हैं। साल 2014 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला और 2025 में पद्मश्री। उनके नाम दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स भी हैं। एक कार्यक्रम के लिए दिल्ली आए पं. रोनू मजूमदार से रेणु खंतवाल की हुई बातचीत :
बांसुरी से आपका साथ कितना पुराना है?
बचपन का साथ है। जब मैं मात्र छह वर्ष का था तो पिताजी डॉ. भानु मजूमदार जी से बांसुरी की शिक्षा लेना शुरू किया। उस समय हम बनारस में रहते थे। मेरे पिताजी होम्योपैथिक चिकित्सक थे। उसके बाद मुझे पंडित विजय राघव राव के पास सीखने भेजा गया। बाद में मैंने भारत रत्न पंडित रविशंकर जी से गहन प्रशिक्षण लिया।
बनारस से मुंबई आना कैसे हुआ?
हम पिताजी के होम्योपैथिक के काम की वजह से मुंबई आ गए। यहां आकर पिताजी को भी काम करने का अच्छा स्कोप मिला और मुझे संगीत सीखने का अच्छा अवसर। काम करने का खूब मौका मिला। अपने चार दशकों के कैरियर में मुझे
पंडित रविशंकर, उस्ताद जाकिर हुसैन, जॉर्ज हैरिसन, फिलिप ग्लास और आर.डी. बर्मन जैसे दिग्गजों के साथ काम करने का मौका मिला।
बर्मन साहब के साथ कोई यादगार पल?
फिल्म ‘1942: ए लव स्टोरी’ के एक गीत की मेकिंग का किस्सा सुनाता हूं। बर्मन दा ने मुझे सचिन देव बर्मन का एक बंगाली गाना ‘रौंगीला रौंगीला रौंगीला रे रौंगीला’ की कैसेट देकर सुनने को कहा। फिर बोले, अब यही बजाओ। शुरू की लाइन को मैंने बांसुरी में बजाया। यह धुन सुनने के बाद पंचम दा बोले, ‘रोनू, यह गाना जितना बड़ा हिट होगा, तेरी बांसुरी भी उतनी बड़ी हिट हो जाएगी। लोग तुझे इस गाने से याद करेंगे।’ इस पीस को गाने की शुरुआत में रखा गया। यह वही धुन है जिससे फिल्म ‘1942: ए लव स्टोरी’ का गाना ‘कुछ न कहो कुछ भी न कहो’ शुरू होता है।
चार दशकों से आप काम कर रहे हैं। कितना संतुष्ट महसूस करते हैं?
कलाकार कभी संतुष्ट नहीं होता। अगर हो जाएगा तो उसकी कला को जंग लग जाएगा। कलाकार की जो तड़प होती है और काम करने की इच्छा होती है, वही उसे कलाकार बनाती है।
आपने गुलाम अली साहब के साथ भी बांसुरी बजाई है? उनसे रिश्ते कैसे रहे?
गुलाम अली साहब से मुझे बहुत प्यार मिला। इसकी एक वजह थी कि मैं उनके साथ ठेठ पंजाबी बोलता हूं। उनके साथ मैंने पाकिस्तान में भी बजाया था। जब भारत आते थे तो मुझे फोन करते थे- ओ रोनू भाई तुसी है गयो मुंबई विच..। वे कहते थे कि जब तुम बांसुरी बजाते हो तो तुम्हारी बांसुरी में मिट्टी की खुशबू आती है।
जब आप शिष्य थे तब आपकी क्या सोच रहती थी? आज अपने शिष्यों में क्या अंतर पाते हो?
जब हम सीखते थे तो यह नहीं सोचते थे कि हमें इससे क्या मिलेगा? बस भाव यही रहता था कि अच्छी तरह सीखें। हम पैसा और कैरियर के बारे नहीं सोचते थे। लेकिन आजकल हर चीज में शॉर्टकट चाहिए। सीखने से पहले इस पर ध्यान रहता है कि मिलेगा क्या? मैं युवाओं से कहना चाहता हूं कि आप सबसे पहले अपने विषय को प्यार करो। मन से काम करो। जो ‘डिजर्व’ करते हो वह तुम्हें खुद मिलेगा।
विदेशी कलाकारों के साथ इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स करते समय किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?
सबसे पहले तो हम्बलनेस होनी चाहिए। अहंकार नहीं हो कि मेरा राग ही सर्वश्रेष्ठ है। हमारा संगीत ही सर्वश्रेष्ठ है दूसरों का नहीं। आपको दूसरे के संगीत को भी समझना होगा। सुनना होगा और उसका भी सम्मान करना होगा। तभी आपको पता चलेगा कि उनका संगीत किस तरह का है। मैंने वेस्टर्न क्लासिकल म्यूज़िक भी सीखा। जैज म्यूजिक मुझे फिर अपने आप आ गया।
इन दिनों क्या चल रहा है। क्या नया आ रहा है?
एक सिंगल आया है मेरा जिसका नाम है- ‘यू एंड मी’। इसमें कीबोर्ड शिवम बागीच ने बजाया है। इसमें मैंने रामदासी मल्हार राग बजाया है। इसके अलावा मेरा रोनू मजूमदार फाउंडेशन है जिसके तहत मैं बांसुरी का प्रशिक्षण एवं प्रोत्साहन देता हूं।

