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एक भयावह त्रासदी की बाकी है कसक

तीस साल पहले का डबवाली अग्निकांड

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मंडी डबवाली में 23 दिसंबर 1995 को विश्व की भयावह अग्नि त्रासदी घटित हुई थी। ऐसा हर हादसा उस दुर्भाग्यपूर्ण अग्निकांड के जख्म हरे कर देता है। इसमें चंद मिनटों में 442 लोग काल का ग्रास बन गये। जिनमें ज्यादातर स्कूली बच्चे थे। देश में आग लगने की त्रासदियों की लंबी फेहरिस्त है जो क्रम अभी भी जारी है। वजह है जागरूकता की कमी। कारण जानने के बावजूद सबक नहीं लिये जाते। बचाव उपायों पर अमल होना जरूरी है। पीड़ितों के प्रति तंत्र की बेरुखी भी कम नहीं। हालांकि असल जरूरत अग्नि सुरक्षा को बतौर ‘संस्कार’ अपनाने की है।

 

नरेश कौशल द्वारा बतौर रिपोर्टर की गयी हादसे की कवरेज

डबवाली अग्नि त्रासदी के उस काले दिन से लेकर हाल में गोवा में आग की दुर्घटना तक, हर बार जब किसी बड़े हादसे की खबर सामने आती है, भीतर के जख्म पुन: ताज़ा हो उठते हैं। वह 23 दिसंबर 1995 का दिन आज भी स्मृतियों में सुलगता है। जब राजीव मैरिज पैलेस में आयोजित डीएवी स्कूल के भव्य पारितोषिक वितरण समारोह में शॉट सर्किट से विश्व की भयावह अग्नि त्रासदी घटित हुई। चंद मिनटों में 442 लोग काल का ग्रास बन गये।

यह सिर्फ आंकड़ा नहीं था, बल्कि डबवाली शहर की लगभग एक प्रतिशत आबादी की बर्बादी थी। डबवाली का लगभग हर तीसरा परिवार प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर हादसे का पीड़ित हुआ। सैकड़ों परिवार बर्बादी की कगार पर आ गये, दर्जनों घरों को ताले लग गये। यह देश-दुनिया के लिए सबक था, पर सीख किसी ने नहीं ली। तीन दशक बाद भी हालात जस के तस हैं। गोवा अग्निकांड में 23 मौतों की खबर आई, तो लगा जैसे समय ठहर गया हो। वही अफरा-तफरी, वैसा ही आग का तांडव, वैसी ही बेबसी। हर बार वही सवाल उठता है कि हम कब तक लापरवाही की कीमत जानों से चुकाते रहेंगे? डबवाली अग्निकांड के मृतकों में 258 बच्चे, 140 महिलाएं व 44 पुरुष थे, हादसे में कुल 150 लोग घायल हुए व 31 दिव्यांग हो गये।

मैं (लेखक) इकबाल सिंह शांत, उस त्रासदी का जीवित दिव्यांग पीड़ित हूं। हादसे की आग में फंसे अपने पिता स्वतंत्रता सेनानी सरदार गुरदेव सिंह शांत को बचाने के लिए अंदर दोबारा दाखिल हुआ व उसी कोशिश में मेरे दोनों हाथ व पीठ गंभीर रूप से झुलस गई। दिव्यांग हो गया, लेकिन तसल्ली है कि पिता को बाहर निकाल लाया था। अफ़सोस, 25 दिसंबर 1995 को पीजीआई चंडीगढ़ में उनका देहांत हो गया। त्रासदी ने डबवाली से बहुत कुछ छीन लिया।

अग्नि सुरक्षा नियमों का पालन जरूरी

डबवाली अग्नि त्रासदी के बाद मेरिज पैलेसों में आयोजनों की सुरक्षा बढ़ाने, अग्नि सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य व आपातकालीन सेवाओं को मजबूत करने के कई नियम-कायदे तो बने। लेकिन गोवा जैसी घटनाएं बताती हैं कि कागज़ पर बने नियम ज़मीन पर उतरने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। डबवाली अग्निकांड की सीबीआई रिपोर्ट में आग का कारण राजीव मैरिज पैलेस में कार्यक्रम हेतु लगाए दो बिजली कनेक्शन बताए गए थे। बिजली ट्रिपिंग के दौरान जेनरेटर का चेंज-ओवर नहीं बदला गया। पंडाल में लगी पॉलीथिन शीट, बांस व रेशमी कपड़े से आग तेजी से फैली। बिजली निगम, नगर पालिका, पैलेस मालिकों व दो निजी बिजली कर्मचारियों सहित 14 लोगों को दोषी माना गया। पुलिस ने कुछ पर 304-बी के तहत केस दर्ज किया। सीबीआई कोर्ट ने दो-दो साल सजा दी, पर बाद में उन्हें हाईकोर्ट ने बरी कर दिया। जांच में सामने आया कि कार्यक्रम स्थल का नक्शा तक पास नहीं था।

लापरवाही के चलते हादसों का सिलसिला

मामला सिर्फ डबवाली और गोवा तक सीमित नहीं है, तथ्य खंगालें तो दर्जनों मामले रिकार्ड पर होंगे। देश में 1995 के बाद कई बड़े अग्नि हादसे हुए, जिन्होंने सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए। 13 जून 1997 को दिल्ली के उपहार सिनेमा में आग दुर्घटना में 59 लोगों की जान गई। सोलह जुलाई, 2004 को तमिलनाडु के कुंभकोणम स्कूल हादसे में 94 बच्चों की दर्दनाक मौत हुई। फरवरी 2010 में कोलकाता के स्टीफन कोर्ट में अग्नि त्रासदी ने 43 लोगों की जिंदगी छीन ली। दिसंबर 2017 में कमला मिल्स (मुंबई) की आग में 14 मौतें हुई। जनवरी 2018 में बवाना औद्योगिक क्षेत्र (दिल्ली) में आग से 17 मजदूरों की जान गई। मई 2019 में सूरत के तक्षशिला कोचिंग सेंटर में आग से 22 छात्रों की मौत हुई। साल 2019 में दिल्ली की अनाज मंडी में आग ने 44 लोगों को लील लिया। साल 2022 में उत्तर प्रदेश के भदोही क्षेत्र में दुर्गा पूजा पंडाल में भीषण आग से पांच मौतें व 68 लोग झुलस गये। अब दिवाली-2025 को अग्नि घटनाओं में दिल्ली, राजस्थान, हिमाचल व बिहार में 482 से अधिक लोग झुलसे। गुरुग्राम में 29 व गौतम बुद्ध नगर में 26 आग की घटनाएं दर्ज हुई, नोएडा में एक युवक की मौत भी हुई। रौनक में डूबे हम पुराने सबक को भूल जाते हैं और गलतियां दोहराते हैं। इन हादसों के लिए सिर्फ प्रशासन ही जिम्मेवार नहीं है, हम सब भी हैं, जो व्यवस्था व नियमों को धता बताते हुए अग्नि हादसों को बुलावा देते हैं।

व्यवस्था व समाज में जगे चेतना

प्रत्येक अग्नि हादसे में बच जाते हैं, झुलसे हुए चेहरे, जले हुए हाथ-पैरों वाले पीड़ित तो कहीं बेबस मां-बाप या अनाथ बच्चे। मदद के नाम पर बस कुछ लाख का मुआवजा। इंसाफ के लिए अदालतों में तारीख-पर-तारीख। सरकारें तब जागती हैं, जब जिंदगियां राख हो चुकी होती हैं। हर हादसे में उमेश मित्तल, गगनदीप बुट्टर, गीता, सीमा बलाना, सुमन कौशल, विनोद बांसल, रमेश सचदेवा जैसे अनगिनत पीड़ित जीवन भर आग से मिले दुखों को ढोते हैं। उस अग्नि त्रासदी के बाद भी मेरी हिम्मत व सरोकारों में कमी नहीं आयी। पत्रकारिता में सक्रिय हूं। लेकिन विडंबना है कि कभी व्यवस्था व समाज में वांछित चेतना नहीं दिखी। दरअसल जरूरत हमदर्दी की नहीं, बल्कि सुरक्षा को बतौर ‘संस्कार’ अपनाने की है। स्कूल-कॉलेजों से लेकर गांव-कस्बों तक हर व्यक्ति को अग्नि सुरक्षा की पाठ्यक्रम में शिक्षा अनिवार्य हो। इमारतों, सार्वजनिक स्थानों, विवाह समारोहों, धार्मिक आयोजनों व दुकानों व बाजारों में सुरक्षा मानकों से कोई समझौता न किया जाये। अग्निशमन विभाग आधुनिक उपकरणों व पर्याप्त अमले से लैस हो। वहीं हादसों के जिम्मेदारों पर फ़ास्ट ट्रैक कार्रवाई हो।

इस बार 23 दिसंबर 2025 को भी हम सभी अग्नि पीड़ित डबवाली अग्निकांड की 30वीं बरसी मनाएंगे। इस बार गोवा अग्निकांड के 23 मृतकों का दुख भी साथ होगा। बता दें कि 23 दिसंबर को राष्ट्रीय अग्नि सुरक्षा दिवस घोषित करने की मांग अभी अधूरी है।

जिंदा रही ढेर तले दबी दो वर्षीय दिव्या

डबवाली स्थित नवनिर्मित राजीव मैरिज पैलेस में 23 दिसंबर 1995 को डीएवी स्कूल का पांचवां वार्षिकोत्सव था। पैलेस का नामकरण चंद्रभान धमीजा के पुत्र राजीव के नाम पर रखा गया। राजीव की अग्नि त्रासदी में मौत हो गयी थी। धमीजा परिवार से 6 लोग हादसे का शिकार हुए थे। हादसे में अधिक मौतों का कारण पैलेस की ऊंची दीवारें रहीं। वहीं लोहे के शेड के नीचे कपड़े व बांस आदि से बना पंडाल लगा था, नीचे प्लास्टिक बिछी थी। तीन दर्जन झूमर लगाये गये थे व इत्र भी छिड़का था। आने-जाने के लिए एक ही मुख्य द्वार था और भीड़ बढ़ने पर उसमें ताला लगा दिया गया था। त्रासदी के मृतकों में एक नवविवाहित जोड़ा राधेश्याम व वन्दना भी थे, जिन्होंने 70 दिन पहले इसी पैलेस में फेरे लिए थे। हादसे में सबसे उम्रदराज मृतक रेशमा देवी व दो माह की बच्ची आरजू थी। जबकि लाशों के ढेर तले दबी दिव्या नामक दो वर्षीय खुशकिस्मत जिंदा निकाली गई थी।

आग दो बार लगी थी

डबवाली की इस भयावह त्रासदी में एक बार नहीं बल्कि दो बार आग लगी थी। फर्क सिर्फ इतना था कि पहली आग एक माचिस की तीली तक सीमित रह गई थी। दरअसल, जब स्कूल के सालाना समारोह में ज्योति प्रज्वलित करने की रस्म चल रही थी तो मोमबत्ती जलाने के बाद लापरवाही से स्टेज से जलती हुई माचिस की तीली नीचे फेंक दी गई। पहली कतार में बैठे लोगों के ठीक सामने आकर गिरी। तब वहां मौजूद अग्नि पीड़ित रमेश सचदेवा ‘आचार्य’ बताते हैं कि जलती हुई उस तीली को लोगों ने तुरंत बुझा दिया। तब तो हादसा टल गया। उस समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि कुछ देर बाद उसी स्थान पर आग का ऐसा भयानक तांडव देखने को मिलेगा।

हर्जाने के तौर पर मांगी रेलगाड़ी की सुविधा

अग्नि त्रासदी का शिकार हुई शहर की विभूतियों की कमी चंद दिनों के बाद खलने लगी थी। त्रासदी के बाद शोक सभा में 29 दिसंबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव, केन्द्रीय मंत्री माधव राव सिंधिया व केन्द्रीय मंत्री कुमारी सैलजा डबवाली पहुंचे थे। उनके समक्ष शहर के कुछ संभ्रांत लोगों ने जम्मू-तवी रेलगाड़ी की मांग रख दी। सरकार ने शोक में डूबे शहर की भावना के मद्देनजर मांग को स्वीकार भी कर लिया। लेकिन इस रेलगाड़ी का न तो डबवाली से कोई सीधा सरोकार था और न अग्नि पीड़ितों की दिक्कतों से कोई सबंध था। बेहतर होता कि अग्नि पीड़ितों की जिन्दगी को मुख्यधारा में लाने के लिए मांगें रखी जातीं । बता दें कि तब घटना की ताज़ा स्थिति के चलते पीएम की सभा स्थल पर अग्नि पीड़ितों के परिजनों की उपस्थिति नगण्य थी।

पैनोरमा का विकास व सुनवाई जरूरी

हादसे के तीन दशक तक भले ही त्रासदी स्थल पर अग्निकांड स्मारक बन गया है, यहां विकास के नाम पर आज लाखों रुपये खर्च किये जा रहे हैं। लेकिन शायद ही अग्नि हादसे से जुड़ी समस्याओं व अग्नि पीड़ितों की कभी ढंग से सुनवाई हुई हो। दरअसल, अग्निकांड को एक ‘अंतरराष्ट्रीय’ सबक के रूप में एक मल्टीस्टोरी ‘पैनोरमा’ के तौर पर विकसित किया जाना चाहिए था, ताकि देश-विदेश से लोग इस जगह पर आकर अग्नि हादसों से बचने के लिए चौकसी व उपायों की जानकारी हासिल करते। जिसमें रेशमी कपड़ों से अग्नि हादसे , घरेलू गैस से आग, कृषि उपज में आग, बिजली उपकरणों से आग, व्हीकल में आगजनी के कारणों व बचाव से जुड़े तथ्य, प्रोजेक्ट व आधुनिक उपकरण प्रदर्शित किए जा सकते थे। जिसका अवलोकन कर दर्शक सभी तरह की अग्नि हादसों के प्रति जागरूक होते। ऐसी एक मांग अग्नि पीड़ितों द्वारा सरकार को भेजी गयी, जिसे ‘इग्नोर’ कर दिया गया।

त्रासदी ने छीनी समर्थ हस्तियां

अग्नि त्रासदी ने डबवाली का बचपन यानी भविष्य, जवानी व परिवार तो छीने ही, शहर की तत्कालीन समर्थ व अग्रणी हस्तियां भी छीन लीं। इस आग ने शहर के लोकप्रिय नेता व स्वतंत्रता सेनानी सरदार गुरदेव सिंह शांत को लील लिया, जिनका पल-पल शहर के विकास व बेहतरी को समर्पित था। वरिष्ठ पत्रकार अशोक वढेरा व समाजसेवी संजय ग्रोवर भी शहर की उभरती हस्तियों में शुमार थे। इन दोनों को अग्नि त्रासदी में बच्चों को बचाने के चलते भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। मृतकों में डॉक्टर रवि भटेजा, व्यापारी ओमप्रकाश मेहता, पांच प्रिंसिपल क्रमवार प्रीति कामरा (प्रिंसीपल डीएवी स्कूल), निर्मल शर्मा (प्रिंसिपल सतलुज स्कूल), संतोष सचदेवा, सतपाल राजपूत व स्वतंत्र सिंह भाटी थे। जबकि डीएवी स्कूल की 12 अध्यापिकाएं भी मौत का शिकार बनीं। जिनमें शहीद अशोक वढेरा की बहन बबिता वढेरा भी शामिल थीं।

न्याय दिलाने को अंजू अरोड़ा ने किया संघर्ष

डबवाली अग्निकांड के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए लड़ी गई कानूनी लड़ाई में डबवाली की बेटी एडवोकेट अंजू अरोड़ा ने एक मिसाल कायम की। अंजू अरोड़ा उस समय पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट, चंडीगढ़ में प्रैक्टिस कर रहीं थी, उन्होंने त्रासदी में उनके चार वर्षीय भतीजे रजत की मौत हो गयी, जबकि दूसरा मासूम भतीजा बॉबी गंभीर रूप से झुलस गया। निजी पीड़ा के बावजूद उन्होंने पीड़ितों के अधिकारों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। अगस्त 1996 में हाईकोर्ट में रिट दायर कर पीड़ितों के लिए मुफ्त इलाज, पुनर्वास, शिक्षा व मुआवजे की मांग उठाई गई। स्थानीय कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक चली कानूनी लड़ाई के दौरान हरियाणा में पांच सरकारें बदलीं, लेकिन अदालतों के माध्यम से ही पीड़ितों को न्याय मिल सका। करीब 22 वर्ष लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 2017 में पीड़ितों के पक्ष में 34.14 करोड़ रुपये ब्याज सहित मुआवजे से जुड़े आदेश पारित हुए।

प्रशासनिक दर्द, सवाल भी

समारोह के मुख्यातिथि सिरसा के तत्कालीन उपायुक्त एम.पी. बिदलान थे जिन्हें अग्नि त्रासदी के दौरान बचाने को उनके सुरक्षा कर्मियों ने एक मात्र छोटे गेट से (इमरजेंसी) बाहर निकाला। उसके एकदम बाद उनकी अनुपस्थिति पर सवाल खड़े हुए। वहीं दूसरी ओर, त्रासदी में प्रशासनिक तन्त्र का दर्द भी जुड़ा हुआ है। इस अग्नि त्रासदी में डबवाली के तत्कालीन एसडीएम सोमनाथ कंबोज व उनकी पत्नी कमलेश कंबोज का भी देहांत हो गया था। वहीं, तब डबवाली में तैनात डीएसपी अनिल राव बच्चों को बचाते हुए त्रासदी में घायल हो गये थे, व उनकी मासूम पुत्री सुरभि का देहांत हो गया था। अब एडीजीपी के पद से सेवामुक्त हो चुके अनिल राव डबवाली अग्निकांड स्मारक पर अक्सर आते रहे हैं। त्रासदी में पुलिस के सिपाही गुरदास व सिपाही भागीरथ ने भी अनेक मासूमों को मौत के मुंह से निकाला, जब वे स्वयं बाहर निकलने लगे तो आग की लपटों ने उन्हें घेर लिया और दोनों शहीद हो गए।

राजकीय स्मारक की मांग भी अधूरी

23 दिसंबर 1995 को घटित अग्नि त्रासदी को 30 वर्ष पूरे हो गए, लेकिन पीड़ित परिवारों की राजकीय स्मारक की मांग आज भी अधूरी है। हर बरसी पर स्मारक निर्माण की मांग उठी, आश्वासन मिले, पर जमीन पर कुछ नहीं उतरा। अग्निकांड स्मारक की जमीन करीब दो कनाल है, जो राजस्व रिकॉर्ड में राज्य सरकार के नाम दर्ज है। सरकार के निर्देशों के तहत इस स्थल को लेकर पुरातत्व विभाग से एनओसी लेना आवश्यक है। जनहित की यह मांग अग्नि हादसों के प्रति जन जागरूकता से जुड़ी है। नगरपरिषद में तत्कालीन पार्षद व अग्नि पीड़ित विनोद बांसल की मांग पर स्मारक को राजकीय स्मारक घोषित करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ था जिसे सरकार को भेजा गया था।

जब दो अग्नि पीड़ितों ने रचाया ब्याह

डबवाली अग्नि त्रासदी में झुलसने के चलते दिव्यांग हुए नवगीत सेठी व प्रतिमा मुरेजा ने शादी के बंधन में बंधकर जिंदगी के प्रति एक जज्बा दर्शाया। मौजूदा समय में नवगीत व प्रतिमा सरकारी क्षेत्र में अच्छे पदों पर सेवारत हैं। यह दंपति संस्था ‘द इवनिंग क्लासेज’ के जरिये जरूरतमन्द बच्चों को निशुल्क शिक्षा दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त अग्नि पीड़ित प्रभजोत विश्वास बांसल, भाविक बांसल, साहिल सेठी, गुंजन कामरा ने भी हादसे से उबरकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर ऊंचे मुकाम छूए।

इस खानदान ने भी खोये थे चार सदस्य

डबवाली अग्नि त्रासदी में हरियाणा के राजनीतिक चौटाला खानदान की भी पारिवारिक क्षति हुई थी। वरिष्ठ इनेलो नेता संदीप चौधरी की माता रामेश्वरी देवी, धर्मपत्नी रमा चौधरी, सात वर्षीय पुत्री आकाशदीप व करीब दो वर्षीय कर्णवीर चौधरी आग के शिकार हो गये थे।

विनोद बांसल की अहम भूमिका

अग्नि पीड़ितों के इंसाफ दिलाने के लिए स्वयं अग्नि पीड़ित विनोद बांसल ने कमान संभाली हुई है। तीन दशक लंबी कानूनी व प्रशासनिक प्रक्रिया व प्रयासों में पीड़ितों को मुफ्त इलाज, पुनर्वास, शिक्षा व मुआवजे की प्राप्ति में बड़ी भूमिका निभाई। वकील न होने के बावजूद एक वकील की भांति सुप्रीम कोर्ट तक सैकड़ों परिवारों के लिए इंसाफ जमीन तैयार की। बता दें कि विनोद बांसल ने भी हादसे में धर्मपत्नी रेनू, पुत्री नैंसी व पुत्र हिमांशु गंवाए थे।

-लेखक डबवाली अग्निकांड के पीड़ित हैं।

 

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