हिन्दुस्तानी सिनेमा में बड़े-बड़े गायक आए, अपनी छाप छोड़ गए। मगर कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो सिर्फ गीत नहीं रहतीं, वो हमारी यादों का हिस्सा बन जाती हैं। लता जी ऐसी ही आवाज़ थीं, हैं और रहेंगी। इश्क़ हो, जुदाई हो, खुशी हो, इबादत हो, वतन से मुहब्बत हो - लता जी की आवाज़ हर जज़्बात के लिए उपयुक्त थी। वहीं उनका स्वर हर हीरोइन पर फिट बैठता था।
लता मंगेशकर के बारे में लिखते हुए सिर्फ ‘भारत कोकिला’ कह देना काफी नहीं है। यह उनकी हस्ती को एक लफ्ज़ में बंद करने जैसा है। उनकी असल अज़मत को समझना है तो उनकी आवाज़ की बारीकियों में जाना होगा - सुर की पाकीज़गी, लफ्ज़ों की अदायगी, सांस पर काबू, और हर किरदार के हिसाब से आवाज़ को बदल देने का हुनर।
हिन्दुस्तानी सिनेमा में बड़े-बड़े गायक आए, अपनी छाप छोड़ गए। मगर कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो सिर्फ गीत नहीं रहतीं, वो हमारी यादों का हिस्सा बन जाती हैं। लता जी ऐसी ही आवाज़ थीं, हैं और रहेंगी। उनको सुनना सिर्फ एक गाना सुनना नहीं था, वो अपने ही दिल के किसी कोने से मिलने जैसा था, जिसे हम लफ्ज़ों में कह नहीं पाते थे। इश्क़ हो, जुदाई हो, खुशी हो, इबादत हो, वतन से मुहब्बत हो - लता जी की आवाज़ हर जज़्बात के लिए पहले से मौजूद एक ज़ुबान थी।
किस्सा मशहूर है कि शुरू में नौशाद साहब जैसे बड़े संगीतकार ने कह दिया था कि इस लड़की की आवाज़ बहुत पतली है। उस वक़्त किसी ने नहीं सोचा था कि यही पतली, कमज़ोर समझी जाने वाली आवाज़ एक दिन पूरे फिल्म संगीत की तस्वीर ही बदल देगी।
नाज़ुक आवाज़ का जादू
उस ज़माने में फिल्मों में भारी, गूंजदार आवाज़ को पसंद किया जाता था। इसलिए जब लता जी की हल्की, नर्म और साफ़-शुफ्फ़ाफ आवाज़ आई तो कई लोग उसे पहचान नहीं पाए। मशहूर गायिका शुभा मुद्गल कहती हैं कि लता जी की आवाज़ हवा जैसी हल्की और मीठी थी, लेकिन जैसे ही वह माइक के सामने आती थी, वह पूरी ताकत और अपनी पहचान के साथ सुरों को बिल्कुल सही जगह पर लगाती थीं। यह कुदरत और रियाज़ का संगम था। उनकी गायकी में सबसे पहली बात जो दिल को छूती है, वह है सफाई, कोई फालतू वज़न नहीं, लफ्ज़ साफ़, सुर सच्चे। वह सीधे दिल में उतर जाती है।
एक बहुत अहम बात - सांस पर काबू। लता जी ने उस्ताद अनिल बिस्वास से सीखा था कि गीत में सांस कहां लेनी है और कहां छोड़नी है, इस तरह कि सुनने वाले को पता ही न चले कि गायिका ने सांस ली है। पार्श्व गायक को एक साथ तीन काम करने होते हैं - सुर को संभालना, लफ्ज़ को बचाना और जज़्बात को निभाना। लता जी ये तीनों काम आसानी से करती थीं।
लफ्ज़ की इज्ज़त
गुलाम हैदर साहब ने उन्हें सिखाया था कि गाने से पहले बोल का मतलब समझो। हेमंत कुमार ने गद्य को गाना सिखाया, तो मदन मोहन ने लफ्ज़ों में कई रंग भरना। इसीलिए लता जी जब गाती थीं तो लफ्ज़ सिर्फ लफ्ज़ नहीं रहते थे। ‘प्यार किया तो डरना क्या’ में वही आवाज़ एक चुनौती, एक बगावत बन जाती है। ऊंचे सुर पर जाकर भी वह लड़खड़ाती नहीं। वहां इश्क़ में हिम्मत है। फिर ‘अजीब दास्तां है ये’ में वही आवाज़ एक खोई हुई याद, एक मीठा सा शिकवा बन जाती है। ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ में उनकी आवाज़ में खुले आसमान की आज़ादी है। वहीं ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ में वही आवाज़ पूरे मुल्क के आंसू की आवाज़ बन जाती है।
हर नायिका की आवाज़
पार्श्व गायन का सबसे मुश्किल काम है खुद गायब होकर दूसरे में बस जाना। लता जी इसमें बेजोड़ थीं। उनकी आवाज़ मधुबाला पर अलग लगती थी, मीना कुमारी पर अलग, वहीदा रहमान पर अलग और रेखा पर अलग। लगता था जैसे वही हीरोइन गा रही है। इसलिए वह किसी एक हीरोइन की आवाज़ नहीं बनीं, वह हिन्दुस्तानी सिनेमा की महिला की आवाज़ बन गईं। उनका गीत ‘आएगा आने वाला’ इसका सबसे बड़ा सबूत है। फिल्म ‘महल’ में मधुबाला पर्दे पर हैं, पर माहौल लता जी की आवाज़ बना रही है। आवाज़ धीरे-धीरे अंधेरे से आती है, जैसे कोई राज़ हो। यह बताया कि आवाज़ भी तस्वीर बन सकती है।
इबादत, ग़ज़ल और लोक
लता जी ने शास्त्रीय संगीत को मुश्किल नहीं बनने दिया। उनके कई गीत रागों पर थे, पर आम सुनने वाले को वह बोझ नहीं लगे। शास्त्र गीत में घुल गया। ‘अल्लाह तेरो नाम’ में उनकी आवाज़ मज़हब से ऊपर उठकर एक सच्ची दुआ बन जाती है। ग़ज़ल में भी, खासकर मदन मोहन के साथ, उन्होंने लफ्ज़ की नज़ाकत और ठहराव को नया मर्तबा दिया। दरअसल, लता जी की महानता सिर्फ कुदरती देन नहीं, रोज़ के रियाज़ का नतीजा थी। आज उनकी आवाज़ रेडियो से निकलकर हमारे घरों, शादी, त्योहार और गम-खुशी का हिस्सा बन चुकी है। लता जी जब मुहब्बत गाती हैं तो लगता है मुहब्बत सच में है। जब वह दुआ गाती हैं तो लगता है किसी ने हमारे लिए भी दुआ की है। जब वह गाती हैं ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ तो लगता है कि मुश्किल के बाद भी जिंदगी में लौटने की उम्मीद बाकी है।

