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बॉलीवुड में पपराजी कल्चर का सितम

पेशेवराना अनैतिकता

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मीडिया का सेलिब्रिटीज की बीमारी या अन्य निजी क्षणों को ब्रेकिंग कंटेंट बनाना न सिर्फ निजता का उल्लंघन बल्कि पेशेवराना अनैतिकता भी है। मसलन, हॉस्पिटल कर्मियों द्वारा अभिनेता धर्मेंद्र की बिगड़ी तबीयत का वीडियो पपराजियों के जरिये लीक किया गया। बेहतर है कि क्लिक से कमाई की होड़ में शामिल पपराजिये अब संवेदनशीलता से काम लें।

पिछले दिनों जिस तरह मुंबई के एक अस्पताल में स्टाफ द्वारा चुपके से वरिष्ठ अभिनेता धर्मेंद्र की वीडियो बनायी गयी और पपराजियों के जरिये लीक उस वीडियो के कारण तब तक जीवित धर्मेंद्र को भी मीडिया द्वारा श्रद्धांजलियां देने की होड़ लग गई, उससे साफ है कि बॉलीवुड में पपराजियों का कहर खतरनाक होता जा रहा है।

पेशेवराना गैर जिम्मेवारी

हम जया बच्चन को भले बार-बार नाराजगी दिखाने वाली महिला कहकर पपराजियों की हरकतों पर पर्दा डालने की कोशिश करते रहे हों, लेकिन जिस तरह धर्मेंद्र की बिगड़ी तबीयत का वीडियो आनन-फानन में जारी किया गया, वह पेशेवराना गैर जिम्मेवारी की हद थी। इससे स्वतंत्र फोटोग्राफरों का असल चेहरा सामने आया है। ऐसे में बॉलीवुड में सेलिब्रिटीज की अब गोपनीयता का कोई मतलब नहीं रह गया। वास्तव में हॉस्पिटल से वहीं के कर्मचारियों द्वारा मरीज का वीडियो बनाकर उसे पपराजियों के हवाले कर देना, एक बहुत बड़े नेक्सस का भी खुलासा है। कम से कम अस्पताल जैसी जगहें तो सुरक्षित रहती। मेडिकल स्टाफ द्वारा जो रिकॉर्डिंग लीक की गई, उससे पता चलता है कि पैसा और लाइक अब इंसान की गरिमा से कहीं ज्यादा बड़ी चीज है। दरअसल इसमें देश की मीडिया संस्कृति का भी योगदान है। जिस तरह से भारतीय मीडिया सेलिब्रिटीज की बीमारी या कमजोर क्षणों को ब्रेकिंग कंटेंट बनाती है, वह न सिर्फ अपमानजनक बल्कि पेशेवराना अनैतिकता है।

व्यक्तिगत जिंदगी पर नजर

दरअसल देश में पपराजी संस्कृति अपने सबसे विकृत दौर में आ चुकी है। यह कोई अकेला मामला नहीं है, हाल के सालों में पपराजिये इस तरह की अति कई बार कर चुके हैं। एवरग्रीन अभिनेता माने जाने वाले दिलीप कुमार को भी वास्तविक मौत से पहले पपराजियों की व्यावसायिक हड़बड़ी ने उन्हें कई बार मृत दर्शा दिया था। पहले पपराजिये सिर्फ एयरपोर्ट, जिम और फिल्मों की पार्टियों को ही निशाना बनाते थे, जिनके बाहर रहकर वो सेलिब्रिटीज की फोटो लेते थे। मगर अब तो बीमारी की तस्वीर और मरने की खबर जैसे ज्यादा निजी क्षणों पर उनकी नजर है। धर्मेंद्र जैसे बुजुर्ग आइकन को उन्होंने उनके बीमारी के क्षणों में भी नहीं बख्शा और उनकी मृत्यु के बारे में खबरों को ज्यादा से ज्यादा कीमत पर बेचने की होड़ दिखायी हालांकि असल में मृत्यु बाद में हुई। वास्तव में मीडिया का यह वह दौर है जहां, रोग, मौत व ट्रॉमा को सबसे ज्यादा क्लिक मिलता है।

क्लिक और शेयरिंग से कमाई

जब से कमाई का जरिया सिर्फ क्लिक और शेयरिंग बनकर उभरे हैं, तब से ऐसे मौकों पर किसी की भी परवाह नहीं की जाती। ऐसी तस्वीरों और वीडियो को लोड करने वाले जानते हैं कि इन पर दर्शकों का हुजूम टूट पड़ेगा और फिर उसका जो आर्थिक फायदा होगा, वह बेचने, खरीदने के दौर से कहीं ज्यादा बड़ा होगा। इसलिए ही आज पपराजिये एक-एक, दो-दो सैकंड के भी सोशल मीडिया के किसी प्लेटफॉर्म में डालते रहते हैं ताकि देखने वालों को ज्यादा उत्तेजित किया जा सके व कमाई के रूप में भुनाया जाए। दरअसल बड़ी तादाद में लोगों की मानसिकता कमजोर पक्षों को देखने में अजीब संतुष्टि महसूस करने की है। इसलिए आज सेलिब्रिटीज के सबसे ज्यादा ऐसे वीडियो देखे जाते हैं, जो उन्हें लाचार, असमर्थ, कमजोर या हारते हुए दिखाते हैं। इस दौर का यही चरित्र है, जो पपराजियों के रूप में सामने आया है, मगर हमारे पूरे समाज का आईना है।

आत्मावलोकन का वक्त

हाल की लीक हुई ऐसी तस्वीरों और वीडियोज को देखने से पता चलता है कि अब सेलिब्रिटीज की गोपनीयता के मामले में अस्पताल भी असुरक्षित हैं। क्योंकि आज पपराजी मीडिया सहानुभूति से नहीं बल्कि दर्द और ट्रॉमा इकोनॉमी से संचालित होती है। धर्मेंद्र जैसे कलाकार के मामले में खराब व्यवहार के कारण जिस तरह पपराजिये बेनकाब हुए हैं, उन्हें अब अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए कि हम इस क्लिक कल्चर को बढ़ावा दे रहे हैं, वह किस आत्मघाती मोड़ तक पहुंच सकती है।

अब चूंकि हर आदमी के पास कैमरे वाले मोबाइल हैं, तो वह कब किसी की गोपनीयता को भंग कर दे, ऐसा विश्वास करना मुश्किल हो गया है। एक जमाना था, जब मेडिकल पेशेवरों को नहीं माना जाता था कि वो इस तरह की हरकतें करें। लेकिन धर्मेंद्र के बीच वीडियो से यह साफ हो गया है कि असंवेदनशीलता की कोई इंतहा नहीं। वहीं गंभीरता से सोचने की जरूरत है, कि क्या अब पपराजिये संस्कृति में शामिल फोटोग्राफरों के लिए इंसानी तकलीफ सिर्फ एक ‘थंबनेल’ हैं। -इ.रि.सें.

 

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