संगीतकार सलिल चौधरी का गीत-संगीत विविधतापूर्ण रहा। उसमें असम व बंगाल की लोकधुनों का प्रभाव झलकता रहा। थियेटर के अनुभव ने उन्होंने कोरस प्रधान गीतों को विलक्षण धुनों में संजोने का हुनर दिया। वहीं बीथोबीन मोजार्ट के असर से उनके संगीत को विलक्षणता मिली। पहाड़ों के स्वर में भीगा ‘आजा रे परदेशी’ गीत मन को छूता है। ‘चढ़ गयो पापी बिछुआ’ में बिहू का सौंदर्य है।
विख्यात संगीतकार सलिल चौधरी का संगीत पाश्चात्य और लोकजीवन का सुंदर मिश्रण था। वह फिल्म संगीत में अपनी मौलिकता और अभिनव प्रयोग के लिए जाने गए। उनके गीत संगीत में विविधता रही। अगर उसमें असम के लोकजीवन का सौंदर्य था तो बंगाल की लोकधुनों का प्रभाव भी उसमें झलकता रहा। थियेटर के अनुभव ने उन्होंने कोरस प्रधान गीतों को विलक्षण धुनों में संजोने का हुनर दिया। वहीं बीथोविन-मोजार्ट की स्वर लहरियों के प्रभाव में उनके संगीत में भी एक विलक्षण प्रयोग दिखता रहा। उनका संगीत इस रूप में भी दिखा कि कई गीतों में अंतराएं अलग-अलग धुनों में मंत्रमुग्ध करती रहीं। इसराज पियानो, बांसुरी जैसे साजों को वह खुद बहुत सुरीला बजाते थे। उनके संगीत में ये साज बजते रहे। पहाड़ों के स्वर में भीगा ‘आजा रे परदेशी’ जैसा गीत आज भी मन को छूता है। वहीं ‘चढ़ गयो पापी बिछुआ’ में असम के बिहू का सौंदर्य उतर कर आता है। ‘ए मेरे प्यारे वतन’ जैसे गीत को उन्होंने संजीदा संगीत दिया।
असमी लोक संगीत का प्रभाव
यह सलिल दा की अपनी विशिष्ट शैली थी जिसमें उन्होंने ‘कुछ तो निशानी छोड़ जा’ जैसे गीत को यादगार बनाया। सलिल दा के साजों ने गीतकारों के शब्दों को पूरा सम्मान दिया। सलिल चौधरी 19 नवंबर 1925 को पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना में जन्मे थे। उनके पिता डॉ. ज्ञानेंद्र चौधरी असम के काजीरंगा में चाय बागान में चिकित्सा अधिकारी थे। उनकी रुचि थिएटर व लोकसंगीत में थी। इसका प्रभाव सलिल चौधरी पर पड़ा। असम के लोक संगीत ने उन्हें प्रभावित किया। वहीं वे ग्रामोफोन में आर्केस्टा सुनते थे। छह साल की उम्र में वह पियानो बजाने लगे थे। कालेज की पढ़ाई करते समय उन्होंने कुछ धुनों को रचा।
पश्चिम बंगाल में चर्चित हुए गीत
गीत-संगीत के साथ उनमें देशप्रेम और सामाजिक चेतना के सरोकार भी जागे। वह जागरूकता फैलाने वाले गीत लिखने लगे। महज बीस साल की उम्र में सलिल चौधरी जो गीत रच रहे थे व धुन तैयार कर रहे थे उससे वे खासा चर्चित हुए। पश्चिम बंगाल के कई चर्चित गायकों ने उनके संगीतबद्ध गीतों को गाया। उनकी पहली बंगाली फिल्म ‘पोरिवर्तन’ (1949) थी। तब मुंबई में एसडी बर्मन, नौशाद व शंकर जयकिशन जैसे संगीतकार थे। बंबई का फिल्म संसार सलिल चौधरी की प्रतीक्षा कर रहा था। जिन्हें मधुमति , दो बीघा जमीन, जागते रहो, आनंद जैसी फिल्मों का संगीत देना था। भारतीय गीत-संगीत को असमी, बंगाली, तमिल, गुजराती गीत-संगीत से सपन्न करना था।
संगीत का वो खास अंदाज
सलिल चौधरी के संगीत का खास अंदाज रहा। कहीं दूर जब दिन ढल जाए, आजा रे परदेशी , ए मेरे प्यारे वतन, सुहाना सफर और ये मौसम हसीं, जिंदगी कैसी ये पहेली, उड़ जा रे पंछी , जैसे कई गीत सलित चौधरी की भारतीय फिल्म संगीत को उपहार व धरोहर हैं। उन्होंने जटिल धुनें भी दीं तो बहुत सुगम धुनों पर ऐसा संगीत सजाया कि लोग गाने लगे, ‘धरती कहे पुकार के’। उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र (अब उत्तराखंड) में सलित चौधरी ने पहाड़ी राग पर किसी लोकगीत को सुना था। उसी से प्रभावित होकर उन्होंने मधुमति के गीत ‘आजा रे परदेशी’ की धुन तैयार की थी। अपनी शैली से हटकर ‘चार दिवारी’ फिल्म के गीत ‘कैसे मनाऊं पियवा’ के लिए बहुत मार्मिक धुन बनाई थी। इसी तरह ‘चढ़ गयो पापी बिछुआ’ में उन्होंने असम के बिहू का उत्सवी संगीत रचा। हेमंत कुमार स्वयं संगीतकार थे। लेकिन सलिल चौधरी ने अपने संगीत में उनके कई यादगार गीत गवाए थे। सलिल के संगीत में हेमंत कुमार का ‘गंगा आए कहां से ,झिर झिर बदरवा बरसे’ गीत मंत्रमुग्ध करता है।
प्रयोगधर्मी संगीतकार
सलिल चौधरी प्रयोगधर्मी संगीतकार थे। साल 1958 में वह लांस एंजेलिस में म्यूजिक की बड़ी दुकान में गए जहां इंडियन इंस्ट्रूमेंट मिलते थे। वहां खड़ी सेल्सगर्ल को कहा कि मुझे वो सामने वाला सितार दिखा दीजिए। सेल्सगर्ल्स ने टालना चाहा। इस पर दुकान के मालिक डेविड बनार्ड वहां आए और कहा कि उन्हें सितार दिखा दो। तब सेल्सगर्ल ने कहा कि यह बेस सितार है। इसे बजाना बहुत कठिन होता है। डेविड बनार्ड ने पूछा कि क्या आप सितार बजा सकते हैं। चौधरी ने सितार से झंकार भरी तो वहां खड़े सब मंत्रमुग्ध हो गए। डेविड बनार्ड ने कहा कि मैंने इससे पहले रवि शंकर को ही इतना सुंदर सितार बजाते देखा था, यह सितार आपको गिफ्ट है। सलिल दा ने ‘परख’ फिल्म के लिए ‘ओ सजना बरखा बहार आई’ की जो स्वर लहरी छेड़ी वह इसी सितार की है। सलिल चौधरी ने खासकर शैलेंद्र के लिखे गीतों को बहुत ही सुरीले साज दिए। आजा रे परदेशी, जागो मोहन प्यारे, सुहाना सफर और ये मौसम हसीं, धरती कहे पुकार के जैसे कई यादगार तराने शैलेंद्र ने लिखे जिन्हें सलिल चौधरी ने यादगार धुनें दी।
सलिल चौधरी कहते थे कि वह संगीत की ऐसी शैली विकसित करना चाहते हैं जो सीमाओं से परे हो। बचपन में ग्रामोफोन को पाकर संगीत का अहसास हुआ। असमी लोकसंगीत में ऐसे खोए कि होंठों पर बांसुरी आ गई। मोजार्ट की रचनाओं ने उन्हें पश्चिमी संगीत का प्रभाव बताया। भारतीय शास्त्रीय संगीत की साधना ने दिव्यता दी। उन्हें संगीत के हर पक्ष की परख थी। सलिल दा ने गिटार बजाने वाले साजिदें को देख कर कहा था कि यह लड़का बहुत अच्छा संगीतकार बनेगा। वह गिटारवादक उस्ताद इलैयाराजा कहलाए। आर के रहमान ने कहा था कि उनकी संगीत की समझ सलिल चौधरी के संगीत से प्रभावित रही है।
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