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कोर्ट की सख्ती के मायने

जन-सुरक्षा व पशु-कल्याण के बीच हो संतुलन

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इसमें दो राय नहीं कि स्थानीय निकायों द्वारा आवारा कुत्तों को हटाने के संबंध में विगत में दिए अपने निर्देशों को नरम न करने का सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय, बिगड़ते जन-सुरक्षा संकट में एक आवश्यक हस्तक्षेप है। हाल के वर्षों में, देश भर में स्थानीय प्रशासन व निकाय कुत्तों के काटने की घटनाओं में लगातार हो रही चिंताजनक वृद्धि को रोकने में विफल ही रहे हैं। ऐसे में शासन व प्रशासन स्तर पर इस समस्या के निराकरण की कोई सार्थक पहल न होते देख ही, शीर्ष अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा है। नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के अनुसार, साल 2023 में तीस लाख से अधिक कुत्तों के काटने के मामले दर्ज किए गए थे। उसके अगले साल 2024 में रोकथाम के कोई ठोस प्रयास न होने के कारण 37 लाख मामले दर्ज किए गए। आंकड़े बता रहे हैं कि औसतन प्रतिदिन दस हजार घटनाएं सामने आ रही हैं। वहीं कई राज्यों व शहरों में इन घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है। हाल ही में सामने आए केरल के आंकड़ों के अनुसार, वहां एक साल के भीतर ही 3.6 लाख से अधिक कुत्तों के काटने के मामले सामने आए हैं। वहीं दूसरी दिल्ली से सटे नोएडा में कुछ ही महीनों में हजारों शिकायतों के बाद हॉटस्पॉट की पहचान की गई। इन शिकायतों में स्कूलों के पास उनका जमावड़ा होना, चलने में असमर्थ बुजुर्ग नागरिकों का शिकार बनना व आम नागरिकों के आवारा कुत्तों के भय में जीने के मामले उजागर हुए हैं। दरअसल, विगत में भी इस संकट के कारगर समाधान के लिये शीर्ष अदालत ने सख्त निर्देश दिए थे। स्थानीय नगर निगम व नगर पालिकाओं की जवाबदेही तय की थी कि कुत्तों को शेल्टर होम ले जाकर उनकी नसबंदी की जाए और टीकाकरण किया जाए। लेकिन इस दिशा में कारगर पहल होती नजर नहीं आई। वहीं तसवीर का दूसरा पहलू है कि यह संकट समाज और संस्थाओं द्वारा जानवरों के प्रति किए जाने वाले व्यवहार में परेशान करने वाली विफलता को भी दर्शाता है।

पिछले दिनों चंडीगढ़ से एक स्तब्धकारी घटना ने हर किसी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित किया,जब एक अज्ञात व्यक्ति ने एक पिल्ले को धधकते तंदूर में फेंककर जिंदा जला दिया। ऐसे शर्मनाक कृत्य उस भयावह क्रूरता को उजागर करते हैं, जो सार्वजनिक चर्चाओं में उजागर नहीं होती। इस घटना ने इन जीवों की दयनीय स्थिति को ही उजागर किया। वहीं भूख से बिलबिलाते कुत्तों द्वारा कथित तौर पर अपने ही बच्चों को खाने के मामले भी शामिल हैं। शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी से सहमत हुआ जा सकता है कि जानवरों के साथ मानवीय व्यवहार का मतलब नागरिकों की सुरक्षा की अनदेखी करना नहीं हो सकता। लेकिन इसके साथ ही जन सुरक्षा को पशु कल्याण की उपेक्षा का बहाना भी नहीं बनाया जा सकता है। निस्संदेह, सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानूनी रूप से जानवरों को स्थानांतरित करने पर दिए गए जोर के साथ अब आश्रय स्थलों, नसबंदी केंद्रों, टीकाकरण अभियानों और पशु चिकित्सा सुविधाओं में अधिक निवेश करने की सख्त जरूरत है। निश्चय ही यह चुनौती एक जटिल विषय है। सही मायनों में चुनौती यह भी है कि एक मानवीय, जवाबदेह और प्रभावी आवारा पशु प्रबंधन व्यवस्था का निर्माण किया जाए, जो नागरिकों और कुत्तों , दोनों के हितों की रक्षा कर सके। हमेशा से ही कुत्ते की गिनती मनुष्य के वफादार साथी के रूप में की जाती रही है। सदियों से दोनों एक साथ रहे हैं। उन कारणों की भी पड़ताल की जानी चाहिए, जिनके चलते कुत्ते अचानक आक्रामक व्यवहार दिखाने लगे हैं। निश्चय ही बढ़ता तापमान बदलते मौसमों के प्रति संवेदनशील इन जीवों को बेचैन किए हुए है। भूख व आश्रय के अभाव से उपजे असुरक्षाबोध ने भी उन्हें आक्रामक बनाने में भूमिका निभायी है। ऐसे में पशु प्रेमी संगठनों और स्थानीय प्रशासन को मिलकर इस संकट का कारगर समाधान निकालना होगा। ये समाधान सिर्फ सरकार या स्थानीय निकायों के बूते होना संभव नहीं है। पशु प्रेमियों की बड़ी पहल के परिणाम बदलाव लाने में सकारात्मक भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं।

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