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अजूबों की समृद्ध विरासत भी है तूतनखामन के देश में

ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम

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कैरो शहर के निकट गीज़ा स्थित ‘ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम’ में राजा तूतनखामन के मकबरे की सभी 5,600 दफ़न चीज़ें रखी हैं। जिनमें मंदिर, ताबूत, सिंहासन और रथ शामिल हैं। एक बड़ी इमारत में मिस्र के कई राजवंशों की मूर्तियां और शिल्पकृतियां मौजूद हैं। यहां से गीज़ा के पिरामिड दिखाई देतेे हैं। गीज़ा में केवल म्यूजियम ही दर्शनीय स्थल नहीं, इसके अलावा यहां विश्व के सात अजूबों में शामिल पिरामिड और स्फिंक्स प्राचीन मिस्र के वास्तुशिल्प चमत्कार भी हैं। इतिहास में समय-समय पर इन पर आक्रमणों और प्रकृति की मार भी पड़ी। ये पिरामिड दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

मिस्र जाना लगभग साल भर से टल रहा था। वहां जाने की सबसे बड़ी वजह तूतनख़ामन के मकबरे में दफ़न दुर्लभ वस्तुओं को देखना था। कैरो में ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम, जो लगभग 25 साल से बन रहा था, काफी देरी के बाद आखिरकार आम लोगों के लिए खुल गया। एक नवंबर 2025 को, विज़िटर्स पहली बार म्यूज़ियम की 968,000 स्क्वेयर फ़ीट की पूरी जगह देख पाए। यह 80,000 स्क्वेयर फ़ीट की गैलरी है, जिसमें राजा तूतनखामन के मकबरे की सभी 5,600 दफ़न चीज़ें रखी हैं। इसकी ओपनिंग के कोई तीन हफ्ते बाद, मैं उस म्यूज़ियम में था। म्यूज़ियम के प्लान 1992 में अनाउंस किए गए थे, लेकिन निर्माण 2002 में शुरू हुआ था। आज गीज़ा स्थित ‘ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम’ दुनिया का सबसे बड़ा म्यूज़ियम है। पैरिस का लूव्र म्यूज़ियम अब दूसरे नंबर पर आ गया।

ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम

मेरे जैसे दर्शकों के लिए सबसे ज़्यादा इंतज़ार की जाने वाली जगह रही है, ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम। इनमें से आधे से ज़्यादा चीज़ें—जिनमें मंदिर, ताबूत, सिंहासन और रथ शामिल हैं, पहले कभी दिखाई नहीं गईं। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ़ इजिप्टोलॉजिस्ट्स के प्रेसिडेंट तारेक तौफिक ने यहां आने से पहले मेल पर बताया था, ‘मेरा आइडिया था कि पूरा मकबरा दिखाया जाए, जिसका मतलब है कि स्टोरेज में कुछ भी नहीं रहेगा, दूसरे म्यूज़ियम में कुछ भी नहीं रहेगा, और आपको पूरा अनुभव मिलेगा, जैसा हॉवर्ड कार्टर को सौ साल पहले मिला था।’ उन्होंने कार्टर का ज़िक्र किया, जो ब्रिटिश इजिप्टोलॉजिस्ट थे, और जिन्होंने 1922 में तूतनखामुन का सही-सलामत मकबरा खोजा था।

यहां दूसरी खास बातों में एक बड़ा एट्रियम है, जिसमें रामसेस II की 11 मीटर ऊंची मूर्ति है। उन 12 गैलरियों से गुजरने के वास्ते एक बड़ी स्वचालित सीढ़ी है, जिस पर चलते हुए मिस्र के कई राजवंशों की मूर्तियां और शिल्पकृतियों को आप निहार सकते हैं। सीढ़ी के सामने हॉल से विज़िटर्स को एक विशाल पारदर्शी शीशे के पार गीज़ा के पिरामिड दिखते हैं। यहां पूरा दिन कम पड़ जाता है, और इस वास्ते 41 डॉलर देना अखरता नहीं। पैसा वसूल समझिये। लेकिन, इसकी खलिश रह जाती है, कि भारत ऐसा म्यूज़ियम क्यों नहीं बना सकता था? मिस्र के योजनाकारों की तरह 1।2 बिलियन डॉलर हम भी तो ख़र्च कर सकते थे। नई दिल्ली के नेशनल म्यूज़ियम में दो लाख से ज़्यादा आर्टिफैक्ट्स का विशाल कलेक्शन है, जो 5,000 से ज़्यादा वर्षों की विरासत को दिखाता है। इसमें आर्कियोलॉजी, आर्ट, अभिलेख, सिक्के और भी बहुत कुछ शामिल हैं, हालांकि किसी भी समय इसका छह-सात प्रतिशत ही दिखाया जाता है। गीज़ा के ग्रैंड म्यूज़ियम में इसके आधे ही पुरावशेष या शिल्पकृतियां हैं। और वह दुनिया का सबसे बड़ा म्यूज़ियम है।

वास्तुशिल्प के चमत्कार पिरामिड और स्फिंक्स

लेकिन, क्या कैरो में ग्रैंड म्यूज़ियम ही सबकुछ है? गीज़ा के पिरामिड और स्फिंक्स प्राचीन मिस्र के वास्तुशिल्प चमत्कार हैं, जो फिरौन के मकबरों के रूप में मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास, शाही शक्ति और दिव्य संरक्षण का प्रतीक हैं। स्फिंक्स को पिरामिडों का रक्षक माना जाता था। शक्ति और बुद्धि का संगम। ये अलग-अलग मुखाकृतियों के साथ दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, रहस्य-रोमांच बढ़ाते हैं। किंवदंती है, कि स्फिंक्स सामने वाले से सवाल करती थी, जवाब न मिलने पर उसे खा जाती थी।

कुछ लोग यह भी मानते हैं, गीज़ा में स्थित एक विशाल चूना पत्थर की लेटी हुई स्फिंक्स की प्रतिमा संभवतः राजा खफ्रे ( लगभग 2575-2465 ईसा पूर्व ) के शासनकाल की है, और इसमें उनका चेहरा दर्शाया गया है। लेकिन, बहुत से लोग इसे महिला का चेहरा मानते हैं। गीज़ा का ग्रेट स्फिंक्स विश्व की सबसे विशाल मूर्तियों में से एक है, जिसकी लंबाई लगभग 240 फीट (73 मीटर) और ऊंचाई 66 फीट (20 मीटर) है। इसमें शेर का शरीर, और मानव सिर है, जो शाही मुकुट से सुशोभित है। यह प्रतिमा चूना पत्थर के एक ही टुकड़े से तराशी गई थी। अधिकांश विद्वान ग्रेट स्फिंक्स को चौथे राजवंश का मानते हैं, और इसका स्वामित्व खफ्रे को देते हैं।

सात अजूबों में शामिल विरासत

मिस्र के पिरामिड को विश्व के सात अजूबों में शामिल किया गया है। मेम्फिस क्षेत्र के प्राचीन खंडहर, जिनमें गीज़ा, सक्कारा , दहशूर , अबू रुवैश और अबू सीर के पिरामिड शामिल हैं, को सामूहिक रूप से 1979 में यूनेस्को विश्व विरासत घोषित किया गया है। क्या आप जानते हैं कि मिस्र में 118 से ज़्यादा पिरामिड हैं? गीज़ा में तो सिर्फ़ 10 हैं। ये इमारतें, प्राचीन मिस्र के राजाओं और रानियों के लिए बड़ी कब्रों के तौर पर बनाई गई थीं, जो मरने के बाद की ज़िंदगी, और उनके शान को बरक़रार रखनेवाले विश्वास को दिखाती हैं।

गीज़ा का ग्रेट पिरामिड लगभग 2580 ईसा पूर्व में फिरौन खुफू के लिए बनाया गया, यह मिस्र के पिरामिडों में सबसे बड़ा, और सबसे मशहूर है। यह 481 फीट ऊंचा खुफू पिरामिड प्राचीन दुनिया का एकमात्र बचा हुआ अजूबा है। यहां दूसरे नंबर पर ‘खाफ्रे का पिरामिड’ है। खुफू के बेटे फिरौन खाफ्रे के लिए बनाया गया, यह पिरामिड महान पिरामिड से थोड़ा छोटा है, लेकिन यह इसलिए खास है, क्योंकि इसके ऊपर अभी भी इसकी असली चूना पत्थर की कुछ परत बची हुई है। तीसरा है ‘मेनकाउरे का पिरामिड’। गीज़ा के तीन पिरामिडों में सबसे छोटा, यह फिरौन मेनकाउरे, खाफ्रे के उत्तराधिकारी के लिए बनाया गया था। अपने आकार के बावजूद, इसमें एक सुंदर और जटिल डिज़ाइन है।

आक्रमणों और प्रकृति की मार

खुफू, खफ्रे, और मेनकाउरे, तीनों पिरामिडों को आंतरिक और बाहरी हिस्सों को समय-समय पर लूटा गया था। कब्रों में मूल रूप से रखी गई वस्तुएं गायब हैं। अलग-अलग कालखंडों में कब्रों से लूट, और प्रकृति की मार ने पिरामिडों से प्लास्टर की परतें झाड़ दी हैं। इसके अलावा, पास में ही छोटे-छोटे सात पिरामिड भी यहां मुझे (लेखक को) दिखे, जिनका उपयोग शाही परिवार के अन्य सदस्यों व प्रशासकों के दफन के लिए किया गया था।

फ़राओकालीन नहीं है कैरो शहर

पिरामिडों के बावजूद कैरो प्राचीन फ़राओकालीन शहर नहीं है। आज का कैरो 640 ईस्वी में अरब विजेताओं और इस्लामी धर्म के आगमन के बाद से विकसित हुआ। इजिप्टोलॉजिस्ट और पत्रकार जैक शेनकर बताते हैं, कि केवल दो प्रतिशत आबादी ही काहिरा के उन क्षेत्रों में रहती है, जो 1798 में नेपोलियन के आक्रमण के समय आबाद हुए थे। यह भी कि 640 ईस्वी में अरबों द्वारा मिस्र पर विजय प्राप्त करने से पहले, आधुनिक काहिरा के कुछ हिस्सों में रोमन किलेबंदी मौजूद थी।

मिस्र की कोई दस फीसद ईसाई आबादी कॉप्ट समुदाय की है। ईसाई धर्म, पहली शताब्दी में मिस्र पहुंचा था। अम्र इब्न अल-अस के नेतृत्व में एक अरब सेना ने 640 ईस्वी में अलेक्जेंड्रिया पर कब्जा कर लिया, और वहां इस्लाम धर्म की शुरुआत की। रोमन शासन के अंत के बाद यह इलाक़ा रशीदुन खिलाफत का हिस्सा बन गया, जिसने बाद में ने 641 मिस्र की राजधानी के रूप में फुस्तात (काहिरा) की स्थापना की, और वहां पहली मस्जिद बनाई। हालांकि, उस समय अलेक्जेंड्रिया, मिस्र की राजधानी थी। दरअसल, कैरो को मिस्र की वास्तविक राजधानी बनने में सदियां लग गईं।

अल-क़ाहिरा की स्थापना

876 से 879 ईस्वी के बीच अहमद इब्न तुलुन द्वारा निर्मित भव्य मस्जिद कैरो का सबसे पुराना कार्यरत इस्लामी स्मारक है। दसवीं शताब्दी तक, फातिमिड्स ने मिस्र के शासकों के रूप में अब्बासिड्स और तुलुनिड्स का स्थान ले लिया। फातिमियों ने 969 में अल-क़ाहिरा की स्थापना की, जो ‘काहिरा’ शब्द की उत्पत्ति है। सदियों तक, अल-क़ाहिरा फ़ुस्तात से एक अलग बस्ती बनी। बर्कले विश्वविद्यालय में आर्किटेक्ट और अर्बन प्लानिंग हिस्ट्री पढ़ानेवाले नेज़र अलसयाद का कहना है, कि उस दौर का कोई पुरातात्विक निशान नहीं बचा है।

अल अज़हर विश्वविद्यालय

अल अजहर काहिरा की सबसे पुरानी इमारतों में से एक है, जिसकी स्थापना 970 ईस्वी में फातिमिदों द्वारा की गई थी। अल अज़हर केवल मस्जिद नहीं है, फेज़ स्थित क़रावियिन विश्वविद्यालय के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय है, जो सुन्नी इस्लाम का वैचारिक मुख्यालय भी है। अल अजहर की कहानी मिस्र की बदलती धार्मिक संरचना पर चर्चा करने के लिए भी एक उपयुक्त उदाहरण है। प्रारंभिक अरब राजवंशों के विपरीत फातिमिद, शिया इस्लाम के अनुयायी थे। हालांकि, बारहवीं शताब्दी में सलादीन के शासनकाल के दौरान मिस्र की बहुसंख्यक आबादी, सुन्नी इस्लाम मानने लगी थी। लेखक टिम मैकिंटोश-स्मिथ बताते हैं, कि 1798 में जब फ्रांसीसी सेना अल अजहर पहुंची, तो नेपोलियन ने वहां के नेतृत्व को प्रभावित करने की कोशिश की। हालांकि, जब 1798 में फ्रांसीसी कर उगाही योजनाओं के विरोध में एक लोकप्रिय विद्रोह भड़क उठा, तो नेपोलियन ने अल अजहर परिसर में बमबारी कराई, कइयों को फांसी पर लटका दिया गया।

‘सिटाडेल’ किला और खान अल खलीली

आगरा क़िले से भी विशालकाय, ‘सिटाडेल’ काहिरा की रक्षा का मुख्य केंद्र रहा है। कुर्द अय्यूबिद राजवंश के संस्थापक और एक महान मुस्लिम सेनापति सलादीन ने धर्मयुद्ध के दौरान ‘सिटाडेल’ बोले जाने वाले विशाल क़िले को तुर्क वास्तुकला के आधार पर कराया था ।

सलादीन के बाद, अगले सात शताब्दियों तक मिस्र के कई शासकों ने इस क़िले में अपना दरबार लगाया। फिर 1250 में शजारा अल-दुर्र मिस्र में ममलुक राजवंश की संस्थापक थीं। मिस्र के सिंहासन पर बैठने वाली पहली मुस्लिम महिला। उन्होंने केवल 80 दिनों के लिए सुल्ताना का पद संभाला। उत्तराधिकार को लेकर क्लेश इतना बढ़ा, कि शगारत अल-दुर्र की हत्या कर दी गई। इस्लामी इतिहास में, दिल्ली की रजिया सुल्ताना (1236-1240) जैसी अन्य महिला शासक भी हुई हैं, जिन्हें राज्याभिषेक के समय खुत्बा पढ़ने की अनुमति नहीं थी।

1516-17 में ममलुकों से ओटोमन साम्राज्य ने सत्ता छीन ली। बहरहाल, काहिरा का सिएटल गढ़ मिस्र के अंतिम राजवंश की कहानी लिख गया, जिसकी पुनर्स्थापना उन्नीसवीं शताब्दी में मुहम्मद अली पाशा ने की। सिटाडेल में मुहम्मद अली पाशा द्वारा निर्मित एक भव्य मस्जिद है। यह मस्जिद उनके शासनकाल के अंतिम वर्षों में 1830 से 1848 के बीच बनाई गई थी। काहिरा या कैरो का प्राचीन बाज़ार ‘खान अल खलीली’ महत्वपूर्ण वैश्विक वाणिज्यिक केंद्र के रूप में अतीत का अवशेष है। यह बाजार ममलुक सुल्तानों के स्वर्णिम काल से संबंधित है, जिसके स्थापत्य यहां घूमने पर जगह-जगह दिखते हैं। मिस्र के राजनीतिक इतिहास को ठीक से देखा जाये, तो यह षड्यंत्र और हत्याओं से भरा पड़ा है। लेकिन, हम तो स्थापत्य देखने गए थे।

मुस्लिम मुल्क में मंदिर और सूर्य पूजा

मिस्र का एक प्राचीन शहर है लुक्सर, जिसे ‘दुनिया का सबसे बड़ा खुला संग्रहालय’ कहा जाता है। यहां नील नदी के पूर्वी तट पर लुक्सर मंदिर और कणार्क मंदिर, फिरौन के अंतिम संस्कार और उनकी देवताओं की पूजा के लिए बने थे। यहां गौरव बिखेरते दिखेंगे किंग रामसेस द्वितीय का ‘रामेसियम मंदिर’ और ‘हात्सेपसुत का मंदिर’। कोणार्क का सूर्य मंदिर यदि भारत में है, तो कणार्क का सूर्य मंदिर मिस्र के लुक्सर में भी है। सूर्य की विधिवत पूजा, उसके वास्ते बना कुंड प्राचीन मिस्र की मान्यताओं को दर्शाते हैं। मिस्र के चंद्र देवता खोंसू, सूर्य देवता रा (या अमुन-रा), मातृ देवी ‘आइसिस’, ‘मुत्त’ और ‘हथोर’, तथा श्वान देवता ‘अनुबिस’, इनकी पूजा होती थी। सर्प सुरक्षा का सिम्बल बन मुकुटों, पवित्र स्थलों, मुख्य द्वार पर उकेरे दीखते हैं। मगर एक सवाल है, कि इस्लामी देश मिस्र ने मूर्ति पूजा के प्रतीक अवशेषों के सुरक्षित कैसे रहने दिया? आज के ‘लुक्सर’ को प्राचीन मिस्र में ‘थेब्स’ कहा जाता था। लुक्सर शहर के बाहर नील नदी को पार कीजिये, कोई 15 किलोमीटर के बाद थेबन की विहंगम पहाड़ियों पर दुनिया की सबसे बड़ी कब्रगाह आप देख पाएंगे। ‘किंग्स और क्वींस वैली’ में ईसा पूर्व 16वीं से 11वीं शताब्दी के आसपास फिरौन काल का विराट कब्रिस्तान । माना जाता है कि इसका उपयोग लगभग 500 वर्षों तक किया गया था, और यह उस कालखंड के राजवंशों का विश्राम स्थल है। 1979 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया, और यह आज भी विश्व के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है। मेरे लिए मिशन ही था किंग्स वैली को देखना, जहां ममी में लिपटे तूतनखामन अब भी विराजमान हैं। एक किंग, जो जीवन के केवल 19 वसंत देख पाया, लेकिन पूरी दुनिया का सर्वाधिक बहुचर्चित सम्राट बन गया। तूतनखामन के मकबरे की खोज नवंबर 1922 में ब्रिटिश पुरातत्वविद् हॉवर्ड कार्टर ने की थी, जिन्होंने यहां की वीरान पहाड़ियों में सालों-साल बिताए थे। बाक़ी राजाओं के बरक्स तूतनखामन का कक्ष काफ़ी छोटा है। 14 गुणा 24 फीट समझ लीजिये। तूतनखामन का कक्ष, कब्र चोरों से महफूज़ रह गया था। वहां 5,000 से ज़्यादा कलाकृतियां मिलीं, उसमें मशहूर स्वर्ण मास्क, सोने का ताबूत, रथ, फर्नीचर, गहने और रोज़मर्रा की चीज़ें शामिल हैं। अब ये सभी आर्टीफैक्ट्स, आभूषण पहली बार नए ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम में डिस्प्ले के लिए एक साथ रखी गई हैं।

एक गधे ने खोजी अलेक्ज़ेंड्रिया में प्राचीन कब्र

नील नदी डेल्टा के पश्चिमी छोर पर स्थित अलेक्जेंड्रिया को प्राचीन विश्व का सबसे बड़ा पुस्तकालय होने का गौरव हासिल है, जिसमें लगभग 5 लाख पुस्तकें थीं। यहां रहने वाले शीर्ष विचारकों में ज्यामितिज्ञ और संख्या-सिद्धांतकार यूक्लिड, आर्किमिडीज, दार्शनिक प्लॉटिनस ,भूगोलवेत्ता टॉलेमी और एराटोस्थनीज शामिल थे। अलेक्जेंड्रिया कभी विश्व का सबसे बड़ा शहर था, और कुछ शताब्दियों तक रोम के बाद दूसरे स्थान पर रहा। अलेक्जेंड्रिया का तट, मुंबई के मेरिन ड्राइव वाली फील देता है। मिस्र के विदेशी व्यापार का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अलेक्जेंड्रिया के दो बंदरगाहों, अलेक्जेंड्रिया और उसके पास के अल-दुखैलाह से होकर गुजरता है। क्लियोपेट्रा की यादों को समेटे हुए अलेक्जेंड्रिया एक समृद्ध ग्रीको-रोमन शहर था, जिसकी स्थापना मैसेडोनियन शासक सिकंदर महान ने 331 में की थी। यह बड़ी संख्या में यहूदियों और यूनानियों का घर था। टॉलेमी शासकों ने अनेक महल बनवाए। यहां ‘कोम एल शोकाफा’ जैसे ज़मींदोज़ विरासत का पता एक गधे की वजह से चला। जो वहां से गुज़रते हुए, एक गड्ढे में गिर पड़ा। उसे निकालने के क्रम में सुरंग-दर-सुरंग दिखती गयी, और अंत में 500 कब्रों और कलाकृतियों से समृद्ध खज़ाना मिला। अलेक्जेंड्रिया की ‘कोम एल शोकाफा’ सुरंग में उस दिव्य सर्प की आकृति उकेरी दिखी, जो मिस्र- ग्रीको-रोमन मान्यताओं के मेल को दर्शाता है, कि सर्प केवल पाताल लोक का रक्षक नहीं, जीवन, मृत्यु और उपचार का प्रतीक भी है। एस्क्लेपियस और सांपों के बीच रिश्ते की शुरुआत के बारे में कई कहानियां हैं। एक कहानी में, एस्क्लेपियस ने एक सांप को मार दिया और देखा कि थोड़ी देर बाद दूसरा सांप आया, और पहले वाले सांप को जड़ी-बूटियां खिलाकर उसे ज़िंदा कर दिया। फिर एस्क्लेपियस ने उन्हीं औषधीय जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करके एक मरे हुए आदमी को ज़िंदा किया। कभी प्राचीन डॉक्टरों को ‘एस्क्लेपियस’ के नाम से जाना जाता था। प्राचीन मिस्र की कब्रों में सर्पाकृतियों की उपस्थिति जीवन को दोबारा से प्राप्त किये जाने वाले भाव को दरपेश करती है !

                       -लेखक विदेशी मामलों के जानकार हैं।

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