अभिनेता अनिल कपूर में सीखने की ललक और फिटनेस आज भी युवा कलाकारों के जैसी मानी जाती है। करीब 70 वर्ष के होने के बावजूद फिल्मों और वेब सीरीज में सक्रिय हैं। आजकल वे ‘अल्फा’, ‘किंग’ और ‘चीफ’ जैसी कई फिल्मों में व्यस्त हैं। अनिल कपूर ने अपने लंबे कैरियर में लगभग 200 फिल्मों में विविधतापूर्ण रोल निभाए। कई दिग्गज अभिनेताओं के साथ काम किया। दर्शकों के बीच उन्हें भरोसेमंद अभिनेता माना जाता है।
एक दौर था जब उम्रदराज़ होने के बावजूद अभिनेता अनिल कपूर की जबरदस्त एक्टिंग पॉवर के साथ ही उनकी फिटनेस की भी खूब तारीफ होती थी। अब 70 के करीब पहुंच चुके अनिल कपूर अपनी उस इमेज को बनाए रखने की भरपूर कोशिश करते हैं। लेकिन जब वह कुछ एजेंडाधारी निर्देशकों के संपर्क में आए, दर्शक उनसे कन्नी काटने लगे। मगर दो-तीन साल से वह काफी सतर्क हैं। उनकी ताजा गतिविधियों के संदर्भ में एक विश्लेषण-
ताजा सक्रियता
वह इन दिनों ‘अल्फा’, ‘किंग’ और रघुवीर राठौड़ की तेलुगु फिल्म ‘चीफ’ जैसी बड़ी फिल्मों को लेकर व्यस्त हैं। इनमें से सभी फिल्में उनके लिए काफी अहम हैं, क्योंकि इनमें उनका किरदार काफी अहम है। ‘किंग’ में वह शाहरुख के साथ सेंट्रल कैरेक्टर कर रहे हैं, वहीं ‘अल्फा’ में वह फिर एक बार आर्मी ऑफिसर के पावरफुल रोल में दिखाई पड़ेंगे। रघुवीर राठौड़ की ‘चीफ’ में भी उनका सेंट्रल करेक्टर है। वह इन दिनों चार-पांच फिल्मों में छोटे-बड़े रोल कर रहे हैं। दूसरी ओर पिछले कुछ साल से उन्होंने वेब सीरीज में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। ‘द नाइट मैनेजर’, ‘फैमिली गाय’, ‘बिग बॉस ओटीटी’ के अलावा जल्द ही वह नेटफ्लिक्स की ‘फैमिली बिजनेस’ में दिखाई पड़ेंगे। वह कहते हैं, ‘वेब सीरीज का अपना अलग कॉन्सेप्ट होता है। अब तो मैंने यहां के स्टाइल ऑफ मेकिंग को एंजॉय करना सीख
लिया है।’
दिग्गज एक्टर्स का साथ
दिलीप कुमार से लेकर रजनीकांत, अमिताभ बच्चन सहित धर्मेंद्र तक सारे दिग्गज एक्टर्स के साथ उनकी मौजूदगी हमेशा गौरतलब रही। वह हंसकर कहते हैं, ‘मुझे नसीर साहब, नाना पाटेकर, परेश रावल जैसे धाकड़ एक्टर के साथ काम करके मैं बहुत कुछ सीखता हूं। इन दिग्गजों के साथ काम करके बहुत कुछ सीखा जा सकता है। मुझे ऐसा लगता है कि मैं अब भी बहुत यंग एक्टर हूं।’ मगर नए दौर के कलाकारों की बात आती है, तो वह बताते हैं, ‘नए हों या पुराने, हर अभिनेता की अपनी एक जुदा स्टाइल होती है। हालांकि किसी एक अभिनेता का अभिनय मुझे प्रेरित कर सकता है।’
सही मायने में मिस्टर हीरो
बात संभवतः 87-88 की है। कोलकाता से प्रकाशित होने वाली आनंद बाजार पत्रिका के हिंदी प्रकाशन ‘रविवार’ ने अभिनेता अनिल कपूर पर एक कवर स्टोरी ‘मिस्टर हीरो’ शीर्षक से छापी थी। तब संपादक ने हिदायत दी, ‘अनिल कपूर की तस्वीर के साथ सिर्फ ‘मिस्टर हीरो’ शीर्षक जाएगा।’ वाकई 50 साल के लगभग होने को आए, इन वर्षों में अनिल कपूर इंडस्ट्री के सबसे ज्यादा भरोसेमंद कलाकारों में से एक साबित हुए हैं। लेखक-निर्देशक अनीस बज्मी बताते हैं, ‘कुछ नया सीखने की उनकी ललक जबरदस्त है। उनके दीर्घकालीन एक्टिंग कैरियर का मूलमंत्र यही रहा है।’
रोमांटिक रोल का क्रेज
तथ्य यह है कि फिल्में करने के मामले में उन्होंने कोई संकोच नहीं किया है। करीब 200 फिल्में करने के बाद भी उनकी चुस्ती-फुर्ती में कोई कमी नहीं आई है। जबकि रोमांटिक भूमिका से परहेज की बात को वह सिरे से खारिज कर देते हैं, मैं मानता हूं कि बढ़ती उम्र के चलते ठुमके लगाना मुझे पसंद नहीं है। मुझे लगता है, नए दौर के हीरो के लिए यह छोड़ देना चाहिए।’
हर फिल्म के साथ आगे बढ़ते रहे
उनके अभिनय जीवन की शुरुआत ‘हमारे तुम्हारे’, ‘एक बार कहो’ और ‘शक्ति’ की बहुत छोटी भूमिकाओं से हुई। नायक के तौर पर उनकी पहली फिल्म एम.एस. सथ्यू की ‘कहां कहां से गुजर गया’ और मणि रत्नम की ‘पल्लवी अनु पल्लवी’ शायद किसी को याद नहीं। वे परदे पर अच्छे लगते थे, अभिनेता के तौर पर संभावनाएं थीं और अपने समकालीन नायकों के विपरीत उनकी मूंछें थीं। फिर भी परदे के सामने उनकी चमक अलग होती थी और उनकी संवाद अदायगी ने अपनी एक अलग पहचान बनाई। सीधे-सादे नायक के तौर पर वह ‘वो सात दिन’, ‘ईश्वर’ आदि में छाए रहे। वहीं वे 80 के दशक के गुस्सैल युवा थे, जो ‘मशाल’ और ‘तेजाब’ में उभरकर आता है। इसी बीच वे कभी ‘मेरी जंग’ के तेज वकील बने तो कभी ‘जांबाज’ के आवारा लड़के और कभी ‘युद्ध’ में टपोरी अंदाज में ‘झक्कास’ बोलते नजर आए। उनके एक निर्देशक डेविड धवन कहते हैं, ‘असल में अनिल हमेशा कुछ अलग टाइप की फिल्में करना चाहता है। वह शुरू से ही अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहता था। ’ लेकिन उनका यह अंदाज ही बड़े निर्देशकों को लुभा गया। सिर्फ घई की फिल्मों में ही नहीं, फिल्मकार यश चोपड़ा और उनके बीच का तालमेल ‘मशाल’, ‘विजय’ और ‘लम्हे’ में उभरकर सामने आता है। ‘लम्हें’ के उनके किरदार में हर वह बात थी, जो एक सशक्त किरदार में होनी चाहिए। दरअसल ‘मेरी जंग’, ‘राम लखन’ और ‘ताल’ में अनिल के किरदार में एक अलग बात नजर आई। अपनी पिछली दो फिल्मों ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ और ‘युवराज’ में अनिल ने धारा से हटकर कुछ किया था।

