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संतुलन में ही जीवन की सार्थकता

बातचीत की यात्रा

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आज के दौर में ‘अधिक’ का जश्न मनाया जाता है, जैसे - अधिक आय, अधिक सूचना, अधिक सामान, अधिक पहचान। हालांकि अर्थपूर्ण जीवन अधिकता पर नहीं, संतुलन पर विकसित होता है। महत्वाकांक्षा हमें उद्देश्य देती है; संतुष्टि शांति देती है। जैसे, नाव को तैरने के लिए गहरे पानी की ज़रूरत नहीं, सिर्फ़ पर्याप्त पानी चाहिए।

मेरे (लेखिका) परिवार का यह रूटीन है कि हर गर्मियों में कम से कम एक सप्ताह के लिए गांव के अपने पैतृक मकान में वापसी करता है- किसी जश्न के लिए नहीं बल्कि एक ऐसी चीज़ के लिए जो इंटरनेट के इस आधुनिक युग में अति दुर्लभ हो गई है। यह है अपने करीबी रिश्तेदारों से अबाधित वार्ता करना। इसके लिए एक साधारण नियम है- कोई अपने पास मोबाइल फोन व लैपटॉप नहीं रखेगा। एक बार जब स्क्रीन गायब हो जाती है, तो कमरे में दबे पांव लौट आती हैं कहानियां, यादें और समझदारियां।

मूल्य और भ्रम का अंतर

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यह यात्रा सब परिजन एक अन्य कारण से भी करते हैं। वे सब चाहते हैं कि उनके बच्चे वह हासिल करें, जिसकी शिक्षा कोई स्कूली पाठ्यक्रम नहीं देता है- उन लोगों का दृष्टिकोण जिन्होंने ज़िंदगी का लम्बा सफ़र तय किया है ताकि मालूम हो सके कि जो वास्तव में मूल्यवान है और जो केवल कीमती प्रतीत होता है के बीच अंतर क्या है?

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जीवन की नैया खेने को चाहिए पानी

लेखिका के मुताबिक, ऐसी ही एक ‘यात्रा’ के दौरान ससुर ने उन्हें एक बात बतायी थी जो हमेशा याद रहती है। उन्होंने कहा था, ‘कल्पना करो कि तुम्हारा जीवन एक नाव है, जो झील पार कर रही है।’ नाव को चलने के लिए अपने नीचे पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। अगर पानी कम है तो झील के तल में छुपे हुए पत्थर नाव की गति में बाधा उत्पन्न करेंगे। उन्होंने समझाया कि पानी उन संसाधनों का प्रतिनिधित्व करता है, जो हम जीवनभर एकत्र करते हैं- पैसा, सामान, हैसियत व सुरक्षा। तैरने के लिए हर नाव को पर्याप्त पानी की ज़रूरत होती है।

बचत करना अक्लमंदी

लेखिका के मुताबिक, उनकी बेटी ने तुरंत सवाल किया, ‘लेकिन अगर कठिन समय बाद में आये तो? क्या हमें जितना संभव हो उतना एकत्र नहीं कर लेना चाहिए?’ वह मुस्कुराये और बोले, “निश्चित रूप से। प्रत्येक विवेकशील नाविक अनिश्चितता के लिए गुंजाइश छोड़ देता है। तूफ़ान बिना चेतावनी के आते हैं। इसी तरह बीमारी, नाकामयाबियां और आकस्मिक ज़िम्मेदारियां। भविष्य के लिए बचत करना अक्लमंदी है, लालच नहीं।’

गहरा पानी व सुविधाएं

फिर आया वह विचार जिसने एक साधारण समानता को जीवन दर्शन में बदल दिया। ससुर जी ने कहा, ‘एक सीमा के बाद, गहरा पानी अलग प्रकार के प्रयास की मांग करता है।’ जितना ज्यादा हम सामान जमा करते हैं, उतना ही वह सामान हमें अपने वश में करने लगता है। अधिक दौलत अक्सर अधिक जटिलताएं ले आती है- निवेश मॉनिटर करना, एसेट्स की सुरक्षा, निर्णय लेना और चिंताओं का प्रबंधन करना। जो शुरुआत सुरक्षा की तलाश से होती है वह बहुत ख़ामोशी से ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देती है कि दौलत का आनंद लेने की बजाय जीवन दौलत के प्रबंधन में गुज़र

जाता है।

जो कुछ है उसका बेहतरीन उपयोग

लेखिका आगे बताती हैं- ससुर जी के शब्दों ने मुझे वे दिन याद दिला दिये, जब मैं प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी कर रही थी। उस समय तैयारी को स्टडी मैटेरियल एकत्र करने की मात्रा से मापा जाता था- किताबें, पत्रिकाएं, नोट्स व फोटो कापियां। अधिकतर प्रतियोगी सूचना एकत्र करने में अधिक समय व्यतीत करते थे, बजाय उसे सोखने के। वैसे मैं तो हस्तलिखित नोट्स पर निर्भर रहती थी। मेरे लिए वही पर्याप्त रहे व पहले ही प्रयास में प्रतियोगी परीक्षा पास कर ली। उस अनुभव ने मुझे एक सबक दिया- सफलता अक्सर इस बात पर अधिक निर्भर करती है कि जो हमारे पास है, उसका हमने कितना बेहतर उपयोग किया बजाय इसके कि हमने कितना ज्यादा एकत्र किया था।

पूर्ण हुई आकांक्षाएं/ दिल में बसी इच्छाएं

बहरहाल, जब वार्ता अपने अंतिम चरण में पहुंची तो लेखिका के पति ने ख़ुशी के लिए साधारण फार्मूला साझा किया- पूर्ण हुई इच्छाओं की संख्या को दिल में बसी इच्छाओं की संख्या से भाग दे दो। हममें से अधिकतर अपना जीवन न्यूमरेटर में वृद्धि करने के प्रयास में गुज़ार देते हैं। शायद अक्लमंदी इसमें है कि डिनोमिनेटर को कम कर दिया जाये।

अधिकता नहीं, संतुलन में सार्थकता

उस शाम घर लौटते हुए अहसास हुआ कि बातचीत वास्तव में कभी पैसे को लेकर नहीं थी। उस दुर्लभ पल को पहचानने की थी, जो ‘पर्याप्त’ ख़ामोशी से हमारे जीवन में प्रवेश कर जाता है और जिसके स्वीकार करने की परिपक्वता हममें हो। हमारा युग ‘अधिक’ का जश्न मनाता है, जैसे वह अपने आपमें गुण हो- अधिक आय, अधिक सूचना, अधिक सामान, अधिक पहचान। इसके बावजूद अर्थपूर्ण जीवन अधिकता पर नहीं, संतुलन पर विकसित होता है। महत्वाकांक्षा हमें उद्देश्य देती है; संतुष्टि शांति देती है। इनमें से एक की कमी हमें बेचैन कर देती है। -इ.रि.सें.

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