तिनका-तिनका मुहिम से जेलों में बड़े बदलाव
कानून की व्यवस्था और उसे तोड़ने के बीच में जो महीन रेखा होती है, देश-काल-परिस्थिति और आवेश में वह कब टूट जाती है, कहना कठिन है। कानून-कचहरी और अंधेरी जेल का त्रास। कुछ दबंगों और धनाढ्यों की साजिशों का शिकार...
कानून की व्यवस्था और उसे तोड़ने के बीच में जो महीन रेखा होती है, देश-काल-परिस्थिति और आवेश में वह कब टूट जाती है, कहना कठिन है। कानून-कचहरी और अंधेरी जेल का त्रास। कुछ दबंगों और धनाढ्यों की साजिशों का शिकार बनते हैं। लेकिन हर कैदी में सुप्त-जाग्रत संवेदनाओं का स्रोत होता है। बंदियों के जीवन के उज्ज्वल व रचनात्मक पक्ष को उकेरने की मुहिम की अग्रदूत हैं वर्तिका नंदा। उनके ऋषिकर्म पर एक नजर।
भारतीय समाज में एक सभ्य व्यक्ति जिस जेल को देखने जाने से भी कतराता है, वहां के बंदियों का जीवन सुधारने की पहल एक स्त्री करे,तो निश्चय ही अचरज होता है। पंजाब-हरियाणा से अपनी सृजन यात्रा की शुरुआत करके देश की राजधानी को अपनी कर्मस्थली बनाकर ’अपराध की पत्रकारिता’ का नया मुहावरा गढ़ने वाली वर्तिका नंदा ने जेल में बंदियों के जीवन में भी रेडियो पत्रकारिता का अभिनव प्रयोग किया है। उनके द्वारा तिहाड़ जेल से शुरू हुई कोशिश ‘जेल का रेडियो’ के जरिये कैदियों के जीवन में इंद्रधनुषी छटा बिखेरने की मुहिम, आज हरियाणा की दो तिहाई जेलों, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश तक जा पहुंची है। कैदियों की शिक्षा और उनकी रचनात्मक प्रतिभा उकेरने में इस बड़ी बदलावकारी भूमिका रही है।
हमारे परिवेश व सामाजिक वातावरण का कितना गहरा व नकारात्मक असर बालमन पर पड़ता है, वर्तिका नंदा जैसी संवेदनशील साहित्य की रचनाकार का अपराध की पत्रकारिता की ओर उन्मुख होना उसकी बानगी है। पंजाब के काले दौर ने उसके अंतर्मन को गहरे तक उद्वेलित किया। एक बार वह स्कूल की पढ़ाई के दौरान जालंधर दूरदर्शन से कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग करके घर लौट रही थी कि निर्धारित ट्रेन छूट गई। फिर साढ़े चार बजे की ट्रेन से पठानकोट लौट रही वर्तिका जब अपनी मां के साथ टांडा स्टेशन के समीप पहुंची तो ट्रेन अचानक धीमी हुई। तभी शोर मचा तो पता चला कि रास्ते में आतंकवादियों द्वारा एक बस को रोककर एक संप्रदाय विशेष के लोगों को उतारा गया है। फिर लगातार गोलियों की आवाजें सुनायी दीं। पता चला कि उन बस यात्रियों को आतंकवादियों ने मार दिया था। इस घटना से उसे आतंकित कर दिया। उन दिनों वह अपने कैरियर और शौक पर ध्यान दे रही थी, लेकिन सुलगते माहौल ने जीवन के संकट का प्रश्न पैदा कर दिया। तब गहरा डर व खौफ का वातावरण था। हर रोज भयावह वारदातें सुनने को मिलती। हर दिन ऐसे लगता कि आज दुनिया में आखिरी ही दिन है।
फिर रेलवे इंजीनियर पिता के अंबाला तबादला होने के बाद वर्तिका ने जनसंचार संस्थान दिल्ली में प्रवेश परीक्षा में भाग लिया और टॉप किया। इसी दौरान दैनिक ट्रिब्यून द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में वर्तिका ने प्रथम पुरस्कार जीता। यह तय हुआ कि उसका भाग्य अब पत्रकारिता में निर्धारित होगा। लेकिन इसी दौरान अवचेतन में पंजाब की हिंसा के जख्म और महानगरों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों ने अंतर्मन को गहरे तक झिंझोड़ा। कालांतर इस भय को किनारे करके वर्तिका ने हिंसा की डार्क साइड का सच तलाशना चाहा। आखिरकार अपराध की पत्रकारिता को अपना मुख्य विषय बनाने का फैसला कर लिया।
सितारों भरे आसमान की तलाश
अंबाला से निकलकर जीवन में बड़ा बदलावा आया। वहां बड़े घर के सामने सितारों भरे आसमान में अपने सितारों को तलाशती थी। दिल्ली में आकर इन सितारों की तलाश शुरू हुई। बदलते हालात ने ख्यालों को बहुत बदला। लेकिन सोचा था कि कुछ ऐसा जरूर करूंगी, जो किसी के काम आ सकूं। ईमानदारी की पत्रकारिता करूंगी। यह भी कि आर्थिक दबाव विचलित न कर सकें। कदम न डगमगा सकें। जीटीवी, एनडीटीवी व लोकसभा टीवी से शुरू हुई यात्रा निरंतर आगे बढ़ती गई। इस दौरान अपराधियों को देखा। फिर अध्यापन का मन हुआ और जनसंचार संस्थान में सहायक प्रोफेसर हुई। यह सुखद ही था कि जहां पढ़ी थी वहीं पढ़ाने का अवसर मिला।
दरअसल, उन्होंने उन अंधेरे कोनों में रोशनी की संभावना को तलाशने का प्रयास किया जहां कोई ध्यान नहीं देता। विडंबना यह भी है कि मीडिया में भी सुर्खियों के सरताज बनने की होड़ में अपराध पीड़ितों के प्रति संवेदनशील व्यवहार नहीं किया जाता। प्रिंट मीडिया में बाइलाइन और इलेक्ट्रानिक मीडिया में टीआरपी की चाह पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने से गुरेज नहीं करती। वर्तिका का मानना रहा है कि पीड़ितों की रिपोर्टिंग में बेहद संवेदनशीलता की जरूरत होती है। तिनका-तिनका जोड़कर बनाए घोसले के बिखरने की टीस उसे बनाने वाला ही जान सकता है।
तिनका-तिनका जोड़ने की मुहिम
समय के साथ ऐसी सोच बन गई है कि जहां आर्थिक लाभ न हो, उन क्षेत्रों को अछूता छोड़ दिया जाए। यह भी कि हमें इससे क्या मिलेगा। निस्वार्थ भाव से चलाए जाने वाले अभियानों में कम ही लोग जुड़ते हैं। मेरे परिवार के संस्कार मिले कि पैसा जीवन की प्राथमिकता न हो। वो काम करो जो दूसरों के काम आए। किसी भी काम को करने में हमारी मानसिक संतुष्टि जरूरी है।
महिला अपराधों पर संवेदनहीनता
यह बात हमेशा अखरती रही है कि अपराध की शिकार हुई महिलाओं को लेकर मीडिया में अपेक्षित संवेदनशीलता नजर नहीं आती। यही वजह है कि वर्तिका ने ‘बलात्कार पीड़ित महिलाओं पर मीडिया रिपोर्टिंग’ विषय पर पीएचडी पूरी की। उन्हें यह बात परेशान करती है कि मीडिया में सुर्खियां ऐसे विषयों को बनाया जाता है कि जो सनसनी बना सकें। मसाले को तरजीह दी जाती है। ऐसी खबरें जो अपवाद हो सकता है लेकिन पूरे समाज का सच नहीं होता। बहरहाल, इन सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में वर्तिका को अपने उपन्यास को मूर्त रूप देने में तीन दशक से अधिक समय लग गया। जिसकी विषय वस्तु जेल में महिलाओं की जेल की परिस्थितियां हैं, जिसमें समय का यथार्थ है,लेकिन कल्पना की गुंजाइश कम है। बहरहाल, एक पत्रकार, एक शिक्षक व एक जेल सुधारक के रूप में सोच बदलने की उनकी मुहिम निरंतर जारी है। उनका मानना है कि जीवन के संकट व विषम परिस्थितियां हमें न केवल मजबूत बनाती हैं बल्कि जीवन को देखने का नया नजरिया भी देती हैं।
जेल सुधारों की पहल
निश्चित रूप से दुनिया के सभ्य समाजों में जब पहली जेल बनी होगी तो उसका मकसद समाज में भटके लोगों के जीवन में सुधार ही रहा होगा। जन्म से कोई व्यक्ति अपराधी नहीं होता। हालात व तात्कालिक प्रतिक्रिया ही व्यक्ति को कानून व अपराध की झीनी लाइन तोड़ने को बाध्य करती है। इन कैदियों के जीवन में इंद्रधनुषी रंग भरने के लिये वर्तिका ने तिनका-तिनका मुहिम दिल्ली की तिहाड़ जेल से शुरू की। जेलों में सजा काट रहे कैदियों को शिक्षा से जोड़ने और उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिये शुरू किये गए ‘जेल का रेडियो’ अभियान को सकारात्मक प्रतिसाद मिला। खासकर कोरोना संकट में जब कैदियों के परिजन भी उनसे मिलने जेल नहीं आते थे, तो जेल का रेडियो कैदियों को पूरी दुनिया से जोड़े रखता था। कोरोना काल में इस रेडियो की भूमिका को तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने ट्वीट करके सुर्खियों में ला दिया था।
वर्तिका के प्रयासों की स्वीकार्यता ही है कि वर्ष 2018 में जस्टिस एमबी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बैंच ने जेलों में महिलाओं और बच्चों की स्थिति की आकलन प्रक्रिया में उन्हें शामिल किया। वर्ष 2020 में आईसीएसएसआर के लिये भारतीय जेलों में संचार की जरूरतों के लिये किए गए उनके शोध को उत्कृष्ट माना गया। कालांतर उल्लेखनीय है कि भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें ‘स्त्री शक्ति सम्मान’ से विभूषित किया।
तिनका-तिनका मुहिम
जेल की अंधेरी कोठरियों में निराशा का जीवन जीने वाले बंदियों के जीवन में उजाला भरने की मुहिम में जेल में रेडियो एक अनूठी मुहिम साबित हुई। वर्तिका के प्रयासों से वर्ष 2019 में आगरा जेल व 2021 में तिनका जेल रेडियो की शुरुआत हुई। बंदियों को रेडियो की ट्रेनिंग दी गई और अब वे खुद इसे संचालित करते हैं। साथ ही तिनका-तिनका इंडिया अवार्ड्स और तिनका बंदिनी अवार्ड्स की शुरुआत की गई। ये पुरस्कार मानवाधिकार दिवस और महिला दिवस पर सृजन कर रहे बंदियों को दिए जाते हैं। आज ये बंदी कविता से लेकर पेंटिंग्स तक में अपना हुनर दिखा रहे हैं। वे खासे उत्साहित महसूस कर रहे हैं। हरियाणा में करीब बीस जेलें हैं। बारह जेलों में ‘जेल का रेडियो’ आ चुका है। हिसार में आने वाला है। जेल में इसे पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग के रूप में प्रसारित किया जाता है। उसके जरिये बंदियों को पढ़ाया जाता है। बंदी ही इसे चलाते हैं। इससे जहां कैदियों के ज्ञान में वृद्धि होती है, वहीं शिक्षा अभियान को भी गति देने में मदद मिलती है। बंदियों में अनुशासन आता है, वहीं उनकी उदासी दूर होती है।
जेल में अनूठे अनुभव
डासना जेल में गंभीर अपराधों में अभियुक्त चर्चित लोग किस रूप में बंदियों की सेवा कर रहे हैं ये मीडिया में चर्चा में रहा। एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति किस रूप में जेल के जीवन को स्वीकार करता है यह तथ्य सामने आया है। आरुषि कांड के आरोपी डॉ. राजेश व नुपूर की रचनात्मकता यहां मुखरित नजर आयी। वहीं बहुचर्चित अभियुक्त सुरेंद्र कोली के रोचक अनुभव भी सामने आये। वहीं मध्यप्रदेश की एक जेल में जन्मी अमीना एक चित्र में अपना घर बनाती है। वह जेल में पैदा हुई है तो उसने घर के रूप में अपने बैरक का चित्र बनाया था।
अंधेरी दुनिया में सोनिया की चमक
सोनिया- हरियाणा की ऐसी महिला बंदी है, जिसे हरियाणा की करीब हर जेल में रखा गया। उसकी सार्वजनिक छवि यह है कि उसका नाम एक बड़ी वारदात से जुड़ा है। वह बहुत आक्रामक व गुस्सैल है। लेकिन हकीकत में वह एक बेहतरीन पेंटर है, लेखिका व कवि तथा ब्राडकॉस्टर है। वह कल्पनाशील सृजनकार है। उसने बेहतरीन कलाकृतियों को रचा है। लेकिन जेल रेडियो की मुहिम को सरकार का सकारात्मक प्रतिसाद मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया। नेशनल बुक ट्रस्ट ने जब जेलों के जीवन पर महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित की तो राज्य सरकार की तरफ से एक भी पुस्तक की खरीद नहीं हुई। वास्तव में अच्छी पुस्तकों से बनी लाइब्रेरी बंदियों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है। बंदियों के जीवन की टीस पर केंद्रित सौ कविताओं का एक संकलन तैयार है लेकिन उसे प्रकाशित करने वाला कोई प्रकाशक नहीं है। ऐसे में फिक्र होती है कि कहीं जेल का यह अनूठा साहित्य कहीं खो न जाए। जबकि ये कविताएं बंदियों के मनोविज्ञान को समझने में खासी मददगार हो सकती हैं।
तिनका-तिनका फाउंडेशन
इस अनूठी पुस्तक शृंखला में जेल के जीवन में बंदियों के जीवन व उनकी रचनात्मकता से जुड़े विभिन्न पक्षों को उजागर करती हैं ये अनूठी किताबें। तिनका-तिनका तिहाड़ से शुरू हुई यह मुहिम तिनका-तिनका डासना और तिनका-तिनका मध्यप्रदेश तक पहुंचती है। इस प्रयास ने केवल जेल साहित्य को ही समृद्ध नहीं किया बल्कि बंदियों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाने में कामयाबी पायी। दरअसल, इस मुहिम का मकसद जेलों और समाज के बीच पुल बनाना है। साथ ही बंदियों को कला और साहित्य से जोड़कर समाज में अच्छे व्यक्ति के रूप में लौटाना भी है। यही वजह है कि इस मुहिम की स्वीकार्यता को देखते हुए इसे दो बार लिम्का बुक रिकॉर्ड में शामिल किया गया।
मेंटल हेल्थ में सुधार
दरअसल, जेल रेडियो और तिनका-तिनका मुहिम में रचनात्मक अभियानों से कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। सोनीपत की जेल में बाइस साल के बंदी अब मास्टर जी के नाम से चर्चित हैं क्योंकि वे बंदियों को कक्षाओं में आने और पढ़ने के लिये प्रेरित करते हैं। रेडियो के जरिये जारी इस मुहिम की सफलता यह है कि कक्षाओं में प्रतिभागियों की संख्या बढ़ी है। पानीपत जेल में 2023 में बनी एक डॉक्यूमेंट्री बताती है कि रेडियो अभियान के बाद पूरे साल में एक भी बंदी का मेंटल हेल्थ से जुड़ा मामला प्रकाश में नहीं आया। बल्कि बंदियों की रचनात्मक गतिविधि बढ़ी है। तिनका-तिनका मुहिम के जरिये आयोजित वर्कशापों में महिला बंदियों के हितों पर लगातार विमर्श होता रहता है। आमतौर पर लगता है कि जेल के भीतर महिला व पुरुष बंदियों के साथ समान व्यवहार किया जाता है। लेकिन हकीकत ठीक इसके विपरीत है। पुरुषों के लिये बंदिशें हैं तो महिलाओं के लिये अतिरेक बंदिशें भी हैं।
एशिया की सबसे छोटी एंकर
जालंधर के केंद्रीय विद्यालय में पढ़ने के दौरान बच्चों के लिये कार्यक्रम में भाग लेने दूरदर्शन जाने का अवसर मिला। बच्चों को प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया जाता तो वर्तिका ने कविता पढ़ी। दूसरी बार गए तो संयोग से एंकर नहीं आयी। प्रोड्यूसर वर्तिका की अभिव्यक्ति की प्रतिभा को भांप चुकी थी, तो बोली -एंकरिंग कीजिए। दूरदर्शन के डीजी ने कहा- ये लड़की बहुत छोटी है, इतनी छोटी बच्ची को एंकर बनाना दूरदर्शन पालिसी के एगेंस्ट है। लेकिन परिस्थिति के चलते अनुमति दे दी। वर्तिका के सामने बड़ा चैलेंज था। लेकिन उसके सपने का साकार होने का समय भी था। टेलीप्रॉम्प्टर की सुविधा नहीं थी। संवाद लिखना और संचालन करना। कार्यक्रम 26 मिनट का था, 21 मिनट में खत्म हुआ। प्रोड्यूसर ने कहा- कुछ और बोलिए कुछ याद करके तो बहुत सारी कविताएं सुना दी। इस तरह उस समय देश ही नहीं, एशिया की सबसे छोटी एंकर बनकर पंजाब में पहचान बनी। फिर यह क्रम बना। पठानकोट से सुबह साढ़े चार बजे की ट्रेन से साढ़े नौ बजे का कार्यक्रम देने जालंधर आती थी।

